Tuesday, 9 April 2013

रंग की कोशिश

 ....

यूँ छुपा लेता है वोह हर बात ठहाकों में

मेरे दर्दमंद होने की बात,
सरक गयी हो जैसे कोई रात ,
चाँदनी की तन्हाई में,...
मेरे होश की दवा करने वालों,
ज़रा कह दो साकी से,
खोते थे हम सुरूरे यार के बाद,
पैमाने तंग हैं नम्हाई में,..
जिस दौर में होती थी मुलाक़ात,
जमाने भर की उनसे,
काबिल दिल ना समझा हालात,
दिलों को बहलाने में,....
मुश्किलों भरे ज़िदगी में उलफत,
के बेखबर तराने हैं ,....
जिनसे थी हुई प्यार की शुरुआत,
अब मंज़र वो बेगाने थे ....
सफर पर जान थी मेरी
जंगजू जाबांज दीवाने थे ...
इसे मेरी ही हसरत समझो,
जान देश की आन पर
कुर्बान की



. ~ प्रदीप यादव 


ना चाहे कोई कहना कुछ भी अगर,
रंग बयान करते गए कहानी मगर'।  ~ प्रदीप यादव




















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