Monday, 22 April 2013

कालिख



कालिख 


यूँ बिखर चूका हूँ
अपने मयार से,
छितरे छितरे होकर,
बस अब तोह कोई ,
कालिख ही इन
बिखरते रंगों को
सहारा दे तो दे । ~  प्रदीप यादव ~

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उतर के इस दिल में हरजू है बसा हुआ तू ,
खतावार से दिल का दारोमदार ले गया तू। ~ प्रदीप यादव ~  


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नहीं थी तकलीफ की महज़ एक बयानबाजी,
दोस्त मेरे इमानदार मुहब्बत की है ये खुद्दारी,
बनावटी फुलों पे मुस्कुराने वाले और रहे होंगे,

उन आँखों में आंसू लहू की बूंद को तरसे होंगे। । ~ प्रदीप यादव ~   

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