Friday, 26 September 2014

दिल ओ दिमाग




दिल ओ दिमाग


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दिमाग रखा करिए ;

शिकवे गिनाने को ;


दिल भी रख लीजिए ;

रूठे मनाने को |

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~ प्रदीप यादव ~

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खुश हो लिए ज़माने में

हदे गम जानकर ;


हैरान हो रही दुनिया

ख़ुशीयों को पाकर |

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~ प्रदीप यादव ~

Thursday, 25 September 2014

स्त्रीबीज के अनुवर्ती ....

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स्त्रीबीज के अनुवर्ती ....
( by ~ प्रदीप यादव ~)

समपाती
अनुयायिनी
अथवा
पुरूषों सी अनुचरी ;
कब तक
स्वीकारती रहती
आलम्बन के अवशिष्ट ;
देवी कह
वैतरणी तिरा आए
भविष्यगर्भा के मान ;
कलुषित, विषाक्त
 प्रयोगशाला के
परिष्कृत अनुसंधानी ;
बीज विरूपण
को सोच
संवर्धित प्रमापों
से अणुव्रत ले,
दुश्चरित्रा , कुलटा
कह स्वयंसिद्ध
प्रमाणक कहलाएं |
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~ प्रदीप यादव ~
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Monday, 15 September 2014

रचना शीर्षक : 1. मेले का बाँसुरीवाला ( श्रेणी ; लघुकथा ) हँस कथा कार्य शाला


रचना शीर्षक :   1. मेले का बाँसुरीवाला  ( श्रेणी ; लघुकथा  )
प्रकाशनार्थ :  हँस कथा कार्य शाला
c\oअक्षर प्रकाशन प्रा.लि ,
2\36 अंसारी रोड, दरियागंज ,
नई दिल्ली - 110002
ईमेल: editorhans@gmail.com    

प्रदीप यादव ,
जी 4 कंचन अपार्टमेंट 
133 अनूप नगर ;
एम.आई.जी. चौराहा
AB रोड ,ईंदौर 

Pin 452010  ईमेल: pradeep4133@yahoo.com 


मेले का बांसुरीवाला 

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                      by -  ~ प्रदीप यादव ~

