Wednesday, 18 September 2013

माँ के हाथों की रोटी ...

FB              २९\ ९

माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...



कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,

लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |

बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ , 
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |

By ~ प्रदीप यादव ~

Tuesday, 17 September 2013

हमारी भी दास्ताँ



हमारी भी दास्ताँ 


इश्को हुस्न की मारा मारी हैं ,
गिन-गिन के बदले हम देते गए ,
दीवाने थे जिसके हम उस पे , 
इल्ज़ाम भूल जाने का धर गए | 

नई बात थी कोई बतलाने की ,
इस बहाने उस से मिलते ही गए,
शान ये होती हमारे चाहने की , 
वोह आए गुले उल्फत खिल गए | ~ प्रदीप यादव ~
  
FB            २८\९ 

जो दिया किसी ने खुशी के लिए सहारा ,
आप खुशी का उसकी भी रखना ख्याल ,
खुदा देता हैं हर बंदे को अदा उल्फत की ,
दिलों से सिर्फ नफरतों को बाहर रखना | ~ प्रदीप यादव ~


FB             २९\९ 


है माले मुफ्त का दौर यहाँ ,
वजीर चुप जनता बेज़ार है ,
युवराजों में खुन्नस का माहौल ,
महारानीयाँ उडाती रहती ,
शिष्टाचार का मखौल,
जित खोजें  तित पाईऐ,
भ्रष्टाचार ओ घोटाले अनमोल ,
बने संस्कृति रक्षक वही,
जिनके रहे आस्थिर खोल ,
हाथ लड़ाई जो लड़ा ,
हुआ उसी का डिब्बा गोल ,
बजा करते कभी जिनके डंके  ,

मंसूबे टूटे ,फट गए थे ढोल |  ~ प्रदीप यादव

Friday, 13 September 2013

हिंदी दिवस




FB       १९\९ 


आपका आभिवादन आदरणीय मित्रों,

हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आपका अभिनन्दन। ….
मेरा दृष्टिकोण हिंदी भाषियों की विशेषज्ञता से अधिक उनमें हिन्दी साहित्य और संस्मरण को पढने की
रुचि से हैं, और हिन्दी जैसी समृध भाषा के साहित्य को सिर्फ इसलिए त्यागना कि भविष्य का साहित्य
तो मेरे आगामी  पीढ़ी  की हिंदी ना जानने की समस्या की  वज़ह से पढ़ा ही नहीं जाएगा मेरी समझ से
अनुचित होगा। हिंदी के प्रयोगकर्ता भाषा, विभाषा, उपभाषा, बोली और अपभ्रंश को समाहित कर अपने व्यवहार प्रदर्शित करते हैं ।
                    बपौती का ,धरोहर का ,तहज़ीब का सम्मान न करें, तो भी गलत होगा ... कुछ आज भी इसी कारण से प्रसिद्ध हैं,  कि ज्ञान की इस  श्रव्य  परम्परा से अनुराग के चलते  वे भारतीय  अध्यात्म के मुख
वर्णित ज्ञान में दक्षता पा गए हैं। परन्तु ज्ञान विनम्र  और  विवेकशील  सिद्धान्तों का अनुसरण द्वारा प्राप्त
होता है ।
आजीविका के लिए ज्ञान अर्जित करना और सफलता के लिए ज्ञान अर्जन दो अलग बातें हैं। एक  अच्छा दुभाषिया कई तरह की  भाषाएँ बोल लिख या व्यवहृत करता हैं इसका अर्थ कदापि नहीं  कि वह सांगोपांग
और सफल हैं। परन्तु  साहित्य कला या साधना  का क्षेत्र उसे ही माना जाता है;जिसमें  पहले से स्थापित  प्रतिमानों  की  टीका, विवेचना, समालोचना अथवा प्रासंगिकता  का  उल्लेख ज्ञानी अपने विवेक से  और संस्कारों की युति  के द्वारा  निर्धारित कर उसके पक्ष में  प्रमाण अथवा सिद्ध प्रयोग रखते हैं .... तभी तोह वे लब्ध- प्रतिष्ठित आविष्कारक, अनुसँधानकर्ता, लेखक, नर्तक,संगठक  अथवा ज्ञान गुरु कहलाते हैं।
बपौती का गर्व  करना भी  मानव  स्वभाव हैं .... या यूँ  कहे कि  मान  लीजिए में मांस भक्षण नहीं करता
कितु मेरे मित्र करते हैं तोह यदि प्रमाण स्वरूप मैं वातावरण और अनेक साम्यताओं के उपरांत भी वही क्षमताएं रखूँ जिसका उपहास मेरे मित्रगण मांसाहार न किये जाने को लेकर करते थे, तोह यह मेरे बपौती
के मूल्यों का सम्मान करना हुआ। किन्तु यदि पर्याप्त ज्ञान के बाद भी बिल्ली द्वारा रास्ता काटने के भय से ग्रसित रहता हूँ  तोह मैं कहूंगा  कि यह मेरा  अंध - विश्वास हैं। अतः नए दृष्टीकोण और अपनी धरोहरों के
संरक्षण के द्वारा ही हम प्रारब्ध प्राप्त कर भाषा को सिरमौर बना कर रहेंगे ।
 ~  प्रदीप यादव ~ 

