FB ४/९
काँटों के बीच गुलों का,
गलीचा बिछाकर घूमता है ,
फरामोश है वोहईमान से,
आईने बेचते फिरता है । ~ प्रदीप यादव ~
ऐ गुल….
तूने सिर्फ सुन लिया, मैंने तोह सहा था।
किस्सा पंखुरियों ने कहा था।
सहारा तुने दिया बेल सा मन लिपटा था।
सपना उनींदी आँख से टूटा था। तरसती निगाह में बेसबर सा इंतजार था।
महक को साँसों से प्यार था।
पीली-पीली धूप ने मुरझाना सिखाया था। गुलकंद बन जुबां पे बसा था। ~ प्रदीप यादव ~
FB १\९
यूँ रहता है बाक़ी खलिश से इतर भी कुछ ,
दूर अरमान कोई दिल से जिया करता हैं । ~ प्रदीप यादव ~
Yun Rahata hai baaqi khalish se itar bhi,
Door armaaan koi dil se jiaa karta hai . By ~ Pradeep Yadav ~
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