चाँद को सन्देशा
बडे मूड में हो चांद,बादलों से बाहर फिर आ जाओ ,
बिखरा जाओ इस धरती पर वही मनमोहिनी चांदनी ,
चांदनी पर किरणों की जलतरंग सुना जाओ,
बहकी हवा से बढती मदहोशी की खुमार,
तुमसे ही कहता है दिन गिनता कोई प्यार,
तुम्हारी नीली ठंडी उजास परवान चढाती पीर विरह की,
कोमल कुमुदिनी भी रहती है भटकी भटकी,
भरमाये पंछी भी रोशनी से उड़ते विचरते हैं,
किनारों पर उभर आए समंदर को भी समझाओ,
बड़े मूड़ में हो चाँद, बादलों से फिर बाहर आ जाओ
तुम्हें देख लगता है पुरखा कोइ मेरा है आया करीब ,
नाप रहा हो इस दूरी को जैसे लिए हाथों कोई ज़रीब,(an old scale)
अपना ठिकाना दिल की बस्ती जिसमें कई यादें रहतीं
मान भी जाओ,मैं दिल से तुमसे कुछ कह्ता हूं ,
मेरे अपने तुम्हें देख कुछ चाह रहे हो जतलाना ,
ढांढस उन्हैं मेरी खैरियत का तुम दिलवाना ,
बस कहना फिक्र ना करें,यंहां सब ठीक है ।
.....(स्वरचित प्रदीप यादव )
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