.......कितना प्यारा वादा है इन मतवाली आँखों का  ....   फिल्मी

धुन बड़ी ही सुंदर ढंग से बांसुरी पर बज रही थी सड़क पर ...
एक बांसुरी वाला मधुर धुन  बजाता हुआ बांसुरियां  बेच रहा था।
प्यास  लगी, तो बजाना रोक वह नजदीकी  मकान के भाईसाहब
से इशारों में पानी देने की  गुजारिश करने लगा। साहब ने तल्खी
मना किया और अपने  मोबाईल पर बात करने में व्यस्त हो गए,
तभी भीतर से  नाजुक हाथों ने बांसुरी  वाले को पानी का गिलास
पकड़ा दिया। बांसुरी वाले ने पानी  पीकर अंग्रेजी में 'थेंक्यु', कहा
आगे बढ़ गया, भीतर से एक जोड़ी आँख उसे ओझल होते देखती
रहीं, पर शायद उन भाईसाहब  को नागवार  गुजरा उन्होंने बच्चे
को हिकारत भरी नज़र से देखा और फोन पर  बतियाने लगे, इस
वाकये से बच्चा भी सहम कर घर के अन्दर हो लिया।
कुछ दिन बाद बांसुरी वाला फिर लौटा पर  शायद  इस बार भाई-
साहब नही थे । बच्चा  दौड़कर  भीतर से  पानी  का  गिलास भर
लाया। 'बांसुरी वाले भईया ' ! आवाज दे उसने उसे पानी पीने का
आग्रह किया। बांसुरीवाले ने  इधर-उधर देखा फिर पानी पीते हुए
एक बांसुरी उसकी और बढा दी, बच्चे ने  हिचकते हुए लेने से  ना
कहा ....पर तब तक बाँसुरीवाला आगे बढ चुका था। बच्चा बांसुरी
ले मुस्कुराता हुआ घर के भीतर चला जाता है।
दुसरे दिन बांसुरी वाला  बड़ी ही मधुर  तान बजाता हुआ बच्चे के
घर के पास से गुजरा  पर वहां  उसकी पहले दिन वाली बांसुरी के
के टुकड़े घर के गेट  के बाहर पड़े देख  आसपास नज़र दौड़ाई  तो
उपरी मंजिल पर खड़े बच्चे का  रूंआसा चेहरा देख जैसे उसे कुछ
बोध हुआ। परन्तु उस दिन के बाद से बांसुरी वाला रोज़ आता पर
बिना  बांसुरी बजाऐ ही सामने  से गुजर जाता था। भाईसाहब भी
इस दौरान उसे कई बार घूर कर देखा करते।
कुछ और दिनों बाद बच्चे का परिवार स्थानीय मेले, घूमने आया।
एक बडे झूले के  किनारे बच्चे  खुश दिखाई  दे रहे थे। तभी भाई-
साहब बच्चों को झूले का टिकिट दिलाने लाइन में लग गए। बच्चे
के साथ आई  महिला ने उसे  बांसुरी  वाले से  बाँसुरी दिला दी बस
अब नया दृश्य बडा मनोहारी था। बांसुरी वाला जो भी धुन बजाता
बच्चे को हुबहू उसकी  जुगलबंदी करते देख परिवार  के लोग और
मेला घूम  रहे अन्य लोगों की आँखों  में प्रशंसा का भाव साफ पढ़ा
जा सकता था।
महिला बांसुरी  वाले से बोली, " ये अच्छी बांसुरी बजा लेता है, ना
बांसुरी वाले भइया .... ?
बांसुरी वाले प्रति-उत्तर दिया  ..जी, मेडम जी, बहुत प्यारी बजाता
है,  पर भाईसाहब  के डर से घर के आगे वाले चौराहे पर मंदिर में,
मैंने ही उसे बजाना सिखाई थी ।
इसके पापा ही इसे शौक से दिला दिया करते थे .....। यह कहते ही
उस की आँखे डबडबा गइ।
दीदी, तुम अब उस आदमी के लिए आंसू बहाने बंद करो ..... और
ये लो, झूले के टिकिट .....भाईसाहब की आवाज गूंजी ! .. महिला
की चेतना जैसे यथार्थ में लौटी, फिर संयत होते हुए उसने टिकिट
लिए और  प्रशंसा भरी नजरों से बच्चे को देखा, फिर सर पर हाथ
फेर कर अपने पास भींच लिया।
 .....कहने को  साथ अपने दुनिया चलती है, बस तेरी याद बाकी है,
परोक्ष में फिल्मी गीत बांसुरी वाला बजा रहा था ,  बच्चा  ख़ुशी से
चहकते  झूले का आनंद ले रहा था।  ...बांसुरी  वाले  की  प्यास ने
बच्चे की दुनिया को नया अध्याय जो दे दिया था ।
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  ~  प्रदीप यादव ~ (स्व-रचित, 06 नवंबर 2012 )

Monday, 1 September 2014

अक्षत यादें और पुराना स्वेटर




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 अक्षत यादें और पुराना स्वेटर 
....... By ~ प्रदीप यादव ~

तीन बित्ते ( बिलास ) और 
चार अँगुलियों ;
के नाप ने ठंड से 
बचने का उपाय किया ; 
कितनी ही बार 
पहना होगा मैंने ;
वोह धुल कर उजला 
ही होता गया |

परखा जाँचा था 

वोह सफ़ेद ऊनी स्वेटर ;
खेल के दौरान एक बार
पीछे की ओर 

गेंद की मार से ;
हरा मटमैला सा धब्बा 
पड़ गया था ;
माँ ने ;

धो निचो के सुखाया ;
पर ये तोह अभी भी 
था कायम ; 
मैंने माँ के ;
हाथ देखे उनमें थी
छाले और साबुन 
की खरोंच |
मैंने कुछ सोचा 
स्वेटर को 
साबुन के पानी में 
रात भर गला कर  
सुबह रगड़ के धो दिया | 
अब बड़ा हो गया था ना 
... मैं भी और स्वेटर भी |

स्वेटर,

माँ के लाड़ की तरह
मेरे कालेज की 
क्रिकेट टीम के 
चयन के दौरान
मेरी पीठ पे था |
आज उसमें धब्बा नहीं था ;
पर इसे कैसे 
समझ आता था ;
साल दर साल 
मेरे ही नाप का
 .... हो जाता था |   

आज जब मेरे बच्चे के 

कपडे छोटे हुए तोह 
वही करामाती स्वेटर 
झबला और टोपी बन 
मेरे बेटे पर फबता था |
आशीर्वाद लंबे होते 
है ; कपडे नहीं ...!

