Sunday, 17 June 2012

Gappbazi

ये आंसू ही तोह थे जो कहते रहे ,
तू अभी तलक मुझमें रही बाकी ,
वर्ना भूलाने को यादों की  चुभन ,
पैमाने की जीनत बनी थी साकी ।
 प्रदीप यादव 
 
    
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 बावस्ता गम से हमने घूँट कड़वे कुछ ज़हर के पीए ,
 होशवालों ने कसम से मशविरे काबिल तमाम दिए ।  ~ प्रदीप यादव
   
   
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 हमने तो ढूंढ रखे थे काँधे कईजनाजे में सहारों के लिए ,

 बस नसीब जाने कंहा से उम्र तलाश लाये जीने के लिए । प्रदीप यादव 

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किसी संगतराश की मूरत से थे वो ,

      अदा पर उनकी  ये  दिल  था हारा ।
चंद  क़दमों  के हमसफ़र  थे वो ,
      किसी भटके को मिला जो सहारा ।  प्रदीप यादव 

      
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इस कदर उलझाए रखना,मेरे मामले को
बेनिफिट ऑफ डाऊट की भी जगह ना हो।  प्रदीप यादव 




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1 comment:

  1. talasha tha zindgee ko jisne bas tum ho vo ladkiyon,
    ashay abla nirbal komal ya "durga" khud ko banalo ladkiyon..........By Pradeep

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