महक मिट्टी से।।
सोचा है क्यूँ ?
अमिताभ किरणों से,मोती सी चमकी बूंदें कैसे।
कंहाँ चली जाती है,
बारिशों के बाद,
महक सौंधी सी मिटटी से।
हरी भरी फुनगियों पे,
चहकते परिंदों के हाथ,
आते परवाने जैसे।
आस को पोसते,
ले बीज धरती चली,
निभाने दोस्ती ज़िंदगी से।
दीवाने कर फूलों के वादे,
ज्यूँ रचा लेते हों,
जन्मों का संसार जैसे।
~ प्रदीप यादव ~
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