Wednesday, 30 January 2013

पारस स्पर्श ....

पारस स्पर्श ....

बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर,
लौहखंड जो था, घन से पत्थरों को चूरता ।

बेशकीमती बना दिया मुझे तपा चमका कर,
चकाचौंध से जगमगाता रहा अलंकृत जेवर।  

रंगीन मीने और दमकते नग बनी पहचान,
पिघलकर ढलता सौन्दर्य का दर्पण बनकर।

ये पारस ही था जिसने फख्र करना सिखाया,
सोने को ललचाई नज़रों का सामना कराया।

दिन एक लुहार भी अपनी बेटी संग आया,
पैसे पूरे नहीं घर जब लाला को समझाया,
ब्याह है बेटी का पर लाला ना तरस खाया,
निष्ठुर सोने की चाह में गरीब गया सताया,
मोह भंग तक्षण हुआ पारस जो याद आया,
कहा सोना बनना नहीं लोहा मेरे मनभाया,
बुढ़ाती कृशकाय का सहारा बन कर रहूँगा,
लोहा हो रहा था नमी जंग से मिट जाऊंगा।

बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर......


    ~ प्रदीप यादव ~



बावास्ता अब तक क्यों है ...?

बावास्ता अब तक क्यों है ...?

देहरी पर फिर सर रखकर यूँ सोया करता क्यों हैं ?
आस छूटती नही 
ये तेरी, तलब कामयाब क्यों हैं ?

जीने के
नही रहे यहाँ हालात फिर जिन्दा क्यों हैं ?
भूल जा अब की शुबहा
होगा आवाज़ देता क्यों हैं ?

लड़ा मैं जिसकी खातिर शामिल वो मुद्दा क्यों हैं ?
आगाज़ जमाने के समझते तो परेशानी क्यों है ?



ख्यालों में तो ख्वाब में बन सवाली डराता क्यों है ?
खतावार थे, अगर दीदार तेवरों के कराता क्यों है ?

तेरे कहने के बावजूद यंहाँ मुकाबला सा क्यों हैं ? 

 कल था साथी आजकल खिंचाखींचा सा क्यों है ?

रुबाइ भरी नज़में
सुनाकर फिर रुलाता क्यों हैं ?
है
शर्मसार खुद पर तो करता समझौता क्यों है ?


रोज नई बातों पे मेरे यार हसरतें बढाता क्यों हैं ?
आहट के भरोसे ख्वाहिशों को फुसलाता क्यों हैं ?


~
प्रदीप यादव ~

Monday, 28 January 2013

चुप रहने वालों की बातें ...



चुप रहने वालों की बातें ....




पसंद करने लगा हूँ, मैं इन चुप रहने वालों की बातें,
मसरूफियत का नाटक कर ताड़ लेतीं हैं, जो आखें ,
जतला गई पहरन की सिलवटें हो रहीं बेसबर रातें ,
हौले से सर हिला कर बजते गानों  पर झूमती बांहें ,
संगदिल कितने हैं ये लब चुप्पी में क़ैद रखलीं बातें ,
कह देता हाल ऐ दिल गर यूँ दिलकश ना होतीं आँखें,
मुक़द्दस सी चाहत रहती हैं जब तकती रहती ये राहें,
पसंद करने लगा हूँ, मैं इन चुप रहने वालों की बातें .......... 

~ प्रदीप यादव ~ 


Saturday, 26 January 2013

कारण


     कारण ...

    फ़र्ज़ पर इश्क का अहसानमंद होना, तो लाजमत हैं ,
    उल्फत तेरी भी सुर्ख होगी फक्त ज़ज्बात की आँधी हैं। 

          ~ प्रदीप यादव ~ 

 
 



Thursday, 24 January 2013

भावनाएं जो कह गया (...@ पार्ट 2 )

 
भावनाएं जो कह गया (...@ पार्ट 2 )



कीमती याद ....
हम क्या जाने कितनी,
कीमत तय की है यादों की,
इस दिल ऐ नादान ने,
उस राहे गुज़र पर ...
लेकिन ये तोह
ज़रूर पता चला,
कितना बेशकीमत है,
वोह इन यादों में बसने वाला ...।


~प्रदीप यादव ~


समझ के 
दायरे
लोग समझते रहे कि चिराग हुए हैं रोशन महफ़िल करने,
तू ही समझा या मैं जाना दास्ताँ दिल ये अंगार करने की। 
~ प्रदीप यादव~ 

तिलस्मी पूल

ढल रही थी यूँ शाम फिर समन्दर किनारे ...

