Wednesday, 19 December 2012

दोस्तों, मेरा दिल्ली के वाकये पर कुछ ना
कह पाना .... इसलिए था ...

मैं अलहदा हूँ .....

गिर चूका हूँ कुछ ज्यादा मजबूर होकर,
आदमी था में गमज़दा आदमियत खोकर ,
कब तक बस में बेबस को चोट पर चोट दूं,
खरीद कर मुझे कोई टांग तो दे सलीब पर,
राक्षस बन कह सकूंगा मैं उस जात का नहीं.......। by ...~ प्रदीप यादव ~

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