वतनपरस्ती के अंदाज़
वकार तेरे मेरे ये अलहदा
ज़रा जरूर हैं ...
तू महलों में खुश
हम झोपड़े में
मजबूर हैं,
आदत का तू कायल
सोने की थाली में खाने का
मैं तोड़ता सूखे कोर
एक वक्त के दस्तरखान पे,
सूरज भी रोशनी देता मुझे ,
तेरे महल की ओट से ,
गूंजती रहती हँसी की बारात
तेरे बारामदों से ,
मैं भी पुरनम आँखों से
रहता मुस्कुराता,
वक़्त ऐ बेहतरी की
दोनों रखते तमन्ना,
मैं कमरे में माँ को,
तस्लीम कह लेता हूँ,
तू चला कर मजमे शामियाने में,
मिजाज़ गर्मा वतन परस्ती के,
देख रोटी की शर्त पर,
मुझ से उम्मीद तोह रख,
गलियों चौबारों पर वही ,
जोश भर कर 'वन्दे मातरम',
कहूंगा जिस जोशो खरोश से...
रोटी को तरसता हूँ ।
~ प्रदीप यादव ~
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