Thursday, 28 June 2012

Vyaing




व्यंग By ~ प्रदीप यादव ~ 

महोदय,
देश मे अपराध, भ्रष्टाचार, माफ़िया,अनियमितता,सन्क्रमण, प्रर्दशन, दबंगई,अतिक्रमण, कब्ज़ा, अवैध वसूली, शराबखोरी आदी मंत्रालयों की  ज़रूरत बहुत 
शिद्दत से महसूस की जा रही है। महिला तथा बाल सुधार शालेय शिक्षा, खेलकूद , वृद्ध तथा निःशक्तजन, सांख्यिकिय, जनस्वास्थ्य, लोकस्वास्थ्य तथा सभी धर्मार्थ एवं कल्याणकारी मंत्रालयों को बंद कर, पार्टी मुख्यालयों पर कार्यकारी शुल्क लेकर अधिकारियों द्वारा कार्य होने अथवा न होने की जानकारी दी जानी चाहिए। इस तरह जन सामान्य का डंडा तंत्र में विश्वास और आस्था बढेगी। 
डंडा और दंड प्रधानमंत्री महोदय के अधीन हो तथा उनके मजबूत
बाईसेप्स्
 आधारित एक  बुलन्द सम्पूर्ण डंडातांत्रिक राष्ट्र की संकल्पना पुज्य दबंगजनों की अगुआई में असंवैधानिक संगठनालय में बैठ कर किसी भी क्षण की जानी चाहिये। 
आपका सदा से प्रताड़ित एक असुरक्षित आम आदमी .... सिर्फ़ जीवित    
~ प्रदीप यादव ~


इस कदर उलझाए रखना,मेरे मामले को;
बेनिफिट ऑफ डाऊट की भी जगह ना हो । ~  प्रदीप यादव ~

खलिश के माने

                 खलिश  के माने 

बूंदों को  नदीया की,
नदीया को समंदर की 
और समंदर भी जब  घुमडते बादलों की चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के बावजूद
दो ' बूँद ' मीठे पानी को तरसता है । जीवनचक्र का होना ही तो
 K H A L I S H  का आधार बनता है।
                
निदान भी वही होता है। किसी कमी के होने का एहसास है खलिश  ....                                           
                                                 ... प्रदीप यादव 

Tuesday, 26 June 2012

पूर्वाग्रह



                    पुर्वाग्रह ( भक्त और भगवन के )

मैं मझधार का अटका नाविक ,
शरणागत वत्सल को रहा पुकार,
अब दरस दो लगाओ मुझे पार ,
तेज धार संघर्ष की हताशा ,
मन के कुरुक्षेत्र  का भ्रमण,
पल प्रत्येक बढ़ रही व्याकुलता ,
करो जिजीविषा का शमन ,
लहरों का सांकेतिक वार था क्रूरतम,
स्मृति काल में  याद आ रहे प्रियतम,
हरो अब मेरे संकट ,
राह करो मेरी निष्कंटक,
अभिमान तार तार करने की परीक्षा,
माटी के जीव को गीता ज्ञान की समीक्षा,
मेरे अकिंचन मन को निःशेष आमंत्रण,
मुझे स्वर्ग के अनुभूत का निमंत्रण ?

नहीं,मैं तो जीवन संघर्षों से ही पार का यत्न करूंगा।
स्वार्गिक सुखों की चाह नहीं भगवन ,
आत्मज मेरी राह देखते होंगे,
विरह में मेरी आकुल होंगे,
उनके प्रति मेरे कर्त्तव्य अधूरे हैं,
जीवन की धुरी की पुकार अनसुनी कैसे कर दूं ,
मेरे हृदयस्थ को अकेला छोड़ कैसे चल दूं ,
क्षमा करना ये धार कुछ मद्धम पड़ गयी है।
राह  किनारों  की सूझ गयी है।

संशय के घनेरे मेघों से किया अहं का परित्राण
क्लांत अंतर्मन शीतल कर लूँ ,
मैं ध्यान धर फिर तुझ को भजूँ ,
करूणाकर हर क्षण मुझ पर उपकार तुम्हारा,
मुझे अंगीकार कर दिया सहारा,
सर्वांगिण थे तुम नाथ सर्वदा,
दुर्गुण चित ना धरो परमात्मन ,
मैं ही भूल गया था , भक्त मर्यादा ।    ....~ प्रदीप यादव (स्व-रचित )






     

Friday, 22 June 2012

चाँद सन्देशा


                 चाँद को सन्देशा 

  बडे मूड में हो चांद,बादलों से बाहर फिर आ जाओ ,
  बिखरा जाओ इस धरती पर वही मनमोहिनी चांदनी , 

