Friday, 22 March 2013

बगावत ए इश्क

शाम की मखमली बारात के आगाज़ पर आप

साहेबान दोस्तों का खैरमक्दम


बगावत ए इश्क


वादे पे नइयो जाना,

जाने जाना वादे ये 
  

तोड़ने का दिल करता है,

खूबसूरत महबूब 
है तुझसा,


तोह इश्क ये बगावत सी 
करने लगता है ।


 ~ 
प्रदीप यादव  


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अँदाज़ थे मुझे भुलाने के,

 "
कुछ ऐसे भी".....

मुझे कर गए वोह 
ताकीद ख्वाबगाह में न आने की 'प्रदीप',
कब्रगाह महफूज करता रहा जो कयामत के इंतज़ार में।  ~ प्रदीप यादव  ~ 
 
और 
 "कुछ ऐसे भी".....

मुझे ताकीद करते रहे थे,
जो ख्वाबों में ना आने की,
कोई जाकर 
उन्हें बतलाए ,
इंतजार ऐ कयामत की बातें
ज़माना रखता है महफूज़,
यहाँ कब्रगाह में 
भी लाशें।  ~ प्रदीप यादव  ~ 


  

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