Tuesday, 24 July 2012

किस तरह मिलूँ ....


किस तरह मिलूँ ....

क्या ! चाहिए ?
क्या, चाहिए ?
अजी क्या चाहिए,हसरतों का देकर भरोसा,
मीठे पलों को खोजने बस निकल जाइए ।
बेमेल दुनिया से नज़र तो मिलाइए ,
मुलायम पड़ रहे तेवर तो दिखाइए,
कुछ मुस्कुरा कर खामोश हो जाइए ,
रूक जाइए पर कंही खो न जाईए ।
रंगीन रातों का कर इंतजार,
उजले दिनों को न भूलाइए ।
अक्षरों की पढ़ी जो वर्णमाला,
गीत उस पर नया रचाइए ।
साजों पर नगमा सुरीला बैठाइए,
मेल स्वरों का नए रागों से कराइए ।
जिस पते से लौटा था ख़त,एक दिन
तबीअत से जरा ख़टखटाइए ।
मिल जाए जो जवाब ए रजामंद ,
फिर इकरार में सर को हिलाइए ,
सरताज अब बहुत हुआ सम पर तो आइए ।
क्या ! चाहिए ?
क्या , चाहिए ?
अजी छोड़िए ,अब चाहिए ही क्या ।    
 प्रदीप यादव  ~     24/07/ 2012


Monday, 23 July 2012

prady ने कहा बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी अशोक चक्रधर

बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी
 ( डाक्टर अशोक चक्रधर की विशेषज्ञता संस्मरण )
पर मेरी टिप्पणी   ....प्रदीप यादव 23 जुलाई 2012

हिन्दी लिखते मेरे हाथ कांपते हैं ।

हिन्दीभाषी कहते मेरे नाज नखरे गुम जाते हैं।


किसे पढूं किसे नहीं सोच कर सर धुनता हूँ,


मात्रा, छंद,समास,अलंकार मेरी लेखनी को समृद्ध बनाते हैं


… 
 स्वीकारता हूँ !


आजकल दाढ़ी बना कर निकलो …. 


भद्रपुरुष नहीं ,"चिकना" संबोधन मिलता है ।


सच कहूं तो जिस आशय में वह कहा गया होता है,


मन को बड़ा ही अच्छा लगता है ,किन्तु यदि

असावधानीवश कंही साहित्यिकारों के बीच कह गया

तो समझो पार्टी विहीन हो गया । अब बोलचाल का 

प्रोटोकाल आम हिदीभाषीसमझ नहीं पाता और 

आधिकारिक साहित्यिक बंधू,

इसे पचा नहीं पाते ।

प्रलोभन देकर बुलाये,मानसिक CUM क्षुधापूर्ति हेतु आए

हिंदी साहित्यकारों का आकर्षण इस विडंबना पर जाने कब होगा ?

तभी वे किसी फाइव स्टार होटल के अतिथि कक्ष मैं बैठ

स्व-हस्ताक्षरित प्रति
 आम पाठकों तक वितरित कर पाने की

आकांक्षा जगा सकते हैं ।


पर इसे ही कितने समझ पाते हैं ?


लाइन से चलो या लीक से हटकर बहो,


यह कितने समझ,या समझा पाते हैं ।


अवसाद 'शोक' मुमुक्षता, के इस दौर में कितने


'अशोक'
 ' बन हिंदी लिख और कह पाते हैं ।     


प्रदीप यादव ~ 



Friday, 20 July 2012




दुनिया के पांच सबसे मुश्किल काम

भाई साहब, यह मजाक नहीं है, बल्कि हकीकत है।
पढ़ोगे तो हंसते रह जाओगे...


1. वाइफ के साथ शॉपिंग पर जाना...

2. बच्चों के नॉन वेज सवालों का जवाब देना...

3. प्रेमिका के नखरे सहना ...

4. खुद किताब लिखना ...

5. अरेंज मैरिज करना...!!!


