FB २९\ ९
माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...
कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,
लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |
बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ ,
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |
By ~ प्रदीप यादव ~
माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...
कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,
लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |
बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ ,
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |
By ~ प्रदीप यादव ~
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (23.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .
ReplyDeleteआभार नीरज कुमार जी आपकी सदाशयता के लिए ...
Deleteबहुत सुन्दर और संवेदनशील प्रस्तुति...
ReplyDeleteआ. कैलाश जी आपका स्वागत है , ... टीप के लिए आभार
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