Friday, 26 April 2013

प्रेम का मन्त्र


शुभ दिवस आ. मित्रों
कुछ बातें दनिया में वज़नदार होती तो ज़रूर हैं,
लेकिन क्या कम नहीं कि भारीपन दूर करती हैं। ~ प्रदीप यादव ~ 


प्रेम का मन्त्र 

जब तक संतोष का मंत्र हम नहीं
सीखते कोई और मन्त्र प्रभावी
ही नहीं होता,
ज्ञान का मन्त्र विवेक होता हैं,
आस्था का मन्त्र निष्ठां होती है,
भोग लिप्सा का प्रतिफल है,
स्नेह का आविर्भाव उदारता है,
प्रेम का रंग देने के भाव में ही है।
निष्काम याचना प्रेम शक्ति देती है।
किन्तु प्रेम और भक्ति ईश्वरीय
प्रसाद है आनादर करने वाले या
असहिष्णु अहंकारी इसकी सिर्फ
कल्पना भर कर सकते है।

यह प्रलोभनों से प्रभावित नही होता,

आत्मनुरागी हो अहंकारी भी नहीं होता,
विषयों के अधीन मलिन भी नहीं होता,
एक सतत सुधारवाद की परीक्षा हैं प्रेम।

~ प्रदीप यादव ~   


वोह नील फूल को रख लेना सहेज़ कर ,
आकाश के आँगन पर जब सूरज होता,
तो यही नीला फूल किरणों को बिखेरता,
मेरे वितान में भी यह प्रदीप सा शोभित,
सूरज सी अगन रखता हैं तप्त हो क्रमित,
कर्म का क्रम, उपाय का क्रम धोकर पीत,
आभ में नतमस्तक होगी सुरुचि की प्रीत,
भोर होते ही तारों संग चंद्र होता निरापद,
स्वयं तो फूल की गंध से परे हटो नीलाभ,
तेज ये बंजरपन लिए है अन्यमयस्क फूल,
तू है प्रतिभा रंग नमी गंध का अदभुद मेल। प्रदीप यादव ~

Wednesday, 24 April 2013

शुबहा



शुबहा  


ए शीशे सा दिल रखने वाले,
दुआ है पत्थर ये मोम हो जाए।
तुझे टूटने का दर्द न हो
अलामते शुबहा भी न बढ़ने पाए। 
 ~ प्रदीप यादव ~




Monday, 22 April 2013

कालिख



कालिख 


यूँ बिखर चूका हूँ
अपने मयार से,
छितरे छितरे होकर,
बस अब तोह कोई ,
कालिख ही इन
बिखरते रंगों को
सहारा दे तो दे । ~  प्रदीप यादव ~

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उतर के इस दिल में हरजू है बसा हुआ तू ,
खतावार से दिल का दारोमदार ले गया तू। ~ प्रदीप यादव ~  


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नहीं थी तकलीफ की महज़ एक बयानबाजी,
दोस्त मेरे इमानदार मुहब्बत की है ये खुद्दारी,
बनावटी फुलों पे मुस्कुराने वाले और रहे होंगे,

उन आँखों में आंसू लहू की बूंद को तरसे होंगे। । ~ प्रदीप यादव ~   

उमड़ते सैलाब

उमड़ते सैलाब 


दिल में उठते तूफानों का माज़रा समझेंगे क्या,
वोह हवाओं की रफ़्तार से लुत्फंदोज़ होनेवाले। ~ प्रदीप यादव ~ 




Dil mei uthe tufaan ka mazara samjhte kya,
woh hawaon ki raftaar ka lutf lene waale ....
~  PRADEEP YADAV ~



क्यूँ हरेक उमड़ते सैलाब का सबब बतला कर
सूखता रहा झरना भी खुद मेहों को रिझाकर।   ~ प्रदीप यादव


kyun Harek  Umadate  Sailaab ka sababa  batlakar,
Sukhta raha jharnaa bhi khud mehon ko rijhaakar .
 ~  PRADEEP YADAV ~




Sunday, 14 April 2013

रविवारों के दिन ( The Sunday Post )