  चांदनी पर किरणों की जलतरंग सुना जाओ,
  बहकी हवा से बढती मदहोशी की खुमार,
  तुमसे ही कहता है दिन गिनता कोई प्यार,
  तुम्हारी नीली ठंडी उजास परवान चढाती पीर विरह की,
  कोमल कुमुदिनी भी रहती है  भटकी भटकी,
  भरमाये पंछी भी रोशनी से उड़ते विचरते हैं,
  किनारों पर उभर आए समंदर को भी समझाओ,

  बड़े मूड़ में हो चाँद, बादलों से फिर बाहर आ जाओ 
  तुम्हें देख लगता है पुरखा कोइ मेरा है आया करीब ,
  नाप रहा हो इस दूरी को जैसे लिए हाथों कोई ज़रीब,(an old scale)
   
अपना ठिकाना दिल की बस्ती जिसमें कई यादें रहतीं 
    मान भी जाओ,मैं दिल से तुमसे कुछ कह्ता हूं ,
    मेरे अपने तुम्हें देख कुछ चाह रहे हो जतलाना ,

    ढांढस  उन्हैं मेरी  खैरियत का तुम दिलवाना ,
   बस कहना  फिक्र ना करें,यंहां  सब ठीक है ।       

   .....(स्वरचित प्रदीप यादव )

Pita by Suhas Ji,

  A prose by my friend Suhas Dubey Ji : Jindgee ko Jindgee ka Tohfa hai Pita....

 पिता का रूप जन्म देती है माँ चलना सिखाते हैं पिता
 हर कदम पे बच्चों के रहनुमा होते हैं पिता
 फूलों से लहराते ये मासूम बच्चे प्यारी सी इस बगिया के बागबान होते हैं पिता
 कष्ट पे हमारे दुखी होते है बहुत अश्क आंखों से बहे न बहे पर दिल में रोते हैं पिता
 धुप गम की हम तक न पहुँचे कभी साया बन सामने खड़े होते हैं पिता
 पूरी करने को सारी इच्छाएँ हमारी काम के बाद भी काम करते हैं पिता
 गलतियों पे हमारी डाँटते हैं हमें डाँट के ख़ुद भी दुखी होते हैं पिता
 रो के जब सो जाते हैं हम पास बैठ देर तक निहारते हैं पिता
 जीवन में आती हैं जब दो राहें कभी सही राह का इशारा कर देते हैं पिता
 लड़खड़ाये जो कभी कदम हमारे आपनी बांहों मे थाम लेते हैं पिता
 देने को अच्छा मुस्तक्बिल हमें पूँजी जीवन भर की हम पे लुटा देते हैं पिता
 खुश रहें बेटियाँ दुनिया में अपनी कर्ज ले के भी बेटी का घर बसाते हैं पिता
 निभाने को रीत इस दुनिया की भरे दिल से बेटी को विदा कर देते हैं पिता
 उन्हें छोड़ जब दूर बस जाते हैं हम चीजें देख हमारी बहुत रोते हैं पिता ,

जन्मोत्सव की बधाई

 
                     जन्मोत्सव की बधाई  2012,जून 22

 किलकारी गूंज उठी ,चमका ज्यों आसमान में  भोर का  ध्रुवतारा  ,            


 मेरे घर आंगन मे जीवित हो उठा कोई सपना नन्हा सा अलसाया  ,


 कोरी कोरी माटी सा निश्छल, कान्हा की मादक मुस्कानों सा चंचल ,


 नन्हे हाथों का स्पर्श निर्लिप्त कोमल मन,पुष्ट तन,मेरा ही तो बचपन,


 जीवन पोषना माता का आलिंगन, चटख नज़रों का ये शरारती सृजन,
 
 
 समर्पण पुण्यों का,आशीष देवों का, नवांकुर उल्लासित करता जीवन ।


  आशीषों की छांह मे जीवन यश शक्ति, सामर्थ्य और सुख सदा रहैं


                     "अक्षत "

Tuesday, 19 June 2012

सिली लाइफ (जाम ए सुकूं)

      सिली लाइफ 

पी रहा था जाम ए सूकूं ,
थोडा परेशान हो लिया जाए,
बदल के अंदाज जिन्दगी के,
इस तरह भी जीया जाए |
आशिक़ हूं नजरों का तेरी,
अब दर्द तन्हगी का भी जिया जाए |
खुसुसियात मेरी थीं खुफ़िया,            

क़ुछ उजागर उन्हें भी किया जाए |

दिल्लगी के माहौल में बातों को संजीदगी से सुना लिया जाए,

मसरूफ़ियात तमाम के बावजूद वक़्त जरा बचा के रखा जाए|तेरे झूठ से वाक़िफ़ है जमाना ज़िन्दगी, 
रूख फिर भी जीने का बनाना चाह्ता हूं,
मौत आखिर सच्चाई है इस जहान की,
हौसले कुछ अपने भी आजमाना चाहता हूं| 

