Sunday, 31 March 2013

असामान्य हालात


बड़े ही असामान्य हालात हैं घरों के दरवाजे खिडकियों से लेकर फर्नीचर तक,
सामान जैसे चक्के से ले कर हल तक फिर जरुरत के जलावन आदि के नाम
पर तोह कभी बढ़ती रिहायशी जरुरत के नाम पर हम अपनी जरूरतों के नाम
पर प्रकृति के अंधाधुंध शोषण की कहानी खुद ही बड़ी निर्लज्जता से स्वीकारते
 हैं।
                     प्रति स्क्वे. कि मी घटे वनों के रकबे ने प्रदूषण के स्तर को इन
दस सालों में तेजी से बढा दिया है , जल स्रोतों के घटने और भूमि के अपरदन
की चिंता शहरीकरण या वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी भर मानकर
चलने वालों अगर हम बच्चों को अच्छा भविष्य  देना चाहते हो तो कृपया उन्हॆ
जीवन का वरदान तो दो इन पेड़ों को अभयदान तो दो .... घर द्वार, निकटवर्ती
स्थानों पर पौधारोपण करो ।
नदियों को कूड़ेदान रूप में प्रयोग कर कब तक सुन्दर भविष्य को देखोगे। अभी
नहीं तो कभी नहीं के स्तर पर पहुँच गए है .... काल की और जाते हमारे ही भावी
पीढ़ी को खुशबु वाले फूल और बदबूदार नाले बन चुकी नदीयों का संस्कार देकर
अपनी हित साधना कब तक करते रहेंगे हुम ...... हरित क्रांति के जनक कब जंगल
बचाओ पेड़ बचाओ कहेंगे ही करेंगे भी .....?
कब हम प्लास्टिक और अन्य प्रदुषण कारी तत्वों से विमुख हो जीवन को अपनाएंगे?
~  प्रदीप यादव  ~ 

Friday, 29 March 2013


रोशन-खयाली


इन पलकों में तुम हो जबसे बस गए,


मंजिलें साफ देख लीं बाधाओं के पार। ~ प्रदीप यादव ~   

Wednesday, 27 March 2013

मैं बेशकीमत हो चला हूँ .....



मैं बेशकीमत हो चला हूँ
.....

हो चला हूँ,
गिरफ्तार इश्क में,
लोग कहने लगे हैं,
आजकल
मैं बेशकीमत हो चला हूँ .....
तुम बेकार परेशाँ हो,
खर्चे मसरूफ रहने,
के उठाता हूँ।
यूँ तो ग़मगीन लोगों
के दर्द चुराता हूँ,
जब से मालूम हुआ
मोतियों से अनमोल
हैं ये उनके आँसू ....
मैं बेशकीमत हो चला हूँ .....

~ प्रदीप यादव ~

जwaani ko salami

जwaani ko salami ....

Jis Umar mein jawaane aati hai,

chndani tadpati ho ,
thandi hawaein jalati  ho
sooni rahein chahaton kee
anginat sapnon se pat jati hon,

ek pahiyaa saa chakkar daar,
awaaraa sa pairo ko besabab sa
shahar bhar ki sadkon par,
ghumaae madmast hiran saa,
din dhale talq aas na tute,
samjho jawaani ne angdaai li hai,

har din ke haathon ko,
nae kam ke poore hone ki,
gaaranti si miltee ho,
Qamyabi ki seedhi se ,
Do-do hath karne ke tere zasbe ko ,
duniyaa salaam kahati hai ,

Isharon mei aankhein
quch keh jaati ho,
aur jod duzi aankhon ki ,
samjh sab kuch jaati ho

inkaar mei sar hilaa kar
sharaarat se muskaati ho,
karti ho baatein ulajhi see,
atrangee fir ban jaati ho

phagun ki mastiyon par,
dil bouraya,firtaa ho,
bin pie hi nashaa saa,
chhayaa rahtaa ho,
tere jwaan hone ko, Samjho .....
duniyaa salaam kahtee hai .

