मचलती शाम
TUESDAY, 3 JULY 2012
मचलती शाम
क्या कहें इस शाम की कलाकारी
न सुबह से दोस्ती,न रात से यारी।
कुछ बनती, बिगडती कहानियों को,
अनजानी राहों की बढ़ती कठिनाइयों को,
किसी खाट पर सुस्ताते कर्मों को,
दुस्साहस का दम पाते सपनों को,
मचलती शाम किसे याद करे ।
बाय कहकर बढ़ चले सूरज को
किरणों के रंगीन मिल्कियत को ,
घोंसलों को लौटते पंछीयों को,
धूल धूल गुबारों को,
दिनमान के नरम पड़ते तेवर को,
थके क़दमों की चाल को ,
पसीने से लथपथ मजदूरी को,
चमक बढ़ाती सड़कों पर फैले कोलाहल को,
दूर क्षितिज पर मिलते सूरज की लाल रेख को,
मचलती शाम किसे याद करे,
हाय कहकर घुल आई ठंडक को,
लम्बी होती परछाईयों को,
अम्बर के आँचल पर नगीने से उगे तारों को ,
समंदर किनारे रेत पर सुस्ताते जोड़ों को,
बच्चों की न थमती चिरौरी को,
अनगढ़ ढंग से झिलमिलाती गगनचुम्बी इमारतों को
घर सजे दीये की टिमटिमाहट को,
या स्याह पड़ती मायावी ऊँचाईयों को,
मचलती शाम किसे याद करे । ........ By Pradeep Yadav
................प्रदीप यादव
TUESDAY, 3 JULY 2012
मचलती शाम
क्या कहें इस शाम की कलाकारी
न सुबह से दोस्ती,न रात से यारी।
कुछ बनती, बिगडती कहानियों को,
अनजानी राहों की बढ़ती कठिनाइयों को,
किसी खाट पर सुस्ताते कर्मों को,
दुस्साहस का दम पाते सपनों को,
मचलती शाम किसे याद करे ।
बाय कहकर बढ़ चले सूरज को
किरणों के रंगीन मिल्कियत को ,
घोंसलों को लौटते पंछीयों को,
धूल धूल गुबारों को,
दिनमान के नरम पड़ते तेवर को,
थके क़दमों की चाल को ,
पसीने से लथपथ मजदूरी को,
चमक बढ़ाती सड़कों पर फैले कोलाहल को,
दूर क्षितिज पर मिलते सूरज की लाल रेख को,
मचलती शाम किसे याद करे,
हाय कहकर घुल आई ठंडक को,
लम्बी होती परछाईयों को,
अम्बर के आँचल पर नगीने से उगे तारों को ,
समंदर किनारे रेत पर सुस्ताते जोड़ों को,
बच्चों की न थमती चिरौरी को,
अनगढ़ ढंग से झिलमिलाती गगनचुम्बी इमारतों को
घर सजे दीये की टिमटिमाहट को,
या स्याह पड़ती मायावी ऊँचाईयों को,
मचलती शाम किसे याद करे । ........ By Pradeep Yadav
................प्रदीप यादव
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