FB १३\९
विरहाकुल निशा …
अंगवस्त्र सी रात हैं ,
सुकुमार चन्द्र मध्यम ,
रख चांदनी की अभिलाषा ,
मदिर वायु की मादकता ,
व्योम क्षेत्र में नक्षत्रों के ,
मंदिप्त प्रकाश पर ,
चंद्रकलाओं का कर श्रृंगार ,
चन्द्रकान्ता बन संवरती ,
कला-कला कर अस्ताचलगामी ,
शशिपति का योग पाक्षिक है ,
अरुणिमा की टेर तक ,
रजनी के प्रारब्ध की बोधि तक ,
विरहाकुल निशा कृष्णा हो रहती हैं ।
~ प्रदीप यादव ~
.......... बहुत ही सारगर्भित एवं सार्थक रचना !
ReplyDeleteस्वागत है संजय भास्कर जी ....
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