Wednesday, 11 September 2013

विरहाकुल निशा



FB        १३\९ 


विरहाकुल निशा
… 


अंगवस्त्र सी रात हैं ,

सुकुमार चन्द्र मध्यम ,


रख चांदनी की अभिलाषा ,


मदिर वायु की मादकता ,


व्योम क्षेत्र में नक्षत्रों के ,


मंदिप्त प्रकाश पर ,


चंद्रकलाओं का कर श्रृंगार ,


चन्द्रकान्ता बन संवरती ,


कला-कला कर अस्ताचलगामी ,


शशिपति का योग पाक्षिक है ,

अरुणिमा की टेर तक ,

रजनी के प्रारब्ध की बोधि तक ,

विरहाकुल निशा कृष्णा हो रहती हैं ।  
 

 ~  प्रदीप यादव 

Saturday, 7 September 2013

FB      १०\९

Dil Fareb hain aansu ,
Matlabi ye nigahein .
Hota nahi Duniya mein ,
Wohi jo ham Chahein .
~ Pradeep Yadav ~

दिल फरेब हैं आंसू ,
मतलबी ये निगाहें।
होता नहीं दुनिया में ,
वोही जो हम चाहें॥  
  ~  प्रदीप यादव ~

FB               ११\९ 

शानदार जिक्र हैं ,
बस तेरी ही फिक्र है ,
जुदा कोई हो इश्क ,
मुबारक दोनों से है ।
 ~  प्रदीप यादव ~

Shandaar Ziqr hai ,
Bas Teri hi Fikar hai ,
Juda Koi ho Ishq ,
Mubark dono se hain . ~ Pradeep Yadav ~


Friday, 6 September 2013

कुछ सिहरने , धड़कते रहने का पता देती हैं …
Keep calling your love ।


Ishq ke Fasano ne hamein bhi galiyon mei mumtaz kar diya ,

Doori Maikade se rakhie Saqi ne koi aur daman tham liya .
   
~ Pradeep Yadav ~


इश्क के फसानों ने हमें भी गलियों में मुमताज़ कर दिया ,
दूरी मैक़दे से रखिए साक़ी ने कोई और दामन थाम लिया। ~ प्रदीप यादव ~

Mumtaaz , मुमताज़  =   Famous , प्रसिद्ध , नामचीन


यूँ भी ना हुआ हमसे कि … 

चाँद की तमन्ना भी रख लूँ ;
दागों को देख आदतें भी बदलूं  ॥
 ~ प्रदीप यादव ~

Yun bhi na huaa humse ki …


Chaand ki Tamanna bhi rakh Lun;

Dagon ko dekh Aadatein bhi badalun . Pradeep Yadav ~


Good evening dear  Friends …



Wednesday, 4 September 2013

FB                 ८ \ ९     


उम्मीदों की लाशों को ढोते रहने का कायल 
नहीं मैं अब  ,
इंसाफ के लिए सर पटकने से बेहतर है राहे जुर्म छोड़ दूं ।  ~ प्रदीप यादव ~

Umeedon ki Lashon Ko dhote rahne ka Kayal Nahi Main ab ,
Inasaf Ke liye sar patakne se behtar Rahe Jurm Chhod doon .   

