Monday, 24 December 2012


सारी रात सुनी अदब ओ तहज़ीब की लियाकतें ...
कल मुशायरे की रात थी परदेसी था मेहमां मेरा।

हालात थे जंगी पर माहौल पुरसुकूं हुआ,
नदीम जब मुखातिब हुए देवबंद से आए,
वोह पियाले-पियाले पिलाते गए,
रहा आबे ज़मज़म का सा मुरीद उनका,
ये शहर-ए-'राहत' मेरा ....
दिल में उतरती गई लफ्ज़ दर लफ्ज़
सीख ऐ 'मुन्नव्वर' ....
लबों पे तारी था बस ... वाह क्या कहना .....

मुशायरा "शब् ए सुखन " 21दिस.2012  इंदौर के अभय प्रशाल में
रिपोर्ट  By... 
Pradeep Yadav

ये सोचते थे उस रात मुशायरे में दानिशमंद सफीर जनाब डॉ. राहत 'इन्दोरी'
हम अपने शहर में सौ-सौ जन्नतें बनाएंगे,
लेकिन दोस्तों इतने फरिश्ते कहाँ से लाएंगे ...... By राहत "इंदौरी"


इसी गली में वो भूखा किसान रहता है।
ये वो जमीं है जहाँ आसमान रहता है।।
मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े।
कि इस पे चिड़ियों का इक खानदान रहता है।।
सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा।
हमेशा चोट का ताजा निशान रहता है।।
तुम्हारे ख्वाबों से आँखों महकती रहती हैं।
तुम्हारी याद से दिल जाफरान रहता है।।
ग़ज़ल संग्रह 'सब उसके लिए' -पृष्ठ संख्या 88 से ( by ..मुन्नवर राना )


मौला  सुखन ऐ मुन्नवर  को  लम्बी उम्र  दे ,
इस औलिया में सुकून-ओ- ईमान रहता है।

~ प्रदीप यादव ~

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