By ~ Pradeep Yadav ~

जिस उम्र में जवानी आती है,

चांदनी तडपाती हो,
ठंडी हवाएं जलाती हों,
सूनी राहें चाहतों की,
अनगिनत सपनों
से पट जाती हों,

एक पहिया सा चक्करदार,
आवारा सा पैरों को बेसबब
शहर भर की सड़कों पर,
घूमाए मदमस्त हिरन सा,
दिन ढले तलक आस ना टूटे,
समझो जवानी ने अंगडाई ली है,

हर दिन के हाथों को,
नए काम को पूरा होने की,
गारंटी सी मिलती हो
कामयाबी की सीढ़ी से,
दो-दो हाथ करने के तेरे ज़स्बे को,
दुनिया सलाम कहती है।

इशारों में आँखें कुछ कह जाती हो,
और जोड़ दूजी आँखों की,
समझ सब कुछ जाती हो।
इनकार में सर हिला कर
शरारत से मुस्काती हो,
करती हो बातें उलझी सी
फिर अतरंगी बन जाती हो।

फागुन की मस्तियों पर,
दिल बौराया फिरता हो,
बिन पिए ही नशा सा,
छाया रहता हो। समझो ...
तेरे जवान होने को दुनिया सलाम कहती






राष्ट्र आराधन ....


राष्ट्र आराधन ....

र्म हानि नहीं जानूँ  मैं अभिमानी,
भस्मभूत करता अनीति की मनमानी,
राष्ट्र हानि फड़काती हैं रुधिर वाहिनी।
देश धर्म का पालन कर मैं,
कहलाऊं सिर्फ एक हिन्दुस्तानी।
उद्धार करो भारतवासी,
श्रम के इस मंदिर का,
गर्व मीनारों से अजां लगाओ,
सुमिरन कर गुरुओं की बानी,
राष्ट्र आराधन की लौ जला,
करो याद उनको भी जरा,
जो शान तिरंगे की रख लड़ मरा।

अमोघ श्रँखला विस्तृत ज्ञान की,
कला,विज्ञान की,अभिमान की,
राष्ट्र कुल ही मेरा कुल अब,
माता भारत भारती।
करो रे उपक्रम समृध देश का,
गाओ फिर यशवर्धन की आरती ।
चलो आओ,मिलकर नाचो, गा लो,
ढोल ताशोंऔर नगाड़ों की थाप से,
अकर्मण्यता के असुर भगा दो।  ......

 ~ प्रदीप यादव ~

रंगीन होली




रंगीन हो होली आप सब मित्रों की होली
भर रहा रंग का उल्लास
यह भीना प्रेम पगा त्यौहार ,
खोले नित नई संम्भावना,
रूठ कर मानना भी है
बाँधना हंसी ठिठोली में,
दूरी पाटती हुई होली,
संबंध प्रगाड़ करती होली ।
प्रदीप यादव ~

शीतल शबद





शीतल शबद उचारिये ...... अहम् मानीये नाहि
तेरा प्रीतम तुझ में रहे .....  दुश्मन भी तुझ माहीं ....

सोच कर देखा तो विचार आत्मसात करने वाला लगा,
स्वभाव का गर्म होना,लोभी होना, मननशील होना,शांत होना....आदी मानवीय भाव हैं, सिर्फ विवेक की लगाम ही इन, सभी भावों में समरसता घोलती है।यदि कार्य स्थल पर जाना भौतिक कर्म है पूजा कार्य अथवा सेवा कार्य के प्रति कपड़ों के मापदंड अनदेखा कर आप सेवा या पूजाकर्म के प्रति भावना समझते हैं तो यह मेरे द्वारा पूजा में पहने जाने वाले उत्तरीय और धोती का अस्वीकार्य होना नहीं वरन कार्यालयीन वेशभूषा को बदलने के स्थान और समय के अभाव से है ...
व्यक्तियों को वेशभूषा से नहीं कर्मों की प्रासंगिकता से पहचाना जाए तो संदिग्धता का भाव स्वमेव ख़त्म
होकर आत्मीयता के भाव जागृत होते हैं ।
जब वो हम में घुल जाने का भाव रखता हैं तो 'मैं ' के लिए स्थान नहीं रहता। व्यक्ति वादिता से ग्रसित 'मैं '
स्थान, ज्ञान, कुल और मर्यादा के विभेद की पहचान खो देता है । अपनी भौतिकता में निमग्न रह वह कब दूर निकल जाता है उसका संज्ञान लेना ज़रूरी है अन्यथा प्रीतम ( भगवान, almighty ) के निर्मल स्वरूप और दुश्मन (अहंकार,vanity) की कुरूपता का भाव कैसे ज्ञात होगा ..... ( प्रदीप यादव )
  

बदलाव




बदलाव ...