मैं समझदार हो रहा था |
बूढी माँ की तिमारदारी 
के लिए नई चप्पल, चश्मा और 
दवाई का बक्सा लाते-लाते,
मैंने बेटे के हाथ 
क्या पकड़ा ...!
दुसरे हाथ से माँ ने 
छोटी सी कलाई थाम ली |
मुझे भान हो रहा था ;
इन सर्दियों में मेरा बेटा 
सँसार का सबसे 
खुशनसीब नन्हा है |    

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~ प्रदीप यादव ~

Friday, 13 June 2014

ABOOJHA अबूझा

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ABOOJHA अबूझा ( Mysterious = नामालूम ) 


Trying to FINDOUT... The OBSCURE Object of Desire .....



मेरी फेहरिस्त में जो देखते रहे मयार ,

बेखयाली में हमें ज़ानिबे मंज़िल समझे |


बताएँ क्या मिट्टीसने कपड़ों में शुमार ;

किस्से मशहूर हुए हमारी खाकसारी के |


Meri Fehrist mei Jo Dekhte Rahe Mayaar,

Be KhayAli mei Hamein Janib E ManZil Samjhe .


BaTaeiN KyA MittiSane Kapdon Mei SHuMar ,

Kisse MashaHooR Hue HumAri KhaQsaaRi Ke .

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~ प्रदीप यादव ~
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Tuesday, 20 May 2014

मौजूँ रहै … दिग्गी के रिलेशन और एन डी की टेंशन



मौजूँ  रहै … दिग्गी के रिलेशन और एन डी टेंशन  
(मज़ाहिया.... )


ख़ाक़ा उनके अब्बु ने ऐसा खींचा;
कि हम भी गच्चा खा गए ,
बेमेल थी हसरतें तमाम पर ;
करके कोशिशें दोनों निभा गए | 


कुदरत को ही होगा मंजूर, 
इसमें कुछ भला हमारा ओर भी  ;
होता नहीं था सबर जिन दिनों,
बंदे ने अंगूर 
खट्टे ख़ा लिए | 



ऐ 
मेरे मौला किसी को किसी से 
इतनी मोहोब्बत भी ना हो जाए ; 
सींचा हो जिसने गीचा जवानी में 
बुढापे में उसीके कहर न ढाए |


हो रहा 
ये जी खट्टा खट्टा , अब कहने से क्या है फायदा ;

वोह आए और नसीब में रोशन
नया चाँद लिखवा ले चले | 

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              ~ प्रदीप यादव
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Sunday, 11 May 2014


Gulzar, Indian cinema's most versatile wordsman

http://www.ndtv.com/video/player/bollywood-roots/gulzar-indian-cinema-s-most-versatile-wordsman/275696


ग़ज़ल को नाम तोह मिला करता था,
बस ईनाम एक तू ही हुआ " गुलज़ार "।


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प्रदीप यादव ~
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Ghazal ko naam Toh mila karta thaa,
Bas Iinam Ek tu hi hua "GULZAAR".
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 By ~ Pradeep Yadav ~  


इंसानियत के भरम


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इंसानियत के
भरम
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Khaamosh ho Jaata hoon ;
Salaami teri har Zabt ko deta hoon,

Insaaniyat is tarha ,
 main tera Bharam rakhtaa hoon .

..
By ~  Pradeep yadav  ~

खामोश हो जाता हूँ ,
 सलामी तेरी हर ज़ब्त को देता हूँ ,

इंसानियत इस तरहा,

 मैं तेरा भरम रखता हूँ ।
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 प्रदीप यादव ~

Saturday, 26 April 2014

थोड़ी सी दिल की


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मुकदमे जिंदगी के ,

वकील जिरहबाज़ हो कितना ,

बेदम ये उल्फ़त रहे ;

क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |   


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हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;
हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |

मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं, 
आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |


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चाहत ए उल्फत की राह में मंजिले किस की हुई ;

ख़्वाबों की आरज़ूओं मे खाक़ फिर ये हसरतें हुई |
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इंसानी ताक़त ईमानों को सरकश करे ,

पत्थर को खुदा होने पर मजबूर कर दे |

दिल बहलाने महल ए ताज तामीर करे ;
हाथ काट संगतराशो की वोह तारीफ़ कहे |

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~ प्रदीप यादव ~
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मुकदमे जिंदगी के .....