जो व्यक्ति यह सभी कार्य कर,
चुका  हो उसे आप किस श्रेणी मैं आंकेगे ....
 1. शूरवीर या
 2.  वीरगति प्राप्त

नया कंफिगरेशन

नया कंफिगरेशन (मुम्बईया )

सच के रिया हूँ मियां जो चाहे वोइज़ कर लो ,
मरने के बाद भी जीने का इश्टाईल जान लो ,
भर्ती आइटम से मंदिर की आरती भी लिख लो ,
एडिटिंग फार्मूले से रंगीन वाली 'ब्लू' कर लो ,
यादों का भरोसा नई  रे बाबा,
बोले तो एकदम एंटी वाइरस ,
अक्कल का अपग्रेडेशन कर लो,
थोडा डिस्क स्पेस भर लो ,
अच्छी वाली  को RAM ,
और बुरी यादों को ROM  कह लो ,
RAM की कम्पेटिबिलिटी ROM की इन्टग्रिटी चेक कर लो ,
धीरे से  डीलीट मारकर बस दूसरी साईट पर कल्टी कर लो ,
उठापटक के इस माहौल मैं प्रोटोकाल का भी ध्यान रख लो ,
मनमर्जी की साइटों पर जाओ कुछ यंहा वहाँ से भी उठा लो ,
टेडी मेढ़ी सामान पर चाहे आर्ट वाला सोफ्टवेअर पोत लो ,
थोबड़े का मेकअप कर फूल खिले गुलशन के बोलो ,
'दही' का दिमाग करके हटेले सलीम को डाईरेक्टर लेलो ,
फ़िलिम के चलने की गारंटी टीवी चेनल रेडियो प्रिव्यू से लो ,
नया कंफिगरेशन आएला हैं बस एक चांस अपुन को भी दो ।


.......
प्रदीप यादव ( स्वरचित )






Yadon ka bharosa na kar ve anti virus jaisi hoti hain | hume akal ka upgredetion de disk par sirf space carry karti hain |achhi aur buri donon yadein kramshah RAM aur ROM jaisi hain , jab bhi RAM ki compatibility check karni ho to ROM ki integrity ka dhyan jaroor rakhiye|  ... Prady

Wednesday, 11 July 2012

उम्र का उतर्राध



   उम्र का उत्तरार्ध   
   उम्र का उत्तरार्ध    

सिरहाने एक मजबूत लकड़ी रखना।
उठूँ जब मैं पास चश्मा,दवा,
जग पानी का साथ गिलास रखना।
पैरों पहनकर चप्पल,
अखबार की सुर्खियाँ पढ़कर,
लौटूं जब मैं पार्क से टहलकर,
दोस्तों के नंबर डायरी में लिखना,

डॉक्टर से मिलने का समय ले लेना,
दांतों के सेट को वहीं खाने की मेज पर रख,
दही, दलिया साथ ही रखना,
इसे भी कुछ सहेज लेना।

शोर बच्चों का परेशान तो करता हे,
फिर भी तुम उन्हें मनाए रखना।
उजाले, तेज आवाजें मौसमी तेवर,
मुझे सताते पर ये सब उम्र के हैं तकाजे,
दरवाजे मेरे कमरे के खुले ही रखना,
घडी में मेरी चाभी देते रहना,
अरे ज़िंदा हूँ मैं लगना भी तो चाहिए।
अच्छे तो हो तुम सब बस मस्त रहना।

रिश्तेदारों से ज़रा अपनापन बनाए रखना।
सूटकेस से तस्वीरें पुरानी मढ़वा भी देना।
कट चली है अपनी तो राम ही के भरोसे।
राज जीने के तुम भुला ना देना ....
शुभकामनाएं तुमको !! जीते रहना मेरे बच्चों ।।


~ प्रदीप यादव ~   

     




