Monday, 4 March 2013

रफ

रफ 


हैं बड़े हुनरमंद आज भी आशिक ये  तेरे इलाके में 'प्रदीप'।

ढोल के बजते ही,
मेंहदी लगे हाथों का पता बतला देते हैं।।   ~ प्रदीप यादव ~
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अब मिला हैं रोज़गार जो लबों पर सुर्खियाँ सजाने का,
 सुनते हैं ये 'पान' भी बेकरार हैं लज्ज़तों के खजाने सा।   .   ~ प्रदीप यादव ~

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दौलत ऐ इल्मे नूर ज़रा लुटा
तो दो जहाँ में।
रहे नहीं
हसरत बाकी, तंगहाली भरे दौर में।।

कब तलक
रहेंगी फर्माबदार भी ये आरज़ूएँ।
लश्कर जो बढ़ा ले चले हो हाजिर ऐ  दौर में।।


देख
रक्स को यूँ भर लीं आहें तमन्नाओं ने।
दबा सा पड़ा हे खजाना फनकारी के ठौर में ।।

इल्म ऐ नूर को ज़रा दूर तक फ़ैला दो यारों।
वाजिब यही है खयालात की तंगी के दौर में।।


BY~ प्रदीप यादव ~

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फ़र्ज़ .... कर्तव्य, निर्वहन, ड्यूटी 

इश्क ... प्रेम ,मोहोब्बत, उल्फत, लव 
लाजमत .... आवश्यक, महत्ता, ज़रुरत, रीक्वायरमेंट, .
सुर्ख ..... लाल , यौवनपूर्ण,रक्ताभ, रेड़ 
फक्त ..... सिर्फ , केवल, ऑनली 
ज़ज्बात ..... भाव, रस , इमोशंस



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