Pradeep Yadav ~

FB          ७\९

दरपन  दरपन बरसी मेह ,
कछू सोखिं कछु रहीं अघाय ,
प्रेमांकुर ताहू उपजो  नाय ,
नार भयी ज्यूँ हिरदै लगाय ।
 ~ प्रदीप यादव ~

Darpan darpan barsi meh ( shower) ,
kachh sokhi kachh rahi aghay ( had Enough ),
Premankur toh upajyo naahee , 
Naar Bhyee jyun hirdaei lagay . ~ Pradeep Yadav ~

A Lovable relation is desired by many can't find some ,

as only some gots the flavour in their heart ...... Pradeep Yadav



Monday, 2 September 2013

रवानगी ( A Path For An Achievement )

 FB           ५ \ ९ 
रवानगी ( A  Path For An Achievement )

हद ए  मंजिल को पाना ,
दीवानगी से कम नहीं ,
तू मंसूब तोह हो सकता है ,
महबूब मिले या नहीं ।

तख्ती लगा दो ,
मेरी रवानगी की प्रदीप ,
अब मंज़िले मिले या के हम !
 ~ प्रदीप यादव ~
 

FB       ४/९ 


काँटों के बीच गुलों का,
गलीचा बिछाकर घूमता है ,
फरामोश है वोहईमान से,
आईने बेचते फिरता है ।
 ~  प्रदीप यादव ~


ऐ गुल…. 
तूने सिर्फ सुन लिया, मैंने तोह सहा था।
किस्सा पंखुरियों ने कहा था।
सहारा तुने दिया बेल सा मन लिपटा था।
सपना उनींदी आँख से टूटा था। 
तरसती निगाह में बेसबर सा इंतजार था।
महक को 
साँसों से प्यार था।  
पीली-पीली धूप ने मुरझाना सिखाया था।     
गुलकंद बन जुबां पे बसा था।   ~  प्रदीप यादव ~


FB           १\९

यूँ रहता है बाक़ी खलिश से इतर भी कुछ ,
दूर अरमान कोई दिल से जिया करता हैं ।   
~
प्रदीप यादव 

Yun Rahata hai baaqi  khalish se itar bhi,
Door armaaan  koi dil se jiaa karta hai .    By ~ Pradeep Yadav ~


Sunday, 1 September 2013

 FB       ३/९

बापू  बनना … 

पथ डिग जाऊं जिस दिन
वचन  तोड़ना अहिंसा वाला ,
मार मुझे टाँगना चौराहे पर,
पथ गुज़रे संदिग्ध हवाला।
खींच निकालना शव मेरा ,
उसे दिखा कर न्यायदण्ड ,
नई खड्ग से यमद्वार दिखाना ,
खाल छीलकर मेरी जुते बना,
खूब दलना खरपतवारों को,
है ये नातेदार नाज़ायज ।

शहीद प्राणों की आहुति देते ,
सर काटने वाला ,
दुश्मन के मन हैं काला,

मेरा चोला निर्लिप्त रहे ,
मुखर रहे बोलों की ज्वाला ,
माँ ,अब ना पीउँगा ये हाला,
तंत्र ( सिस्टम ) के भक्षक को
भेंट करूँ कालपात्र  लहू वाला,
जलता लोकतंत्र स्याह काला ,
मस्त मदांध मतवाला,
तू काहे की जनता है री,
मैं काहे का रखवाला।  BY ... ~ प्रदीप यादव ~

It sayas …. 
" It was My Determination , ….  so they thought me the deserving one ! "

हमराज

 FB         २ \९ 

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें नामों की जुगाड़ से बाहर ,
रह कर अनोखा करते देखा है। ……

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें अंधी दौड़ को पीछे छोड़ ,
बेडौल दुनिया में संतुलित होते देखा है । ….

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें नाचते गाते जिंदगी का
हर लम्हें पर इंतज़ार करते देखा है । …….

मेरे Mystery Mitर , बांकपन से संजीदगी और चुनौती से ,
आँखें मिलाने का दुस्साहस देखा है । …

दोस्त हर राज़ को राज़ रखने की कीमत ना चुकाना ,
हर्ज़ ज़िन्दगी के हमराज भूलाने में नहीं ख़ुशी भुल जाने में है ।

                   
          ~ प्रदीप यादव