श्री कृष्ण जन्मोत्सव


श्री कृष्ण जन्मोत्सव

पग पखार श्यामल,
हुई कालिंदी सांवरी,
रास रचाकर बृजवासी
संग राधा हुई बावरी,

रच गिरधर के भक्ति पद
भय मीराबाई बावरी,
श्याम सुर लगायो,जसोदा
उर आनंद हरषायो,
किशना माखन मटकी चुरायो,
बाजी बाँसुरी धीमे धीमे
गोपिका मन भरमायो,
भजे द्वारिकेष मिश्री माखन,
तुलसी चन्दन,
निर्मल दीप जलायो,
सखी,रंक,संत,राजा,देवता,अधिनायक
सब मिल शीश झुकायो । 

लीलाधर विष्णु के तुम अवतारी, श्याम लला जनम  की आई बारी।  
नंद नटवर कृष्ण गिरधारी आज भजन जुटे हैं नर नारी,
गोपिकावल्लभ मनोहारी ,पूजन में पधारज्यो बलिहारी  
हरे कृष्ण,गोवर्धन,गोविन्द, घनश्याम,गिरधारी गाओ,
झूम झूम सब जन  हरी मन विठ्ठल विठ्ठल ध्याओ ।  
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~ प्रदीप यादव
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Tuesday, 10 July 2012

गुल-आब-जामुन

                    गुल-आब-जामुन 

ए  गुल - आब- जामुन,तिल तिल तरसाना भी तेरा खूब है,
न रंगत तुझमें जामुन सी, ना ही महक से ही  तू गुलाब है।
मेरे अहसास की तुझे खबर नहीं , बस अंदाज तेरा मिठास है,
छुईमुई सी गोल मखमली गेंद की लज्जत बेहद लाज़वाब है। ....प्रदीप स्वरचित
                                              

Monday, 9 July 2012

जग रचनाकार


     जग  रचनाकार 

हे रचनाकार ,
रचियता तुम्हीं रचना तुम ,
हर रचना की कल्पना तुम,
कूची तुम कैनवास तुम,
दृश्य का दृष्टिकोण तुम,
रूप तुम लावण्य तुम,
मधुर मोहक श्रृंगार तुम,

यक्ष्य तुम प्रत्यक्ष तुम,
साकार भी निराकार तुम,
मद्ध तुम मद्धोंमाद तुम,
संशय के परिष्कार तुम,
राग तुम वैराग्य तुम,
दीन के अवतार तुम,

अनुरोध के निदान तुम,
आश्रितों का तारण तुम,
हे अद्वितीय मेरे मन को,
भरमाने का प्रयास तुम,
मन भ्रमर का अंकूश भी तुम.........,

मैं तुम, ज्ञान तुम,
विवेक तुम, मान तुम,
अगम तुम सर्वसुलभ तुम,
आराध्यों का प्रस्ताव तुम,
षठ हम , असभ्य हम,
शिष्ठता का पर्याय तुम,
"देव तुम",  'याचक हम'
हर तृष्णा की तृप्ति तुम ......( by 
)  ~ प्रदीप यादव ~ 


Saturday, 7 July 2012


काँटों भरे गुलाब की पंखुड़ी पर बूँद ओस की गोया खूब है ,
सलाहियतें तमाम , दर्द सहने की मेरी भी बड़ी मगरूर है । ~ प्रदीप यादव ~
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मैं रौशनी को चिराग दिखाने  की जुगत किया करा ,
मौसमी रद्दोबदल का माज़रा जो समझ आ गया था ।
 प्रदीप यादव ~
                                 2012 जुलाई 11 

