Tuesday, 18 December 2012

बोल दो टूक ...


बोल दो टूक ...



लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।

By ...... प्रदीप यादव  12/12/12

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