Wednesday, 11 July 2012

उम्र का उतर्राध



   उम्र का उत्तरार्ध   
   उम्र का उत्तरार्ध    

सिरहाने एक मजबूत लकड़ी रखना।
उठूँ जब मैं पास चश्मा,दवा,
जग पानी का साथ गिलास रखना।
पैरों पहनकर चप्पल,
अखबार की सुर्खियाँ पढ़कर,
लौटूं जब मैं पार्क से टहलकर,
दोस्तों के नंबर डायरी में लिखना,

डॉक्टर से मिलने का समय ले लेना,
दांतों के सेट को वहीं खाने की मेज पर रख,
दही, दलिया साथ ही रखना,
इसे भी कुछ सहेज लेना।

शोर बच्चों का परेशान तो करता हे,
फिर भी तुम उन्हें मनाए रखना।
उजाले, तेज आवाजें मौसमी तेवर,
मुझे सताते पर ये सब उम्र के हैं तकाजे,
दरवाजे मेरे कमरे के खुले ही रखना,
घडी में मेरी चाभी देते रहना,
अरे ज़िंदा हूँ मैं लगना भी तो चाहिए।
अच्छे तो हो तुम सब बस मस्त रहना।

रिश्तेदारों से ज़रा अपनापन बनाए रखना।
सूटकेस से तस्वीरें पुरानी मढ़वा भी देना।
कट चली है अपनी तो राम ही के भरोसे।
राज जीने के तुम भुला ना देना ....
शुभकामनाएं तुमको !! जीते रहना मेरे बच्चों ।।


~ प्रदीप यादव ~   

     




1 comment:

  1. सुन्दर मार्मिक प्रस्तुति.
    अच्छा लगा आपको पढकर प्रदीप जी.

    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

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