बड़े ही असामान्य हालात हैं घरों के दरवाजे खिडकियों से लेकर फर्नीचर तक,
सामान जैसे चक्के से ले कर हल तक फिर जरुरत के जलावन आदि के नाम
पर तोह कभी बढ़ती रिहायशी जरुरत के नाम पर हम अपनी जरूरतों के नाम
पर प्रकृति के अंधाधुंध शोषण की कहानी खुद ही बड़ी निर्लज्जता से स्वीकारते
हैं।
प्रति स्क्वे. कि मी घटे वनों के रकबे ने प्रदूषण के स्तर को इन
दस सालों में तेजी से बढा दिया है , जल स्रोतों के घटने और भूमि के अपरदन
की चिंता शहरीकरण या वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी भर मानकर
चलने वालों अगर हम बच्चों को अच्छा भविष्य देना चाहते हो तो कृपया उन्हॆ
जीवन का वरदान तो दो इन पेड़ों को अभयदान तो दो .... घर द्वार, निकटवर्ती
स्थानों पर पौधारोपण करो ।
नदियों को कूड़ेदान रूप में प्रयोग कर कब तक सुन्दर भविष्य को देखोगे। अभी
नहीं तो कभी नहीं के स्तर पर पहुँच गए है .... काल की और जाते हमारे ही भावी
पीढ़ी को खुशबु वाले फूल और बदबूदार नाले बन चुकी नदीयों का संस्कार देकर
अपनी हित साधना कब तक करते रहेंगे हुम ...... हरित क्रांति के जनक कब जंगल
बचाओ पेड़ बचाओ कहेंगे ही करेंगे भी .....?
कब हम प्लास्टिक और अन्य प्रदुषण कारी तत्वों से विमुख हो जीवन को अपनाएंगे?
~ प्रदीप यादव ~