खलिश के माने
बूंदों को नदीया की,नदीया को समंदर की और समंदर भी जब घुमडते बादलों की चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के बावजूद
बूंदों को नदीया की,नदीया को समंदर की और समंदर भी जब घुमडते बादलों की चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के बावजूद
दो ' बूँद ' मीठे पानी को तरसता है । जीवनचक्र का होना ही तो
K H A L I S H का आधार बनता है।
K H A L I S H का आधार बनता है।
निदान भी वही होता है। किसी कमी के होने का एहसास है खलिश ....
... प्रदीप यादव
... प्रदीप यादव
No comments:
Post a Comment