रविवारों के दिन By ~ Pradeep Yadav ~  
सुबह का विश्वास, रविवार की अलसाई सुबह,
अपना परिवार ही कुछ नया सा लगता है दोस्तों ....
क्या करें ? मैं ही बताऊँ ....साधारण सुंदर सी किन्तु
आपको ही बयान करती पोषाक ( attire ) पहन कर,
हल्का और उपयुक्त नाश्ता लेकर धीमे और विनोदपूर्ण
तरीके से सभी परिवारिक सदस्यों को साथ ले केवल
मधुर स्मृतियों को अपनी बातों का विषय बनाते चलें,
जब आप बात करें तो बीच में पत्नी या पति को छेड़ती
सी नजर से देखें ...... हाँ ज्यादा आशिक मिजाजी पर
आ जाएं तो तुरंत ही आँखों से ही डपट दें .....
आप के रिश्ते आपके बच्चों के लिए भी आदर्श होते हैं,
अतः जब आप का जीवन के लिए चुराया गया समय
जीने के योग्य गुणवत्ता वाला होने लगे तो उन सभी के
धन्यवाद स्वरूप साथ में पिकनिक, फोटोशूट या खेल
आदि की गतिविधि जरूर प्लान करें।
कभी कभी दूसरों के लिए खुश रहना भी ज़रूरी हैं ...
व्यस्तताएं तो पीछा ही नहीं छोडेंगी पर जीवन में रंग
भरने की कोशिशें इसे जीने का मुद्दा देती रहेंगी ।
हाँ,....सारा आज ही सुन लो अगले रविवारों के
लिए भी तोह कुछ रखो ..... क्रमशः                        ~ प्रदीप यादव ~2013 April 14,

Labrez huaa lafz dar lafz Housalaa,
utthaa lete hain aaj aasmaan sar .....  ~ Pradeep yadav  ~
लबरेज़ हुआ लफ्ज़ दर लफ्ज़ हौसला
चलो, उठा लेते हैं आज आसमां सर .....   ~ प्रदीप यादव ~

बातें राज़ की सरे महफ़िल खोल दें ...
तौबा कल सुर्खियाँ ही जाएंगे,
हिज़ाबों में महदूद रहनेवाले ....  ~ प्रदीप यादव ~
batein raz ki sare maehfil khol dein ...
toubaa kal surkhiyan hi ho jaeinge
hizabon mei mehdud rahnewale .... ~ Pradeep yadav  ~



रविवारों के दिन ....( The Sunday Post )
 By Pradeep Yadav
क्या कहूं इस बार एक बच्चे ने पूछ ही लिया ...... अंकल !क्या दिल्ली में आमीर खान वाला
शो नहीं आता, बेड अंकल लोग बच्चों को क्यों परेशान करते हैं ....... ।

कभी कभी टीवी प्रस्तोता की भेंट भी उनके चरित्र वाले अंकल से हो जाती है और तब मासूम
सवाल की मर्यादित जिज्ञासा के चलते उनकी तरह लोग अपने बच्चों को सही गलत की जान
-कारी नहीं दे सकते । मनुष्य स्वभाव स्वार्थ की या कभी अहम् की वजह से विकारों का
मूल्यांकन या उसकी भयावहता को समझने का परिश्रम नहीं करता।
जब चिंता के लिए हमारे पास समय होता है,तो परिस्थियों से लड़ने और जीविकोपार्जन की
जवाबदेही आदी में समय कब निकल जाता है की हम दुसरे के दुःख को देख कर भी अपने ही
सपनों का संसार बुनने में लगे रहते हैं। मेरे एक मित्र खाने के शौक़ीन हैं वे यह भी जानते हैं कि
खाना सेहतमंद बनाता है तो सेहत को बुरी हालात तक भी पहुँचाता हैं वे महीने के कुछ दिन
उपवास और सैर करने निकलते,वहां उनके एक योग गुरु मित्र बन गए वे कर्मकांड के ज्ञाता भी
थे उन्ही की सलाह पर वे एक रुग्णालय के बच्चों को खाना दान करने जाते।एक दिन मैं भी अनके
साथ हो लिया, रास्ते से कुछ टाफियां खरीद कर मैंने भी मित्र के साथ रुग्णालय पहुँचा। बच्चों को
मिलने से पूर्व एक बड़े हाल में बैठाया गया, हालात और बीमारी से जूझते बच्चे हमारी और नहीं
उन्हें मिलने वाले खाने के पैकेट्स को देख्रते, कुछ बच्चे ही थे,जिनके लिए आँखों से ही सही हमारे
प्रति भाव झलका और वे पैकेट्स ले चुके तो विचारों की हांड़ी में फिर से उबाल आया ही था की तभी
हमारे पीछे खड़े एक सेवा भावी परिवार के बच्चे ने मुझ पर ये सवाल दाग दिया।
 ..... आप ही बताइए निरुत्तर रहना ही ठीक था क्या ???  ~ प्रदीप यादव ~


Saturday, 13 April 2013

महक मिट्टी से।।



महक मिट्टी से।।



सोचा है क्यूँ ?
अमिताभ किरणों से,
मोती सी चमकी
 बूंदें कैसे।

कंहाँ चली जाती है,
बारिशों के बाद,
महक सौंधी सी मिटटी से।


हरी भरी फुनगियों पे,

चहकते परिंदों के हाथ,
आते परवाने जैसे।


आस को पोसते,
ले बीज धरती चली,
निभाने दोस्ती ज़िंदगी से। 


दीवाने 
कर फूलों के वादे,
ज्यूँ रचा लेते हों,
जन्मों का संसार जैसे। 


  ~  प्रदीप यादव ~

Khoj ki tahreeq



गद्दार वफ़ा ,
दुनियादारी की हुई अदा ।  ~  प्रदीप यादव ~


मगरुरियत बंधी फ़रियाद हूँ
      दर्द की सच्चाई से भीगता हिसाब हूँ ,
हाँ मैं फ़क्त एक और बेवफा हूँ,
       धुंधले जख्मों की हरी याद हूँ । 

   
  ~  
प्रदीप यादव ~


"magrooriyat se Bandhi fariyad hoon,

 dard ki sachhai se bhigata Hisab hoon,


 haan main Faqt Ek aur bewafa hoon,


 dhundhle Zakhamon ki hari yaad hoon."