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मुकदमे जिंदगी के ,


वकील जिरहबाज़ हो कितना ,


बेदम ये उल्फ़त रहे ;


क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |



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Muqdame Zindagi Ke ,

Vaqil Zirahbaz ho Kitnaa ;

Bedam Ye Ulfat rahe ;

Kyun Jeet Pe Daaromadar Itnaa .


हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;

हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |


मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं,

आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |


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Ham pe ho gaya taari nasha dil luta dene ka ;

har Khalish ko uski Maang tak nibhaane kaa .


Milataa hi nahi harek Beshudh Nind ko kahin ;

Aab E Rukhsar se Bhigo ke Jagaane walaa .


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~ Pradeep Yadav ~

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Tuesday, 1 April 2014

ऊँचे कटाऊट से हाथ जोडे अराध्य .....


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ऊँचे कटाऊट से हाथ जोडे अराध्य .....

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

हमारी अपनी सत्ता है 
मान कर ,
अब निश्चिंत हो लें,
हाथ जोड़े आराध्यों को ,
बड़प्पन की असीमित 
क्षमता सौंपें ,
धृष्टता तोह वोह होगी ,
शर्म की कालिख को ,
आँख अंजन बना धारण करें | 

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

जो सिखा जमाने से ,
सविनय ही करें ,
अव्यवस्था को सहने का ,
सामर्थ्य उत्पन्न करें | 
महंगे हो रहे ,भाव 
अब मसीहा को , 
खुद को समर्पण करें ,
समृधि शासकीय हुई ,
सिर्फ शासक उपभोग करें |
खुश होईये आप की जीत हुई ,
अब सत्ता की भागीदारी का 
जश्न मनाएं |
स्वराज का 
अधिकार और कर्तव्य ,
सिखा है कीमत का भोग लगा ;
बड़े सामर्थ्यवान 
फिर बन बैठे मसीहा ;
स्वागत करें |
रिसते आँसू से ,
भावना को संतृप्ति देकर ,
अब अपनों की लाचारी ,
की मरहम पट्टी करें |

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

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by ~ प्रदीप यादव
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Wednesday, 19 March 2014

होली गीत

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होली गीत .. (~ प्रदीप यादव ~ )


फाग
में गुल रँग सी खिल जाऊँ ,

मैं भी गुलबीया हो जाऊं रसिया ,


चाशनी भरे बेन जो बोले तू ,

मै चमचम सी हुई जाऊं रे मनबसिया ,

जो तू झूमे संग हलके हौले से ,

मदीरा बन इतराऊँ रे मोरे सरबिया ,

ताड़े हे मुआ पड़ोसी छिछोरा मोहे ,

गारी रे दईके ओहके बरजाऊँ राजा ,

हाय राम उहै जुल्मी रहे भरतार री ,

कहाँ लुकाऊँ( छिपाऊँ ) भीगो बदन ओर अंगिया ,

लागी छेड़न ई दारीं सखीयाँ, सहेलियां ... |

सरकत चुनरी मोरी छुड़ाऊं तोसे ,

ढलकत हरकत लजाऊँ रे बैरी पिया ,

रँग डारो जो मोहे धोखिन जुलमिया ,

हरषत लाजत होरी मनाऊँ रे बलमवा |

रचत रास लिन्हों संग भींच हुरियार पिया ,

महकत जाऊँ , धीर न पाऊँ , संवर संवर जाऊँ ... मैं;

री संवर संवर जाऊँ ..... ,

बलमवा मोरे गुलबीया मैं तोहरी हुई जाऊँ | 



 ~
प्रदीप यादव ~

स्त्री और शक्ति ...



*
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स्त्री और शक्ति ...


हम कूकती कल्पनाएँ ,

आलिंगनबद्ध हो

मचलना छोड देती हैं |


निस्सिम से

पथरीले फर्श की ,


यात्रारत हो

आकार छोड़ देती है |


निरुद्द होकर

आयामों में नये प्रतिमान ,


नया संविधान रचती है |


अनुपमाएँ औघड़ ही

प्रासारों पर,


प्रतिसादों का

विवरण देती हैं |


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~
प्रदीप यादव ~

आगाज़ ....



