Wednesday, 11 September 2013

विरहाकुल निशा



FB        १३\९ 


विरहाकुल निशा
… 


अंगवस्त्र सी रात हैं ,

सुकुमार चन्द्र मध्यम ,


रख चांदनी की अभिलाषा ,


मदिर वायु की मादकता ,


व्योम क्षेत्र में नक्षत्रों के ,


मंदिप्त प्रकाश पर ,


चंद्रकलाओं का कर श्रृंगार ,


चन्द्रकान्ता बन संवरती ,


कला-कला कर अस्ताचलगामी ,


शशिपति का योग पाक्षिक है ,

अरुणिमा की टेर तक ,

रजनी के प्रारब्ध की बोधि तक ,

विरहाकुल निशा कृष्णा हो रहती हैं ।  
 

 ~  प्रदीप यादव 

3 comments:

  1. .......... बहुत ही सारगर्भित एवं सार्थक रचना !

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    1. स्वागत है संजय भास्कर जी ....

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    2. This comment has been removed by the author.

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