Tuesday, 18 December 2012

भावनाएं जो कह गया ....

   भावनाएं जो कह गया ....

समृधि की ओर बढने वाले ....
कहते रहते कहने वाले कब रुके हैं चलने वाले,
मेरे घर का रास्ता और मंजिल दोनों तय हैं ,
मिलते रहते मिलने वाले खोए कब हैं रखवाले,
मौसम नरम गरम पर दिनकर का चक्र तय है ...
उम्मीदों के सहारे ना घिसटते रहना जीने वाले,
बड़े ठग होते हैं किबला रंगीन सपने दीखाने वाले।
मंजे हुए होते दिलबर के दिल को धड्काने वाले ,
टूटे अरमानों को अपनी मजबूरी बतलाने वाले।
बढ़े चल काँटों भरे सफर का राहगीर बनकर
इस डगर में मिले थे मुझसे कई दाँव लगाने वाले। .......स्वरचित प्रदीप यादव 03 अक्टूबर 2012

नाज़ ऐ हुस्न
पूजे सभी ने हुस्न के रास रंग,
कोई फ़िदा होकर रिहा हुआ,
कोई गिरफ्त के हवाले हुआ,
परचम फैलाते रहे राजा रंक,
सजा कर बैठे थे वो मस्कारा,
आईने कैसे जाने सलामी का ढंग                             .....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012

दर्दे करीबी ....
खरे सोने सा था,
वो दिल का मरीज़ ,
मर्जे दिल से था परेशां,
या दिल की मर्जी से ,
एक हलकान से दिन।
आ पहुंचा बस,
कहने रात की बात,
थोड़ी देर ही लड़ा था।
हरारत क्या हुई ,
घरवालों ने आसमान
सर कर दिया ।                                               .....स्वरचित प्रदीप यादव  7 सितम्बर 2012

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