  ~ Pradeep Yadav ~



यूँ काँच से कटने सा 
दर्द नकी आँखों में देखा हैं ...
दर्दी कीमत बढ़ा गया जबसे दरकिनार किया हैं। ~  प्रदीप यादव ~


ए सितारों के आशियानों में रहने वाले,
ज़मीं पे भी कभी ठिकाना तोह बना ,
हस्तियों की किस्मत तराशने वाले,
तिनकों के सहारे ढूँढते से नज़रें मिला।
 
~  प्रदीप यादव ~


Tuesday, 9 April 2013

रंग की कोशिश

 ....

यूँ छुपा लेता है वोह हर बात ठहाकों में

मेरे दर्दमंद होने की बात,
सरक गयी हो जैसे कोई रात ,
चाँदनी की तन्हाई में,...
मेरे होश की दवा करने वालों,
ज़रा कह दो साकी से,
खोते थे हम सुरूरे यार के बाद,
पैमाने तंग हैं नम्हाई में,..
जिस दौर में होती थी मुलाक़ात,
जमाने भर की उनसे,
काबिल दिल ना समझा हालात,
दिलों को बहलाने में,....
मुश्किलों भरे ज़िदगी में उलफत,
के बेखबर तराने हैं ,....
जिनसे थी हुई प्यार की शुरुआत,
अब मंज़र वो बेगाने थे ....
सफर पर जान थी मेरी
जंगजू जाबांज दीवाने थे ...
इसे मेरी ही हसरत समझो,
जान देश की आन पर
कुर्बान की



. ~ प्रदीप यादव 


ना चाहे कोई कहना कुछ भी अगर,
रंग बयान करते गए कहानी मगर'।  ~ प्रदीप यादव




















भूत वाला दरख्त



भूत वाला दरख्त ...

लदा था दरख़्त जो सूखा सा है अभी
सब्ज़ टहनियों से और परिंदों की कूक से,
गूंजता ये रहता था कभी,
बसते नीडों से पनपते फूलों से ,
मीठे फलों को चुराते बालकों से,
छाँह में सुस्ताते कारोबारियों से,
मैं , अरे!! मैं ही तोह वोह भूत हूँ
उलटा लटका देखता था नज़ारे,
डर कर भूत से रात भागते थे सभी,
मेरे पेड़ के सहारे कभी गम में ,
डूबा सा शराबी आया था एक रात,
पकड तने को पेड़ के उगले ज़स्बात,
भीगती थीं मेरी आँखें सुन बद्दुआएं
दूर किया परिवार उसका जालिम ने,
थोड़ी देर में हुई सेहर शराबी लौट गया,
पेड़ उस दिन से वीरान हो गया,
मैं मेहमान था मैं इस पेड़ का
पर पथिकों को मुझसे ही डर था।
मैं जानता हूँ वो कहते रहै,
इस पेड़ को भूत ने वीरान किया।
सच तो हैं, हाल सच्चे दिल के टूटने का
सुनकर बद्दुआ ने पेड़ का हिसाब किया।
डरता नहीं में भी पर उस दिन से मैं,
बराबर इबादत में हूँ की रहम कर मौला,
टूटते दिलों को करार दे इस रूहानी दुनिया
से मेरा भी उद्धार भेज दे ,
इस भूत को अब मत ज़स्बात दे।

By ...... ~ प्रदीप यादव

Thursday, 4 April 2013

सफल रहो बेटियों

   
   
सफल रहो बेटियों ....

  तलाशा जिंदगी ने जिसे इस जहां में वो तुम हो बेटियों,
  अबला नहीं अब गौरवान्वित होकर सफल रहो बेटियों।
    ~  प्रदीप यादव ~




Monday, 1 April 2013



आ.डॉ राहत इन्दोरी साहब शेर पेश ए नज़र है ...
Woh gazalgo ho ke matlabparsti kartaa gyaa,
sharifon ki basti mein 'rahat'naqaab bechta gayaa .... ~ Pradeep Yadav ~

वोह ग़ज़लगो हो के मतलब परस्ती करता गया,
शरीफों की बस्ती में 'राहत' नकाब बेचता गया। ~ प्रदीप यादव ~