पारस स्पर्श ....
बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर,
लौहखंड जो था, घन से पत्थरों को चूरता ।
बेशकीमती बना दिया मुझे तपा चमका कर,
चकाचौंध से जगमगाता रहा अलंकृत जेवर।
रंगीन मीने और दमकते नग बनी पहचान,
पिघलकर ढलता सौन्दर्य का दर्पण बनकर।
ये पारस ही था जिसने फख्र करना सिखाया,
सोने को ललचाई नज़रों का सामना कराया।
दिन एक लुहार भी अपनी बेटी संग आया,
पैसे पूरे नहीं घर जब लाला को समझाया,
ब्याह है बेटी का पर लाला ना तरस खाया,
निष्ठुर सोने की चाह में गरीब गया सताया,
मोह भंग तक्षण हुआ पारस जो याद आया,
कहा सोना बनना नहीं लोहा मेरे मनभाया,
बुढ़ाती कृशकाय का सहारा बन कर रहूँगा,
लोहा हो रहा था नमी जंग से मिट जाऊंगा।
बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर......
~ प्रदीप यादव ~
बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर,
लौहखंड जो था, घन से पत्थरों को चूरता ।
बेशकीमती बना दिया मुझे तपा चमका कर,
चकाचौंध से जगमगाता रहा अलंकृत जेवर।
रंगीन मीने और दमकते नग बनी पहचान,
पिघलकर ढलता सौन्दर्य का दर्पण बनकर।
ये पारस ही था जिसने फख्र करना सिखाया,
सोने को ललचाई नज़रों का सामना कराया।
दिन एक लुहार भी अपनी बेटी संग आया,
पैसे पूरे नहीं घर जब लाला को समझाया,
ब्याह है बेटी का पर लाला ना तरस खाया,
निष्ठुर सोने की चाह में गरीब गया सताया,
मोह भंग तक्षण हुआ पारस जो याद आया,
कहा सोना बनना नहीं लोहा मेरे मनभाया,
बुढ़ाती कृशकाय का सहारा बन कर रहूँगा,
लोहा हो रहा था नमी जंग से मिट जाऊंगा।
बदल गया एक दिन पारस की छूअन पर......
~ प्रदीप यादव ~