Thursday, 5 July 2012

मैं एक नक्सलि


    मैं एक नक्सलि 

   वो अग्निपथ था जो मेरी मुमुक्षता से चूक गया ,

   तीर सा बिंधा हुआ घाव रिसता लिये विदीर्ण यष्टि,
   मूक प्रतिरूप देख रहा कातर भाव अश्रु  लिये ,
   मैं अभिमानी, तन्द्रा से जाग उठा ज्यों भाव्विहल, 
   निःशेष को तोडती वो विचित्र शंख ध्वनी गूँज उठी, 
   मुझे व्यथा शुन्य होने से बचाने का प्रयोजन करती,
   जीवन प्रलापों का अभिनन्दन नहीं किया जा सकता ,
   उद्विग्न दग्ध क्रांतिदूत मुझसा पुनः हो नहीं सकता,
   निष्चेतक अब कोई मुझे शांत नहीं कर सकता ,
   अप्रिय अनोखा नीरव था वो खग मृग भी अनुपस्थित,
   सांसों का स्पंदन शेष था अभी रक्त चरित उच्चारण के लिये,
   शब्दकोष स्तब्ध थे छंदों के अपमार्जन के  लिये,
   समेटे अपनी जीवनशक्ति 'मैं ' खड़ा हूँ फिर समर मैं,
   जन्मभूमि पर मेरी अत्याचार अब और नहीं ,
   बन्दरबाँट के भ्रष्टाचार भी सहना नही
   अग्निपथ पर अग्निदूत बन दे रहा
   चुनौती ये असंगठित आदिवासी,

   श्यामला को रौंद कर बने जो महल प्रासारों के पथ ,
   अब नहीं रह सकते निष्कंटक ,
   प्रताड़ना का अवरोध हो या यमलोक का निमंत्रण ,
   हर वर्जनाओं को तोड़कर नवीन प्राची बिखेर कर,
   दबा दी गयी आवाज था मैं बेताला ही गाऊंगा,
   प्रार्थना को मूर्त करने 'जन मन गण' लाऊंगा, 

                                       ......PRADEEP YADAV 07/05/2012
   ( लेखक नक्सल  समस्या को सामाजिक ढांचे के लिए उपयुक्त नहीं मानता,
   किन्तु साथ ही  उन पर आतंकी होने के आरोपों का विरोध करता है, और उन्हें
   समाज की मुख्यधारा से जोड़ना सभी की जिम्मेदारी है ।)

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