Tuesday, 25 December 2012


किसने क्या सीखा  ज़िन्दगी से .....

रब ने तो भेजे थे
गमो ख़ुशी के पास ,
मैं काँटों को चुनने लगा रहा,
उन्हों गुलों करीब आशियाना बना लिए।  .... प्रदीप यादव 



किसी की चाहतों को दिल में बसाकर मंजिलों पर बढ़ जो चले हो,
निगाहों पर निगहबानी रखना चोट खाए इस  कारवां में बहुत हैं। .....BY.... प्रदीप यादव  



 अब मिला हैं रोज़गार जो लबों पर सुर्खियाँ सजाने का,
 सुनते हैं ये 'पान' भी बेकरार हैं लज्ज़तों के खजाने सा । .... BY ....प्रदीप यादव


बोल दो टूक ...



लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।

By ...... प्रदीप यादव  12/12/1


2 comments:

  1. बहुत ही अच्छी लगी ..

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  2. aapkaa sneh mila bahut aabhaar aa. Amritaa ji ....

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