तिलस्मी पूल से जुडते गए यादों के सहारे |

~ प्रदीप यादव~


हवाला

लेकर इश्क का इक हवाला उसे,दर्द ने पाला था,
फक्त मुरीद हैं तेरा, किया फासलों ने बर्बाद जिसे।
~ प्रदीप यादव ~

ईद का है मौका ....



ईद का है मौका ....

हों रंगीनियत के दौर, मौला जँहा में ,
 इक कालिख को दिलों से दूर रखना ।
~ प्रदीप यादव ~

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काबिल ऐ इन्साफ 


था नाकाफी वक्त की नाप - जौख रखना ,
देख मेरे सफ़र की रफ़्तार थे सहम गए,
सदीयों सा लम्हा था काटे नही कट रहा 
छोटी सी जिंदगी चार पलों में ढल गयी।
रब बदल कर मुझे अज़ीम अइय्यार बना,
कमज़र्फों के मुकाबिल थोड़ा तैय्यार बना,
ना करना गिनती मेरे कदीम एतबारों की,
मोहलत हो थोड़ी काबिले इंसाफ होने की।


~ प्रदीप यादव~

अटपटी मोड़ी

अटपटी मोड़ी 

हरी हुई है क्या,
कभी सुनती नहीं तू
ज़माने ने टाला हैं,
बरसों ज़नाना सवालों को,
एक तू ही लमतडंग बेल सी
पैदल ही,बढ़ रही है ,
आसमान नया अपनाने को,
कहे देती हूँ मेरे आसपास
भाइयों का पहरा तो था,
कमी नहीं थी पड़ोस का
भरोसा गहरा जो था,
मैं सफल थी या नहीं,
ये भी मेरी माँ का
रूख ही तय करता था,
सफलताओं का चेहरा,
हमारी आशाएँ अगर
हर नए साल पर बढ़ती है,तो
कोई भी चेहरा यहाँ मुझ सा होगा,
लेकिन मैं नहीं,
दोस्त मान कर
बस सलाह तू , गांठ बांध  मेरी
समझ ले अब कहा,
अभी भी जान ले वक़्त है,
इन चारदिवारी के बाहर,
जो भी कुछ चल रहा हैं,
खतरनाक है, खौफनाक है और जहरीला है।

~ प्रदीप यादव (स्वरचित)~

Monday, 21 January 2013

बंदिश



बंदिश
एक फकीर की ...


By .... प्रदीप यादव ( स्व-रचित 10जनवरी 2013 )

रहमत कहै मंतर में है शिफा,
तू कितनी भी इबादत कर ले,

फिर पूछना फकीरों के दामन खाली रखने वाले,
औकातों को फर्श दिखाने का दमखम क्यों दिया,

बसा के मेरी आरजू में इस दफा,
लुटा हुआ सा, जंहाँ ही क्यूँ दिया।

औलिया ही बनाकर दुनिया को मुरीद जो बनाना था,
इतना खाली किया कि दानिशमंद  फकीर बना दिया।

किया हो जो करम तूने मैंने तो भुला दिया,
तू ही नसीबों का है तराजू बाद याद आया।

मैंने कभी बड़ी बात कही पर तूमने उसे अंजाम दिया,
रहीम ने मेरे मयार' को बढ़ाकर आसमान कर दिया।

भुला हूँ, किसी वक्फे तो मौला रहम,
तेरे होने से मेरी बरकत रही न कम।

सादगियाँ लूटतीं सरमाया, शर्मिन्दा शातिर होता रहता।
दीवानों की  होती मौजां बिन मांगे रब का साबका रहता।

~ प्रदीप यादव ~


 इबादत की इबारात हो जिसके नज़ीर ,
मुर्शिदों की आमद पर हैं झुकते वजीर । 
हालिया हसरत पर खुदा नज़र रखते हैं,
किसी बहाने कुरआन जो थाम लेते हैं ।

 ~ प्रदीप यादव ~


बंदिश          -       सीमाएं, लिमीटेशन

शिफा          -       वरदान, आरोग्य, हीलिंग पॉवर
औकात        -       सामाजिक स्तर, वकार, सोशल स्टेचर
आरजू          -      अभीष्ट, इच्छाएं, लाईकिंग
दफा            -       बार, टाईम्स
औलिया      -       यक्ष, देवदूत, एजल
मुरीद          -        प्रशंसक, फेन
दानिशमंद    -        बुद्धिजीवी, इंटलेक्चुअल
दरवेश         -        देवदूत, एंजेल
करम          -        वरदान,कृपा, ब्लेसिंग
तराजू         -         तौल करने वाला, स्केल ऑर बेलेंस 
मयार         -         स्तर, पद, पोजीशन
वक्फे          -        अल्प समयावधि, क्षणों में, निक ऑफ़ टाइम
सरमाया      -        संपत्ति, धनदौलत, वेल्थ 
साबका        -        सामना, दर्शन, फेसिंग


