FB १९\९
आपका आभिवादन आदरणीय मित्रों,
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आपका अभिनन्दन। ….
मेरा दृष्टिकोण हिंदी भाषियों की विशेषज्ञता से अधिक उनमें हिन्दी साहित्य और संस्मरण को पढने की
रुचि से हैं, और हिन्दी जैसी समृध भाषा के साहित्य को सिर्फ इसलिए त्यागना कि भविष्य का साहित्य
तो मेरे आगामी पीढ़ी की हिंदी ना जानने की समस्या की वज़ह से पढ़ा ही नहीं जाएगा मेरी समझ से
अनुचित होगा। हिंदी के प्रयोगकर्ता भाषा, विभाषा, उपभाषा, बोली और अपभ्रंश को समाहित कर अपने व्यवहार प्रदर्शित करते हैं ।
बपौती का ,धरोहर का ,तहज़ीब का सम्मान न करें, तो भी गलत होगा ... कुछ आज भी इसी कारण से प्रसिद्ध हैं, कि ज्ञान की इस श्रव्य परम्परा से अनुराग के चलते वे भारतीय अध्यात्म के मुख
वर्णित ज्ञान में दक्षता पा गए हैं। परन्तु ज्ञान विनम्र और विवेकशील सिद्धान्तों का अनुसरण द्वारा प्राप्त
होता है ।
आजीविका के लिए ज्ञान अर्जित करना और सफलता के लिए ज्ञान अर्जन दो अलग बातें हैं। एक अच्छा दुभाषिया कई तरह की भाषाएँ बोल लिख या व्यवहृत करता हैं इसका अर्थ कदापि नहीं कि वह सांगोपांग
और सफल हैं। परन्तु साहित्य कला या साधना का क्षेत्र उसे ही माना जाता है;जिसमें पहले से स्थापित प्रतिमानों की टीका, विवेचना, समालोचना अथवा प्रासंगिकता का उल्लेख ज्ञानी अपने विवेक से और संस्कारों की युति के द्वारा निर्धारित कर उसके पक्ष में प्रमाण अथवा सिद्ध प्रयोग रखते हैं .... तभी तोह वे लब्ध- प्रतिष्ठित आविष्कारक, अनुसँधानकर्ता, लेखक, नर्तक,संगठक अथवा ज्ञान गुरु कहलाते हैं।
बपौती का गर्व करना भी मानव स्वभाव हैं .... या यूँ कहे कि मान लीजिए में मांस भक्षण नहीं करता
कितु मेरे मित्र करते हैं तोह यदि प्रमाण स्वरूप मैं वातावरण और अनेक साम्यताओं के उपरांत भी वही क्षमताएं रखूँ जिसका उपहास मेरे मित्रगण मांसाहार न किये जाने को लेकर करते थे, तोह यह मेरे बपौती
के मूल्यों का सम्मान करना हुआ। किन्तु यदि पर्याप्त ज्ञान के बाद भी बिल्ली द्वारा रास्ता काटने के भय से ग्रसित रहता हूँ तोह मैं कहूंगा कि यह मेरा अंध - विश्वास हैं। अतः नए दृष्टीकोण और अपनी धरोहरों के
संरक्षण के द्वारा ही हम प्रारब्ध प्राप्त कर भाषा को सिरमौर बना कर रहेंगे ।
~ प्रदीप यादव ~
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