एक चिड़िया का रूदन ...
BY .... प्रदीप यादव
चिड़िया ने देखी उड़ान कहाँ,
भरम टूट गया आजादी का,
बेडी पहन जीने में जश्न कहाँ,
फिरती किन आस पर शाखों,
की गिनती कर झुके नरम से,
सहारे को आशियाँ बना फुदक,
रही थी परों की जोर पर,
अनजान,थी शिकारी पंजों की
रूह को अपमानित करती घेर,
बिछुड़ा साथी सपने भी हुए ढेर,
घायल तन मन पड़ी तड़पती,
लूट कर शिकारी गया था फ़ेंक,
लुटी चिड़िया का दुख देख कहिं,
चिड़ियों का झुण्ड एक गुस्साया,
अपनी छोटी कोशिश से निज़ाम,
को भी उसने पुरज़ोर दहलाया,
कोशिश चिड़िया की रंग लाएगी,
आजादी उड़ने की फिर पाऐगी,
मत रुकना तुम ऐ दोस्त चिड़ियों,
मेरी मौत क्या व्यर्थ हो जाएगी,
कालिख मत पोत शोक करो,
मेरी लाश का बस आभार मानो,
फेंकी गई में जिस तरह लाल,
रंग से सज कर तुम शान से,
सूर्य की सी अड़ ठान कर कर,
मेरे तेरे की बात नहीं करना,
इस लड़ाई की ज़रूरत सोचकर,
तब तक तो तुम अवश्य लड़ना,
विध्वंस करो हर अहंकारी का,
मन तो बदलो हाहाकारी का......
मन से देती तुम्हें शुभकामना,
झिंझोड़ कर रखना शिकारी को,
तुम मेरी सी ही फिर स्वतंत्र सदा,
उडती रहना ... उड़ती रहना ... उडती रहना ।
.. BY ....~ प्रदीप यादव ~ 24 दिसंबर 2012
लोग समझते रहे कि चिराग हुए हैं रोशन महफ़िल करने,
तू ही समझा या मैं जाना दास्ताँ दिल ये अंगार करने की। ....By प्रदीप यादव
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