दिल पूछता रहा तू
बदला कम कि मेरी ये
उम्मीदें जियादे है,
इतनी बार बदलने पर
भी कोई अपना सा
क्यूँ लगता रहता है,   ~ प्रदीप यादव  ~


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बंदगी

यूँ ना समझ लेना
कि फरामोश हो चला हूँ ।
कुछ और देर तलक,
बंदगी ए साहिब में लगा हूँ।  ~ प्रदीप यादव ~

Saturday, 23 March 2013

असमय मृत्यु ...


असमय मृत्यु ...

मर जाती हैं
माँ जब असमय
ममता नहीं मरती,
टीस फूल की
डाल से बिछुड़ कर
खुशबुओं में
रहा करती है ।  ~ प्रदीप यादव ~

Friday, 22 March 2013

बगावत ए इश्क

शाम की मखमली बारात के आगाज़ पर आप

साहेबान दोस्तों का खैरमक्दम


बगावत ए इश्क


वादे पे नइयो जाना,

जाने जाना वादे ये 
  

तोड़ने का दिल करता है,

खूबसूरत महबूब 
है तुझसा,


तोह इश्क ये बगावत सी 
करने लगता है ।


 ~ 
प्रदीप यादव  


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अँदाज़ थे मुझे भुलाने के,

 "
कुछ ऐसे भी".....

मुझे कर गए वोह 
ताकीद ख्वाबगाह में न आने की 'प्रदीप',
कब्रगाह महफूज करता रहा जो कयामत के इंतज़ार में।  ~ प्रदीप यादव  ~ 
 
और 
 "कुछ ऐसे भी".....

मुझे ताकीद करते रहे थे,
जो ख्वाबों में ना आने की,
कोई जाकर 
उन्हें बतलाए ,
इंतजार ऐ कयामत की बातें
ज़माना रखता है महफूज़,
यहाँ कब्रगाह में 
भी लाशें।  ~ प्रदीप यादव  ~ 


  

Thursday, 21 March 2013

हसबेंड फेविकोल ( व्यंग )

हसबेंड फेविकोल 

हे वनिता क्यों,
तहलका मचाकर,
विधान को दहला रही हो,
यम से प्रिय
प्राणनाथ की रक्षा हेतु ,
फेविकोल लगा रही हो,
टेम्परेरी अरेजमेंट है ये अगले
जन्म में तो स्वामी डिसेंट है।
सुन लो यम तेरी बातों,
में लग रहा है दम,
फिलहाल कर लेती हूँ,
मैं दुर्घटना ये एडजेस्ट,
जो अगला खराब मिला तोह,
जा पहूँचुंगी सीधे फास्ट ट्रेक,
अच्छा मिला तो ठीक वर्ना
एक्सचेंज ऑफर वेलेड रखना,
कंज्यूमर फोरम का ज़माना हे,
यमराज सेवा में त्रुटी हुई,
तो समझो खैर नहीं,
वंहा तो सिर्फ नाम के
राजा हो नर्क के नज़ारे
धरती पर ही ना दिखाए,
धर्मपत्नी नाम नहीं ।