आगाज़  ....

By ~ प्रदीप यादव ~

सूर्य को दिखाए ,
हुनर ने चिराग
अधेरे खूब हुए |

महंगे हो चले है ,
मनुहार , चलो !
अब यलगार हो |

खराब है शराब ,
नशे के घोल ये ,
मुंह खोल गए |

कडवा लगा सच ,
चख कर फिर  ,
झूठा कर गए |  

विषैले थे ईमान ,
हर अक्स को ,
शीशे की सलाह |

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By...~ प्रदीप यादव ~
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Thursday, 13 February 2014

Youm E Ishakiya



Youm E Ishakiya 


अहले दुनिया' भी समझी है सुर्खि ए गुलशन' ।
दौर अमले मोहोब्बतसाज़ी' के अभी जारी रहें  ॥ 


Ahale Duniya bhi samjhi hai Surkhi E Gulshan ;
Daur Amale Mohobbatsazi ke abhi Jaree rahein  . 


    ***    ***    ***    ***

मरीज़ ऐ ईश्कबाज़ी तोह मसरूफ' यूँ ही रहें ।
क़ातिबे तक़दीर' को इस्तिक़बाल'
 किया करें ॥ 

Mareez e Ishqbazi toh Masroof yun hi raheinge ;
Qatib E Taqdeer ko Istiqbal
 Kiya karein  .

By ~ PEADEEP YADAV ~

*  Surkhi e Gulshan = फ़ूलों की रक्तिम आभा, ग़ुलों की लाली
*  Amal e Mohobbatsazi = प्रेम प्रकटन का कार्य , इशारा ए उल्फ़त
*  Ahale Duniya = दुनिया वालों से \में ; * Masroof = व्यस्त 
*  Qatib e Taqdir = भाग्य लेखक ( विधाता )। ;
*  Istiqbaal =  स्वागत ,Welcome 

Tuesday, 21 January 2014


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आह लिखता हूँ तोह वाह कहती हैं ,


जिंदगी भी लफ्जों को यूँ रंगती है |



~ प्रदीप यादव ~




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जब भी मिला हालात पूछती है दुनिया ,


किस्सा बर्बादी का यूँ छुपाती है दुनिया | 



by ~ प्रदीप यादव ~


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मैं दूर खडा जमीं से चाँद तारे देखता रहा ,
वोह उठा गरज कर फलक पर छा गया |

~ प्रदीप यादव ~

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फ़ौरन से पेश्तर लपकती है दुनिया मिले मौकों को ,


मौक़ापरस्त मैं भी नहीं दुआ में बस असर न रहा |



~ प्रदीप यादव ~

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होनहार बेअक्ल दिलों ने क्या क्या न किया ;


इश्क वाली तरकीबें समझे मौत को भूल के |


~ प्रदीप यादव ~ 




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Pani hi toh sirf Pi rahaa thaa woh maykhaane mein baith kar,


Nashaa nahi paimaane mei ,aankhon mei surar utarne ke

sabab KYun dhundhataa tha .



~ Pradeep Yadav ~



पानी ही तोह सिर्फ पी रहा था वोह मयखाने में बैठ कर ;


नशा नहीं पैमाने में आँखों में सुरूर उतारने के सबब क्यूँ ढूंढता था | 


~ प्रदीप यादव ~



दर्द को चूमना भी अमां कोई बच्चों का खेल है भला ,

भट्टी से खौलता लोहा बनना होता है खुदी को गला |



by ~ प्रदीप यादव ~


Thursday, 16 January 2014

एक है हम ...



गुनगुना लें सुनहरे कल के 
संगीत ; 
नाउम्मीदी हुई बीते दिन की बात |  

डगमगाती आस ने की सधी प्रभात ;
हुई ज़िंदगी की नपी तुली शुरुआत |


यूँ ना तोड़िए बढ़ते रहने की कसम ;
भरने लगीं उम्मीदें अब नया भरम ;
होता नहीं फिर बिगड़ जाने का गम ;
पोस रहे हौसले बढते चलने का दम |

होश में फूंकता रहा जोशीले कदम ;
दिलों से आवाज बस यही आती रही;
एक है हम ....
एक है हम ...एक हैं हम |

~ प्रदीप यादव ~