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कह जो दिया तो आँखों मैं बसे अक्स नम हो ढलक जाएँगे,
मिलते रहे राहेगुजर भी मुलाकात में वो असर नज़र आएंगे ।
प्रदीप यादव ~
21/07/2012
>>>>>            .....................            <<<<<<

main roshni ko diya dikhane ki jugat kiya kara,


mousmee raddobadal ka mazra jo samjh gaya |
प्रदीप यादव ~

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A P N A   K H A Y A L  R A K H N A 



milne ki ummeed khayal rkhna hai,


raste ki khabar khayal rkhna hai,


dhalti rat talk intzar khayal rakhna hai,


lambee hoti duriyon ka andaja khayal rkhna hai,


mukarrar waqut rah e gujar tkna khayal rkhna hai,


Gahe b gahe salamti ki takid karna khayal rkhna hai,


Do bol vida ke kahne ki hasrat khayal rakhna hai,

Bas mere dost bata de ab tu hi ki,


yeh MOHOBBAT karne ka tarika kya hai

  ...... PRADEEP YADAV 18 / 07 / 2012


Friday, 6 July 2012

चाय से चाहत




                 चाय से चाहत     

                                           By.... PRADEEP YADAV



चाय' मेरी तेरी चाहत है,
बिलकुल जैसे रिश्ते,
चाय पतीली की भाप से,
रंगीन ख्वाब दिखाती है,

फिर अपनी महक से
अरमान नए जगाती है,
                          

प्यालियों की खनक से
चुस्कियों की आगोश तलक,

चाय मिलते रहने की
मुहलत दिलाती है,

चाय मर जाती है,
जब प्याली रीती रह जाती है,

पर अफ़सोस नाउम्मिदी का
जताकर फिर से जी जाती है,

सफल हो दिन आज तुम्हारा,
चुपके से कह जाती है ।
... चाय तेरी मेरी चाहत है |


Contd.....
                    
   


कितने दिनों से वो रहे कतराते ,         
गिरह भी क्या खूब रही नजरो की,
         

इंतजार मैं झुकी थीं ,बही यादों मैं,फिर खो रही आँखों ही आँखों मैं,
          प्याली प्याली मौन ने,
          आमंत्रित मुझे बना लिया ,
          अनगिनत भूलों ने मेरी,
          मुरीद उसका बना दिया ।  

थक कर आते हैं जब हम
चाय माशूका सी लगती है,
  
                               
क्या हुआ कैसे गुजरा दिन ?
चुस्की दर चुस्की पूछती है,
                                 
किस बात से है,खफा
किसने दिल ये नासाज़ 
किया,                                  
हाल चाल पर बहलाती सी
चाय फिर ढाँढस दिलाती है,
                                 
मिलते रहा करो  मुझसे कह,चाय चाहत बन जाती है ।  ... by  ~ प्रदीप यादव ~ स्व-रचित  













                                 

                            

 

Thursday, 5 July 2012

मैं एक नक्सलि


    मैं एक नक्सलि 

   वो अग्निपथ था जो मेरी मुमुक्षता से चूक गया ,

   तीर सा बिंधा हुआ घाव रिसता लिये विदीर्ण यष्टि,
   मूक प्रतिरूप देख रहा कातर भाव अश्रु  लिये ,
   मैं अभिमानी, तन्द्रा से जाग उठा ज्यों भाव्विहल, 
   निःशेष को तोडती वो विचित्र शंख ध्वनी गूँज उठी, 
   मुझे व्यथा शुन्य होने से बचाने का प्रयोजन करती,
   जीवन प्रलापों का अभिनन्दन नहीं किया जा सकता ,
   उद्विग्न दग्ध क्रांतिदूत मुझसा पुनः हो नहीं सकता,
   निष्चेतक अब कोई मुझे शांत नहीं कर सकता ,
   अप्रिय अनोखा नीरव था वो खग मृग भी अनुपस्थित,
   सांसों का स्पंदन शेष था अभी रक्त चरित उच्चारण के लिये,
   शब्दकोष स्तब्ध थे छंदों के अपमार्जन के  लिये,
   समेटे अपनी जीवनशक्ति 'मैं ' खड़ा हूँ फिर समर मैं,
   जन्मभूमि पर मेरी अत्याचार अब और नहीं ,
   बन्दरबाँट के भ्रष्टाचार भी सहना नही
   अग्निपथ पर अग्निदूत बन दे रहा
   चुनौती ये असंगठित आदिवासी,