       

ताजुल मकबरा

यमुना के तीर घायल पडा हूँ।

 

मेरे चाहने वाले महल हैं कहते,
 

फिलवक्त, फक्त एक मक़बरा हूँ
 

मर्सिया पढ़ लेने की,
 

फुरसत निकाल कर मेरे 
 

शफ़्फ़ाक़ मरमरी सिरहाने,
 

सोए शाह ए जंहाँ ओ मुमताज के 
 

जानिब मेरे शापित भरम को 
 

जानने वाले मोहोब्बत के
 

इदारों को उड़ान भरते देख,
 

कहते की अगरचे वो मुहब्बत,
 

ही इमानदार होती तो,
 

किसी बेकल से परिवार
 

की बेवजह यूँ ना मौत होती।

पेट की आग बुझाने की हसरत में
 

चाक होते वक्त
 

कटे हाथों से भेजी बददुआ से
 

हुनर बाज हैं गिद्ध ओ बाज,
 

जो अब तलक हैं मिटा रहे,

इस जंहा से गंद का खाज । 

~प्रदीप यादव       
 



Wednesday, 9 January 2013

नए साल का रिएक्शन




नए साल का रिएक्शन ( व्यंग ... प्रदीप यादव स्व रचित )

क पावभर की महिला ने किलो भर सौन्दर्य प्रसाधन किया।
और मेकओवर के बाद अपना सुंदर मुखड़ा हमें  दिखा दिया।
हमने ध्यान धर उसको देखा और भोंचक हो कर  कह दिया।
'ओ प्रिया ...प्रिया .... ओ प्रिया ये तूने क्या कर दिया ....
इस बेचारे कॉस्मेटिक बेचने वाले को ही क्यूँ तूने लूट लिया,....

चिल्लम चिल्ली सुन कर हमारे आसपास भी मजमा इकट्ठा हो लिया।
भाईसाहब मेरी मानो! हमारे पास खड़े मसखरे ने तभी एलान ये किया।
ये कॉस्मेटिक ने हमारे पडोसन महिला पर क्या गजब रिएक्शन किया।
शेम्पू जो लिया था बालों को झड़ने से बचाने का उसी ने धोखा दे  दिया।
सभी ने उत्सुकतावश पुछा मतलब नकली माल, नहीं काम कोई आया।
मसखरा इतरा के तब बोला नहीं, भाइयों माल तो असली ही था आया।
बालों का झड़ना तो हुआ बंद, बस महिला का चेहरा बालों से भर आया।
कहाँ फंसाया दारी ने, सोच मन ही मन बड़बड़ाया, खिसियाया,घबराया।
दौड़ा भागा घर के भीतर,बाल्टी भर पानी लेकर फिर मैं बाहर को धाया।
साथ की महिलाओं ने कुछ समझाया तब कही जाकर उसे मुंह धुलवाया।
घोटाला हुआ ये अनजाने,निकली पड़ोसन वो जिसे मैं प्रिया समझ आया।
न्यू-इयर पार्टी पर जाने तैयार थी वो, परन्तु मैं ही सत्यानाश कर आया।

सब कहाँ थे चूकने वाले, बस छूटते ही मुंह पर कह दिया "हैप्पी न्यु इयर" ......

by ....... प्रदीप यादव 3 जनवरी 2013 ....

मंहगाई 
अरे, यही तो महंगे राशन की सस्ते शासन से प्रीती है,
तभी तो यहाँ झोला भरता है पर एक झोली ही रीती है।
~ प्रदीप यादव~

Tuesday, 1 January 2013

नव-वर्ष शुभकामना


नव-वर्ष शुभकामना 

शुभदायी नववर्ष की अनंत  शुभाकांक्षाएं,
विस्तारित हो आप सभी की संकल्पनाएं,
आकल्पित हों नवसूत्र अवगुंठित रचनाएँ,
विराजे मन विहगपंख पर  नवकीर्तिमान,
आल्हादित निलय प्रमुदित सर्वसंस्कार हों,
मित्रों आपको नव वर्षाभिनंदन स्वीकार हो....  BY प्रदीप यादव