Monday, 11 March 2013

दश्त ....

दश्त ....

कर के मोहोब्बत आस छोड़ी थी दिल के सुधर जाने की,
जुल्मी बेइमान बोल पडा, उसे आदत नहीं हार जाने की।   ~ प्रदीप यादव ~

>>>>                      ...........              <<<<

    
        हाँ मैं बा हैसीयत लोगों से कम मिलता-जुलता हूँ ,
        दूर हो जाएं ना ये अज़ीज़ मेरे इस बात पे डरता हूँ।   ~ प्रदीप यादव ~

>>>>                      ...........              <<<<


 कुछ मेरी साफगोई भी जमाने को दीवाना कर गई,
 तूने शफ्फाक मरमरी झूठ का मुल्लमा चढ़ा दिया ....।   ~ प्रदीप यादव ~

>>>>                      ...........              <<<<


मैंने रात देखा था किसानों को खेत पर,
चंद महंगी गाडी वालों से बतियाते ,
कुछ सोचा तोह आया ये समझ मेरी,
शहरी धुंऍ को गाँव से मुहब्बत हो चली .. ।   ~ प्रदीप यादव ~

No comments:

Post a Comment