FB २९\ ९
माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...
कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,
लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |
बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ ,
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |
By ~ प्रदीप यादव ~
माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...
कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,
लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |
बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ ,
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |
By ~ प्रदीप यादव ~