Thursday, 14 March 2013

शापित घोल

शापित घोल                     प्रदीप यादव                        

पीकर बताऊँगा तुम से
कुछ दिल ये मसोसने का हाल,
मोबाईल पर बीती रात
कब आँख लगी मालूम ना रहा,
ख्वाब रहा जारी
पर्दों के पीछे छुपी हवा ने हद पार की,
मेज़ के फूलदान
आज़ाद ख्याली में गिरे और फूट गए,
कुदरती मंजरों की तो आदत है
बीच में टपक जाने की,
मेरे मोबाइल के दूसरी ओर की ,
... सिसकीयों  ने कुछ रहा सहा,
नशा भी उतार फेंका था।
~ प्रदीप यादव ~

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