Friday, 22 February 2013

     वक़्ति नज़ीर    ....
दुनियावी लोग जब बातें करते थे, तो उन्होंने परेशान हाल लोगों के लिए ज़रूरतमंद, गमज़दा
या मज़लूम  जैसे खुद को बेहतर साबित करते अल्फाज़ से नवाजते हैं  .....
इसके उलट जब सामने खड़ा इंसा हाल ऐ बेहतरी के चलते रहम, हुनर और कुदरतन इल्म को
आइना बना  कर कौम के सामने नजीर या मिसाल कायम करता है  तो ज़माना बाअदब उन्हें
सलामी के तौर पर कह उठता है
... वाह जनाब या के मोहतरमा, "आपका ज़वाब नहीं । "
यहाँ एक बात पक्के तौर पर वाजे हैं कि जब आप कोई अहसास या किसी बात को कहें तोह उसे
ताना या उलाहना  की शक्ल  देकर किसी को मनाने वाली  मनुहार  करें या किसी अपने को दूर
करने का जतन ये पूरी तरह आपका ही  नज़रिया होता हैं,  और  ये वोह सब सलीके होते हैं, जब
आप लोगों के बीच भले ही मकबूलियत हासिल ना कर सकें, पर सुकून वाली जगह उनके दिलों में
पाने का सबब ज़रूर बन सकते हैं ।
~ प्रदीप यादव ~

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