व्यंग   ~ प्रदीप यादव ~

Wednesday, 20 March 2013

वतनपरस्ती के अंदाज़



वतनपरस्ती के अंदाज़ 

वकार तेरे मेरे ये अलहदा
ज़रा जरूर हैं ...
तू महलों में खुश
हम झोपड़े में
मजबूर हैं,
आदत का तू कायल
सोने की थाली में खाने का
मैं तोड़ता सूखे कोर
एक वक्त के दस्तरखान पे,
सूरज भी रोशनी देता मुझे ,
तेरे महल की ओट से ,
गूंजती रहती हँसी की बारात
तेरे बारामदों से ,
मैं भी पुरनम आँखों से
रहता  मुस्कुराता,
वक़्त ऐ बेहतरी की
दोनों रखते तमन्ना,
मैं कमरे में माँ को,
तस्लीम कह लेता हूँ,
तू चला कर मजमे शामियाने में,
मिजाज़ गर्मा वतन परस्ती के,
देख रोटी की शर्त पर,
मुझ से उम्मीद तोह रख,
गलियों चौबारों पर वही ,
जोश भर कर 'वन्दे मातरम',
कहूंगा जिस जोशो खरोश से...
रोटी को तरसता हूँ ।

प्रदीप  यादव ~







Thursday, 14 March 2013

शापित घोल

शापित घोल                     प्रदीप यादव                        

पीकर बताऊँगा तुम से
कुछ दिल ये मसोसने का हाल,
मोबाईल पर बीती रात
कब आँख लगी मालूम ना रहा,
ख्वाब रहा जारी
पर्दों के पीछे छुपी हवा ने हद पार की,
मेज़ के फूलदान
आज़ाद ख्याली में गिरे और फूट गए,
कुदरती मंजरों की तो आदत है
बीच में टपक जाने की,
मेरे मोबाइल के दूसरी ओर की ,
... सिसकीयों  ने कुछ रहा सहा,
नशा भी उतार फेंका था।
~ प्रदीप यादव ~

जियारत


रजा परवेज़ की जियारत ....


जियारत के नाम पर,
तिजारती कोई तोह मौला,
बढ रहा है तेरी बारगाह पे ,
मुझे पता हैं कि तु जानता है ,
तेरे हज्बे मामुल के लिए,
कदमबोसी सिर्फ पर्दादारी हे,
इबादतन तो तेरे दर पर बात
सूरत की नहीं,तंगखयाली की है।
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   ~ प्रदीप यादव ~

Wednesday, 13 March 2013

एक कसक सही नहीं जाती

एक कसक सही नहीं जाती
दहशत के 2 0 वर्ष ......
मुंबई तत्कालीन बम्बई या बाम्बे ....
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अब भी ज़िंदा बची हैं ज़िंदगी तू आ और हमें मार जा,
क्यों रहा जीता मालिक तेरे जहां में नफरतों के बीच।  ~ प्रदीप यादव ~


Monday, 11 March 2013

दश्त ....

दश्त ....

कर के मोहोब्बत आस छोड़ी थी दिल के सुधर जाने की,
जुल्मी बेइमान बोल पडा, उसे आदत नहीं हार जाने की।   ~ प्रदीप यादव ~

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        हाँ मैं बा हैसीयत लोगों से कम मिलता-जुलता हूँ ,
        दूर हो जाएं ना ये अज़ीज़ मेरे इस बात पे डरता हूँ।   ~ प्रदीप यादव ~

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 कुछ मेरी साफगोई भी जमाने को दीवाना कर गई,
 तूने शफ्फाक मरमरी झूठ का मुल्लमा चढ़ा दिया ....।   ~ प्रदीप यादव ~

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मैंने रात देखा था किसानों को खेत पर,
चंद महंगी गाडी वालों से बतियाते ,
कुछ सोचा तोह आया ये समझ मेरी,
शहरी धुंऍ को गाँव से मुहब्बत हो चली .. ।   ~ प्रदीप यादव ~

Saturday, 9 March 2013

बढ़ती बेटी


बढ़ती बेटी
जो भीड़ की नज़रों से बची खड़ी हैं।
मेरे बाग़ में फूल बन कर खिली हैं । 
वोह मेरी ही साँसों की तोह लड़ी है।
बेकल मन की राहत वाली जडी' है।
बेटी मेरी आजकल हो रही बड़ी है । 

ख़यालेजुदाई पुरखलिश सा क्यूँ  रहता है,
पूछती तंहाई दिल जार-जार क्यूँ होता है।
हर बाप बेटी में क्यूँ  उम्मीदें जी लेता हैं।
बेटी के घर क्यूँ अंदाज बदला सा होता है।     ~ प्रदीप यादव ~

' जड़ी  =  इलाज, औषधि, दवा। 

Monday, 4 March 2013

धमाका ( the Heart Roar )


धमाका दिल का ....

