शीतल शबद उचारिये ...... अहम् मानीये नाहि
तेरा प्रीतम तुझ में रहे ..... दुश्मन भी तुझ माहीं ....
सोच कर देखा तो विचार आत्मसात करने वाला लगा,
स्वभाव का गर्म होना,लोभी होना, मननशील होना,शांत होना....आदी मानवीय भाव हैं, सिर्फ विवेक की लगाम ही इन, सभी भावों में समरसता घोलती है।यदि कार्य स्थल पर जाना भौतिक कर्म है पूजा कार्य अथवा सेवा कार्य के प्रति कपड़ों के मापदंड अनदेखा कर आप सेवा या पूजाकर्म के प्रति भावना समझते हैं तो यह मेरे द्वारा पूजा में पहने जाने वाले उत्तरीय और धोती का अस्वीकार्य होना नहीं वरन कार्यालयीन वेशभूषा को बदलने के स्थान और समय के अभाव से है ...
व्यक्तियों को वेशभूषा से नहीं कर्मों की प्रासंगिकता से पहचाना जाए तो संदिग्धता का भाव स्वमेव ख़त्म
होकर आत्मीयता के भाव जागृत होते हैं ।
जब वो हम में घुल जाने का भाव रखता हैं तो 'मैं ' के लिए स्थान नहीं रहता। व्यक्ति वादिता से ग्रसित 'मैं '
स्थान, ज्ञान, कुल और मर्यादा के विभेद की पहचान खो देता है । अपनी भौतिकता में निमग्न रह वह कब दूर निकल जाता है उसका संज्ञान लेना ज़रूरी है अन्यथा प्रीतम ( भगवान, almighty ) के निर्मल स्वरूप और दुश्मन (अहंकार,vanity) की कुरूपता का भाव कैसे ज्ञात होगा ..... ( प्रदीप यादव )
स्वभाव का गर्म होना,लोभी होना, मननशील होना,शांत होना....आदी मानवीय भाव हैं, सिर्फ विवेक की लगाम ही इन, सभी भावों में समरसता घोलती है।यदि कार्य स्थल पर जाना भौतिक कर्म है पूजा कार्य अथवा सेवा कार्य के प्रति कपड़ों के मापदंड अनदेखा कर आप सेवा या पूजाकर्म के प्रति भावना समझते हैं तो यह मेरे द्वारा पूजा में पहने जाने वाले उत्तरीय और धोती का अस्वीकार्य होना नहीं वरन कार्यालयीन वेशभूषा को बदलने के स्थान और समय के अभाव से है ...
व्यक्तियों को वेशभूषा से नहीं कर्मों की प्रासंगिकता से पहचाना जाए तो संदिग्धता का भाव स्वमेव ख़त्म
होकर आत्मीयता के भाव जागृत होते हैं ।
जब वो हम में घुल जाने का भाव रखता हैं तो 'मैं ' के लिए स्थान नहीं रहता। व्यक्ति वादिता से ग्रसित 'मैं '
स्थान, ज्ञान, कुल और मर्यादा के विभेद की पहचान खो देता है । अपनी भौतिकता में निमग्न रह वह कब दूर निकल जाता है उसका संज्ञान लेना ज़रूरी है अन्यथा प्रीतम ( भगवान, almighty ) के निर्मल स्वरूप और दुश्मन (अहंकार,vanity) की कुरूपता का भाव कैसे ज्ञात होगा ..... ( प्रदीप यादव )
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