Tuesday, 17 September 2013

हमारी भी दास्ताँ



हमारी भी दास्ताँ 


इश्को हुस्न की मारा मारी हैं ,
गिन-गिन के बदले हम देते गए ,
दीवाने थे जिसके हम उस पे , 
इल्ज़ाम भूल जाने का धर गए | 

नई बात थी कोई बतलाने की ,
इस बहाने उस से मिलते ही गए,
शान ये होती हमारे चाहने की , 
वोह आए गुले उल्फत खिल गए | ~ प्रदीप यादव ~
  

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