Thursday, 7 February 2013

घाव

घाव 
ऐ काश काफिया,
जो मिला पाता,
ये तेरे मेरे सुरों का ,
दे लेते बधाई
हम भी ये दिल-
खोलकर,हुजुर  .....।

प्रीत की वो रीत,
गमों ने निभाई ,
काम ना आई ,
धागे की गुंथन भी ,
छुपा ना पाई
दाग घाव के,
सुई की ये सिलाई  ....।

वो कहता रहा,
रहो दूर,
खुनी खंज़र हूँ मैं,
फिर तडपाती,
क्यों रहती है,
उसकी जुदाई ...। 
~ प्रदीप यादव ~

2 comments:

  1. Rachnaa par sneh pradarshit karne kaa aabhaar .....
    aa. Amritaa ji

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