पुर्वाग्रह ( भक्त और भगवन के )
मैं मझधार का अटका नाविक ,
शरणागत वत्सल को रहा पुकार,
अब दरस दो लगाओ मुझे पार ,
तेज धार संघर्ष की हताशा ,
मन के कुरुक्षेत्र का भ्रमण,
पल प्रत्येक बढ़ रही व्याकुलता ,
करो जिजीविषा का शमन ,
लहरों का सांकेतिक वार था क्रूरतम,
स्मृति काल में याद आ रहे प्रियतम,
हरो अब मेरे संकट ,
राह करो मेरी निष्कंटक,
अभिमान तार तार करने की परीक्षा,
माटी के जीव को गीता ज्ञान की समीक्षा,
मेरे अकिंचन मन को निःशेष आमंत्रण,
मुझे स्वर्ग के अनुभूत का निमंत्रण ?
नहीं,मैं तो जीवन संघर्षों से ही पार का यत्न करूंगा।
स्वार्गिक सुखों की चाह नहीं भगवन ,
आत्मज मेरी राह देखते होंगे,
विरह में मेरी आकुल होंगे,
उनके प्रति मेरे कर्त्तव्य अधूरे हैं,
जीवन की धुरी की पुकार अनसुनी कैसे कर दूं ,
मेरे हृदयस्थ को अकेला छोड़ कैसे चल दूं ,
क्षमा करना ये धार कुछ मद्धम पड़ गयी है।
राह किनारों की सूझ गयी है।
संशय के घनेरे मेघों से किया अहं का परित्राण
क्लांत अंतर्मन शीतल कर लूँ ,
मैं ध्यान धर फिर तुझ को भजूँ ,
करूणाकर हर क्षण मुझ पर उपकार तुम्हारा,
मुझे अंगीकार कर दिया सहारा,
सर्वांगिण थे तुम नाथ सर्वदा,
दुर्गुण चित ना धरो परमात्मन ,
मैं ही भूल गया था , भक्त मर्यादा । ....~ प्रदीप यादव ~ (स्व-रचित )
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