Sunday, 14 April 2013

रविवारों के दिन ( The Sunday Post )


रविवारों के दिन By ~ Pradeep Yadav ~  
सुबह का विश्वास, रविवार की अलसाई सुबह,
अपना परिवार ही कुछ नया सा लगता है दोस्तों ....
क्या करें ? मैं ही बताऊँ ....साधारण सुंदर सी किन्तु
आपको ही बयान करती पोषाक ( attire ) पहन कर,
हल्का और उपयुक्त नाश्ता लेकर धीमे और विनोदपूर्ण
तरीके से सभी परिवारिक सदस्यों को साथ ले केवल
मधुर स्मृतियों को अपनी बातों का विषय बनाते चलें,
जब आप बात करें तो बीच में पत्नी या पति को छेड़ती
सी नजर से देखें ...... हाँ ज्यादा आशिक मिजाजी पर
आ जाएं तो तुरंत ही आँखों से ही डपट दें .....
आप के रिश्ते आपके बच्चों के लिए भी आदर्श होते हैं,
अतः जब आप का जीवन के लिए चुराया गया समय
जीने के योग्य गुणवत्ता वाला होने लगे तो उन सभी के
धन्यवाद स्वरूप साथ में पिकनिक, फोटोशूट या खेल
आदि की गतिविधि जरूर प्लान करें।
कभी कभी दूसरों के लिए खुश रहना भी ज़रूरी हैं ...
व्यस्तताएं तो पीछा ही नहीं छोडेंगी पर जीवन में रंग
भरने की कोशिशें इसे जीने का मुद्दा देती रहेंगी ।
हाँ,....सारा आज ही सुन लो अगले रविवारों के
लिए भी तोह कुछ रखो ..... क्रमशः                        ~ प्रदीप यादव ~2013 April 14,

Labrez huaa lafz dar lafz Housalaa,
utthaa lete hain aaj aasmaan sar .....  ~ Pradeep yadav  ~
लबरेज़ हुआ लफ्ज़ दर लफ्ज़ हौसला
चलो, उठा लेते हैं आज आसमां सर .....   ~ प्रदीप यादव ~

बातें राज़ की सरे महफ़िल खोल दें ...
तौबा कल सुर्खियाँ ही जाएंगे,
हिज़ाबों में महदूद रहनेवाले ....  ~ प्रदीप यादव ~
batein raz ki sare maehfil khol dein ...
toubaa kal surkhiyan hi ho jaeinge
hizabon mei mehdud rahnewale .... ~ Pradeep yadav  ~



रविवारों के दिन ....( The Sunday Post )
 By Pradeep Yadav
क्या कहूं इस बार एक बच्चे ने पूछ ही लिया ...... अंकल !क्या दिल्ली में आमीर खान वाला
शो नहीं आता, बेड अंकल लोग बच्चों को क्यों परेशान करते हैं ....... ।

कभी कभी टीवी प्रस्तोता की भेंट भी उनके चरित्र वाले अंकल से हो जाती है और तब मासूम
सवाल की मर्यादित जिज्ञासा के चलते उनकी तरह लोग अपने बच्चों को सही गलत की जान
-कारी नहीं दे सकते । मनुष्य स्वभाव स्वार्थ की या कभी अहम् की वजह से विकारों का
मूल्यांकन या उसकी भयावहता को समझने का परिश्रम नहीं करता।
जब चिंता के लिए हमारे पास समय होता है,तो परिस्थियों से लड़ने और जीविकोपार्जन की
जवाबदेही आदी में समय कब निकल जाता है की हम दुसरे के दुःख को देख कर भी अपने ही
सपनों का संसार बुनने में लगे रहते हैं। मेरे एक मित्र खाने के शौक़ीन हैं वे यह भी जानते हैं कि
खाना सेहतमंद बनाता है तो सेहत को बुरी हालात तक भी पहुँचाता हैं वे महीने के कुछ दिन
उपवास और सैर करने निकलते,वहां उनके एक योग गुरु मित्र बन गए वे कर्मकांड के ज्ञाता भी
थे उन्ही की सलाह पर वे एक रुग्णालय के बच्चों को खाना दान करने जाते।एक दिन मैं भी अनके
साथ हो लिया, रास्ते से कुछ टाफियां खरीद कर मैंने भी मित्र के साथ रुग्णालय पहुँचा। बच्चों को
मिलने से पूर्व एक बड़े हाल में बैठाया गया, हालात और बीमारी से जूझते बच्चे हमारी और नहीं
उन्हें मिलने वाले खाने के पैकेट्स को देख्रते, कुछ बच्चे ही थे,जिनके लिए आँखों से ही सही हमारे
प्रति भाव झलका और वे पैकेट्स ले चुके तो विचारों की हांड़ी में फिर से उबाल आया ही था की तभी
हमारे पीछे खड़े एक सेवा भावी परिवार के बच्चे ने मुझ पर ये सवाल दाग दिया।
 ..... आप ही बताइए निरुत्तर रहना ही ठीक था क्या ???  ~ प्रदीप यादव ~


1 comment:

  1. आपका घर व्यवहार दाम्पत्य संबंधों को धुरी देने का कार्य मुखिया बन पुरुष करता हैं बच्चों के पालन के संस्कार के अंकुरण और सामंजस्य को बैठाने की जिम्मेदारी महिला की होती हैं ..... किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक संसाधनों की चाह, प्रतिस्पर्धा का तनाव, और स्वयं को अधिक जिम्मेदार मानने से पैदा हुए असंतोष और अहम् का सामंजस्य बिठाने की विफलता से टूट रहे हैं परिवार ....

    ReplyDelete