Saturday, 9 June 2012

बारिश का ड्रामा

     बारिश का ड्रामा   

बूँद बूँद  गिर रही थी बारिश , चमक  रही  बिजली , महक सौंधी छा गई ।
पत्ता - पत्ता हुआ सब्ज़ फिर  सुर्ख हुए फूलों पर गुम तितली  भी आ गई ।

दाना चुगती  चिडीया  का घोंसला भी चूजों की चहचहाट से गूँज गया ।
पपीहा की पिहू , कुहुक  कोयल पर  नृत्य मयूर भरमाकर झूम गया।

चाकलेट फंसे दांतों से  लार टपकाते बच्चे अपनी टोलियाँ मैं ,  
 फिर सिमट आते  छातों मैं ।
तो कुछ धमाल मचाते जा फिसलते कीचड़ भरी  डबरीयों मैं ,
 लोटते थे कई नर्म घांसों मैं ।

देखो बाबू यह पहली बारिश का ड्रामा, हर पात्र  अपना बेस्ट दे रहा है।
जाने कौन कहता कट , लाइट  साउंड और ऐक्शन कोइ कह गया है ।

इन्द्रधनुषी रंगों से रंगा आसमान से धरती पर पर्दा सा हरपल डोल रहा है ।
गड़गड़ाते  बादलों  की  कोर से झिलमिलाती  किरणों की राह खोल रहा है ।

बारिश का ड्रामा By ~ प्रदीप यादव ~ 

2 comments:

  1. Tabhi To bood ko nadiya ki ,
    nadiya ko samandar ki ,
    aur samandar jab ghumdte badal ki
    chadar tan leta hain to apni namkin salhiyat ke bavjood ,
    do" Boond " meete panee ko tarasta hai
    Jeevan Chakr ka privrtan hi to K H A LI S H ka aadhar banta hai nidan bhi vahi hota hai...

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  2. खलिश के माने

    बूंदों को नदीया की ,

    नदीया को समंदर की

    और समंदर भी जब घुमडते बादलों की

    चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के बावजूद ,

    दो ' बूँद ' मीठे पानी को तरसता है ।

    जीवन चक्र का परिवर्तन ही तो K H A L I S H का आधार बनता है

    निदान भी वही होता है । किसी कमी के होने का एहसास है खलिश .....

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