बढ़ती बेटी
जो भीड़ की नज़रों से बची खड़ी हैं।
मेरे बाग़ में फूल बन कर खिली हैं ।
वोह मेरी ही साँसों की तोह लड़ी है।
बेकल मन की राहत वाली जडी' है।
बेटी मेरी आजकल हो रही बड़ी है ।
ख़यालेजुदाई पुरखलिश सा क्यूँ रहता है,
पूछती तंहाई दिल जार-जार क्यूँ होता है।
हर बाप बेटी में क्यूँ उम्मीदें जी लेता हैं।
बेटी के घर क्यूँ अंदाज बदला सा होता है। ~ प्रदीप यादव ~
' जड़ी = इलाज, औषधि, दवा।
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