तेरा काम है क्या? तू तो सिर्फ पम्प कर,
धमाका बड़ा क्यूँ मचा रहा है हडकंप कर,

मैंने छुपकर जो देखा लिया एक बार दिलबर,
बदनाम कर रहने लगा, मुआ दहाड़ मार कर।

 
~ प्रदीप  यादव


झट्का
....
रत्ती माशा भी तौलता रहता हूँ
,
दीवानगी भरे हादसों का ख़याल कर,

आजकल संभल कर चलने लगा हूँ ,
रवायती रस्मात को तोड़ कर अब,

एतिहातन 
मुहब्बत करने लगा हूँ । ~ प्रदीप यादव ~

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वो
मतला ए गज़ल नुक्ताचीनी कर समझाते रहे,
खामख्वाह ईमानदारी से ग़ज़ल हबीबी बन बैठे ।
~ प्रदीप यादव ~

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रफ

रफ 


हैं बड़े हुनरमंद आज भी आशिक ये  तेरे इलाके में 'प्रदीप'।

ढोल के बजते ही,
मेंहदी लगे हाथों का पता बतला देते हैं।।   ~ प्रदीप यादव ~
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अब मिला हैं रोज़गार जो लबों पर सुर्खियाँ सजाने का,
 सुनते हैं ये 'पान' भी बेकरार हैं लज्ज़तों के खजाने सा।   .   ~ प्रदीप यादव ~

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दौलत ऐ इल्मे नूर ज़रा लुटा
तो दो जहाँ में।
रहे नहीं
हसरत बाकी, तंगहाली भरे दौर में।।

कब तलक
रहेंगी फर्माबदार भी ये आरज़ूएँ।
लश्कर जो बढ़ा ले चले हो हाजिर ऐ  दौर में।।


देख
रक्स को यूँ भर लीं आहें तमन्नाओं ने।
दबा सा पड़ा हे खजाना फनकारी के ठौर में ।।

इल्म ऐ नूर को ज़रा दूर तक फ़ैला दो यारों।
वाजिब यही है खयालात की तंगी के दौर में।।


BY~ प्रदीप यादव ~

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फ़र्ज़ .... कर्तव्य, निर्वहन, ड्यूटी 

इश्क ... प्रेम ,मोहोब्बत, उल्फत, लव 
लाजमत .... आवश्यक, महत्ता, ज़रुरत, रीक्वायरमेंट, .
सुर्ख ..... लाल , यौवनपूर्ण,रक्ताभ, रेड़ 
फक्त ..... सिर्फ , केवल, ऑनली 
ज़ज्बात ..... भाव, रस , इमोशंस



Friday, 1 March 2013

प्रिय मित्रों ,
या देवी सर्व भूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थितः ।
बसंतोत्सव  का प्रारम्भ हुआ,
देवी सरस्वती की आप सभी पर असीम अनुकंपा हो,
सभी के मध्य पुष्प और भ्रमर सा अनुराग बना रहे।
ज्ञान की दृष्टि से आपके विकास को यश का सोपान
प्राप्त हो ।
प्रिय मित्रों शुभदिवस,
आपका वर्तमान दिवस अविस्मरणीय हो
Have a wonderful day    
मेरी कोशिश


अमुक नाम से जाना जाने वाला अमुक स्थान पर पला बढ़ा।
किसी प्यासे सा लिपट झरती पानी की रिसन से प्यास को
बुझाना और बढती हुई निराशा, असामान्य आल्हाद वाले
युग में थोड़ी सी आशा और सम्भावना की राहत जगाने में ,
आपका मनोबल बढाने में मेरी कोशिश रहेगी दर्द को निथारे
पानी सा दूर करने की ...... ~ प्रदीप यादव ~