भूत वाला दरख्त ...
लदा था दरख़्त जो सूखा सा है अभी
सब्ज़ टहनियों से और परिंदों की कूक से,
गूंजता ये रहता था कभी,
बसते नीडों से पनपते फूलों से ,
मीठे फलों को चुराते बालकों से,
छाँह में सुस्ताते कारोबारियों से,
मैं , अरे!! मैं ही तोह वोह भूत हूँ
उलटा लटका देखता था नज़ारे,
डर कर भूत से रात भागते थे सभी,
मेरे पेड़ के सहारे कभी गम में ,
डूबा सा शराबी आया था एक रात,
पकड तने को पेड़ के उगले ज़स्बात,
भीगती थीं मेरी आँखें सुन बद्दुआएं
दूर किया परिवार उसका जालिम ने,
थोड़ी देर में हुई सेहर शराबी लौट गया,
पेड़ उस दिन से वीरान हो गया,
मैं मेहमान था मैं इस पेड़ का
पर पथिकों को मुझसे ही डर था।
मैं जानता हूँ वो कहते रहै,
इस पेड़ को भूत ने वीरान किया।
सच तो हैं, हाल सच्चे दिल के टूटने का
सुनकर बद्दुआ ने पेड़ का हिसाब किया।
डरता नहीं में भी पर उस दिन से मैं,
बराबर इबादत में हूँ की रहम कर मौला,
टूटते दिलों को करार दे इस रूहानी दुनिया
से मेरा भी उद्धार भेज दे ,
इस भूत को अब मत ज़स्बात दे।
By ...... ~ प्रदीप यादव ~
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