....(प्रदीप यादव 19/06/2012 )

Sunday, 17 June 2012

शहादत की गौरव यात्रा


शहादत की गौरव यात्रा                ...... प्रदीप यादव 


झूठ ही  होगा अगर कहे  सिपाही , जंग सिर्फ उन्होंने लड़ी  थी,

किसानों  ने  धरती का  सीना चीर ,  उन्नत  उपज उपजाई थी,

हाथों को फिर देकर काम  उद्यमी ने कसम उत्थान कि दुहराई थी,

माँओं ने भी पूत  न्योछावर  कर देश के लिए वीरता दिखलाई थी,

जाँबाज जवानों ने भी ठुकरा कर महलों को परचम लहराई थी,

ममता ने खून जिगर का बहनों ने लाली सिन्दुरी छलकाई थी,

ये हिन्द न 
फिर हिन्द होता गर कोख  रण वीरो को जन्म न  दे  पाती,
ये हिन्द न फिर हिन्द होता गर माँ, धरती को माँ कहना न सिखलाती...
(स्वरचित)


अजाब

  अजाब 

  मुफलिसी में जाने कैसे काम  चलता रहा
  मैं पसंद उनको आता रहा,बस काम चलता रहा ,

  रात बैचैन रही लेकिन झौंके आते रहे और 
 काम  चलता रहा ...
  रईसी हुई थी तारी  पैसे  चंद मिल गए और 
काम चलता रहा...

  उलझनों से इश्क़ बेसाख्ता हुआ, जो ना सुलझा पाया तो होश फाख्ता 
हुआ 

  काम आती रही  किसी खास की दुआ, होश खोकर भी अंजाम मुकद्दस हुआ 

  अजाब बन गयी थी, उडती पतंग सी ये ज़िन्दगी,
  दी,
 ढील तो डोर की देख उलझनों को दंग  रह गयी ।   ..... प्रदीप यादव 

Gappbazi

ये आंसू ही तोह थे जो कहते रहे ,
तू अभी तलक मुझमें रही बाकी ,
वर्ना भूलाने को यादों की  चुभन ,
पैमाने की जीनत बनी थी साकी ।
 प्रदीप यादव 
 
    
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 बावस्ता गम से हमने घूँट कड़वे कुछ ज़हर के पीए ,
 होशवालों ने कसम से मशविरे काबिल तमाम दिए ।  ~ प्रदीप यादव
   
   
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 हमने तो ढूंढ रखे थे काँधे कईजनाजे में सहारों के लिए ,

 बस नसीब जाने कंहा से उम्र तलाश लाये जीने के लिए । प्रदीप यादव 

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किसी संगतराश की मूरत से थे वो ,

      अदा पर उनकी  ये  दिल  था हारा ।
चंद  क़दमों  के हमसफ़र  थे वो ,
      किसी भटके को मिला जो सहारा ।  प्रदीप यादव 

      
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इस कदर उलझाए रखना,मेरे मामले को
बेनिफिट ऑफ डाऊट की भी जगह ना हो।  प्रदीप यादव 




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Saturday, 9 June 2012

बारिश का ड्रामा

     बारिश का ड्रामा   

बूँद बूँद  गिर रही थी बारिश , चमक  रही  बिजली , महक सौंधी छा गई ।
पत्ता - पत्ता हुआ सब्ज़ फिर  सुर्ख हुए फूलों पर गुम तितली  भी आ गई ।

दाना चुगती  चिडीया  का घोंसला भी चूजों की चहचहाट से गूँज गया ।
पपीहा की पिहू , कुहुक  कोयल पर  नृत्य मयूर भरमाकर झूम गया।

चाकलेट फंसे दांतों से  लार टपकाते बच्चे अपनी टोलियाँ मैं ,  
 फिर सिमट आते  छातों मैं ।
तो कुछ धमाल मचाते जा फिसलते कीचड़ भरी  डबरीयों मैं ,
 लोटते थे कई नर्म घांसों मैं ।

देखो बाबू यह पहली बारिश का ड्रामा, हर पात्र  अपना बेस्ट दे रहा है।
जाने कौन कहता कट , लाइट  साउंड और ऐक्शन कोइ कह गया है ।

इन्द्रधनुषी रंगों से रंगा आसमान से धरती पर पर्दा सा हरपल डोल रहा है ।
गड़गड़ाते  बादलों  की  कोर से झिलमिलाती  किरणों की राह खोल रहा है ।

बारिश का ड्रामा By ~ प्रदीप यादव ~