Monday, 23 July 2012

prady ने कहा बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी अशोक चक्रधर

बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी
 ( डाक्टर अशोक चक्रधर की विशेषज्ञता संस्मरण )
पर मेरी टिप्पणी   ....प्रदीप यादव 23 जुलाई 2012

हिन्दी लिखते मेरे हाथ कांपते हैं ।

हिन्दीभाषी कहते मेरे नाज नखरे गुम जाते हैं।


किसे पढूं किसे नहीं सोच कर सर धुनता हूँ,


मात्रा, छंद,समास,अलंकार मेरी लेखनी को समृद्ध बनाते हैं


… 
 स्वीकारता हूँ !


आजकल दाढ़ी बना कर निकलो …. 


भद्रपुरुष नहीं ,"चिकना" संबोधन मिलता है ।


सच कहूं तो जिस आशय में वह कहा गया होता है,


मन को बड़ा ही अच्छा लगता है ,किन्तु यदि

असावधानीवश कंही साहित्यिकारों के बीच कह गया

तो समझो पार्टी विहीन हो गया । अब बोलचाल का 

प्रोटोकाल आम हिदीभाषीसमझ नहीं पाता और 

आधिकारिक साहित्यिक बंधू,

इसे पचा नहीं पाते ।

प्रलोभन देकर बुलाये,मानसिक CUM क्षुधापूर्ति हेतु आए

हिंदी साहित्यकारों का आकर्षण इस विडंबना पर जाने कब होगा ?

तभी वे किसी फाइव स्टार होटल के अतिथि कक्ष मैं बैठ

स्व-हस्ताक्षरित प्रति
 आम पाठकों तक वितरित कर पाने की

आकांक्षा जगा सकते हैं ।


पर इसे ही कितने समझ पाते हैं ?


लाइन से चलो या लीक से हटकर बहो,


यह कितने समझ,या समझा पाते हैं ।


अवसाद 'शोक' मुमुक्षता, के इस दौर में कितने


'अशोक'
 ' बन हिंदी लिख और कह पाते हैं ।     


प्रदीप यादव ~ 



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