Wednesday, 18 September 2013

माँ के हाथों की रोटी ...

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माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...



कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,

लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |

बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ , 
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |

By ~ प्रदीप यादव ~

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (23.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

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    1. आभार नीरज कुमार जी आपकी सदाशयता के लिए ...

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  2. बहुत सुन्दर और संवेदनशील प्रस्तुति...

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    1. आ. कैलाश जी आपका स्वागत है , ... टीप के लिए आभार

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