झट्का ....
रत्ती माशा भी तौलता रहता हूँ ,
दीवानगी भरे हादसों का ख़याल कर,
आजकल संभल कर चलने लगा हूँ ,
रवायती रस्मात को तोड़ कर अब,
एतिहातन मुहब्बत करने लगा हूँ । ~ प्रदीप यादव ~
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वो मतला ए गज़ल नुक्ताचीनी कर समझाते रहे,
खामख्वाह ईमानदारी से ग़ज़ल हबीबी बन बैठे । ~ प्रदीप यादव ~
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सुन्दर लिखा है आपने .
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