   श्यामला को रौंद कर बने जो महल प्रासारों के पथ ,
   अब नहीं रह सकते निष्कंटक ,
   प्रताड़ना का अवरोध हो या यमलोक का निमंत्रण ,
   हर वर्जनाओं को तोड़कर नवीन प्राची बिखेर कर,
   दबा दी गयी आवाज था मैं बेताला ही गाऊंगा,
   प्रार्थना को मूर्त करने 'जन मन गण' लाऊंगा, 

                                       ......PRADEEP YADAV 07/05/2012
   ( लेखक नक्सल  समस्या को सामाजिक ढांचे के लिए उपयुक्त नहीं मानता,
   किन्तु साथ ही  उन पर आतंकी होने के आरोपों का विरोध करता है, और उन्हें
   समाज की मुख्यधारा से जोड़ना सभी की जिम्मेदारी है ।)

Tuesday, 3 July 2012

मचलती शाम

मचलती शाम 


TUESDAY, 3 JULY 2012
मचलती शाम
क्या कहें इस शाम की कलाकारी
न सुबह से दोस्ती,न रात से यारी।
कुछ बनती, बिगडती कहानियों को,
अनजानी राहों की बढ़ती कठिनाइयों को,
किसी खाट पर सुस्ताते कर्मों को,
दुस्साहस का दम पाते सपनों को,
मचलती शाम किसे याद करे ।

बाय कहकर बढ़ चले सूरज को
किरणों के रंगीन मिल्कियत को ,
घोंसलों को लौटते पंछीयों को,
धूल धूल गुबारों  को,
दिनमान के नरम पड़ते तेवर को,
थके क़दमों की चाल को ,
पसीने से लथपथ मजदूरी को,
चमक बढ़ाती सड़कों पर फैले कोलाहल को,
दूर क्षितिज पर मिलते सूरज की लाल रेख को,
मचलती शाम किसे याद करे,
हाय कहकर घुल आई ठंडक को,
लम्बी होती परछाईयों को,
अम्बर के आँचल पर नगीने से उगे तारों को ,
समंदर किनारे रेत पर सुस्ताते जोड़ों को,
बच्चों की न थमती चिरौरी को,
अनगढ़ ढंग से झिलमिलाती गगनचुम्बी इमारतों को
घर सजे दीये की टिमटिमाहट को,
या स्याह पड़ती मायावी ऊँचाईयों को,
मचलती शाम किसे याद करे ।         ........ By Pradeep Yadav


................प्रदीप यादव 

Sunday, 1 July 2012

कल्कि नया आएगा


ल्कि नया आएगा 


चाणक्य कोइ नया हूंकारेगा शिखा के बन्धन खोल प्रणेगा,




जननी का वीर फिर चंद्रगुप्त बन समर में खङग लहराएगा,


संकल्पित हूं, डिगा नहिं, हाला का विकल्प नया हूं ढूंढ रहा,



संताप, भ्रष्टाचार, विद्रोह को मेरे अवसरों हेतु अब तौल रहा,



अभ्युदय फिर नवीन ॠचा का उद्धत कर प्रासंगिक होगी राष्ट्रध्येयता,



आलिंगनबद्ध निशदिन होगी सत्य सांस्कृतिक सफ़लता की श्रेष्ठता,

....
(~ प्रदीप यादव  ~ )


pahun puje hari mile to main poojun pahar ..... guru shishya prampara sadiyon se mere desh ki sanskritik pahchan rahi par vartman main guru ki pratishtha ko kai lampt aur lalchee logon 

ne dhoomil kiya hai. parantu jaise har kalirat ke bad ek chamkili subah hoti hai guru ka stan punah mahimamandeet hoga.