दश्त ....
कर के मोहोब्बत आस छोड़ी थी दिल के सुधर जाने की,
जुल्मी बेइमान बोल पडा, उसे आदत नहीं हार जाने की। ~ प्रदीप यादव ~
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हाँ मैं बा हैसीयत लोगों से कम मिलता-जुलता हूँ ,
दूर हो जाएं ना ये अज़ीज़ मेरे इस बात पे डरता हूँ। ~ प्रदीप यादव ~
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कुछ मेरी साफगोई भी जमाने को दीवाना कर गई,
तूने शफ्फाक मरमरी झूठ का मुल्लमा चढ़ा दिया ....। ~ प्रदीप यादव ~
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मैंने रात देखा था किसानों को खेत पर,
चंद महंगी गाडी वालों से बतियाते ,
कुछ सोचा तोह आया ये समझ मेरी,
शहरी धुंऍ को गाँव से मुहब्बत हो चली .. । ~ प्रदीप यादव ~
कर के मोहोब्बत आस छोड़ी थी दिल के सुधर जाने की,
जुल्मी बेइमान बोल पडा, उसे आदत नहीं हार जाने की। ~ प्रदीप यादव ~
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हाँ मैं बा हैसीयत लोगों से कम मिलता-जुलता हूँ ,
दूर हो जाएं ना ये अज़ीज़ मेरे इस बात पे डरता हूँ। ~ प्रदीप यादव ~
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कुछ मेरी साफगोई भी जमाने को दीवाना कर गई,
तूने शफ्फाक मरमरी झूठ का मुल्लमा चढ़ा दिया ....। ~ प्रदीप यादव ~
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मैंने रात देखा था किसानों को खेत पर,
चंद महंगी गाडी वालों से बतियाते ,
कुछ सोचा तोह आया ये समझ मेरी,
शहरी धुंऍ को गाँव से मुहब्बत हो चली .. । ~ प्रदीप यादव ~
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