कह लेने दो ....
बच्चा बच्चा कुदरत का नूर होता है
माँ बाप की आरजू का कसूर ढोता है,
क्या खूब फिर मेरे मुर्शिद ने फरमाया,
बच्चे से खुदा का राफ्ता ज़रूर होता हैं। ~ प्रदीप यादव ~
.... ..... .....
व्यस्तताओं के दौर हैं दोस्त भुला कर सलीका जीने का,
सिलसिले ढोते रहना ज़िदगी के इंतजाम की बस हद में हैं ..। ~ प्रदीप यादव ~
.... ..... .....
दे भी गया अब तोह ,
खबर कोई हमसफर,
फिर क्यूं होता रहा ,
बेसबर यूँ आज ये,
खबरदार दिल । ~ प्रदीप यादव ~
.... ..... .....
कलि कलि के फूलने इंतज़ार न होगा अब जवां हुई रलियाँ,
दरियाफ्त थी दे लेता दाद कि तभी सिक्के ने रुख पलट लिया ..। ~ प्रदीप यादव ~
बच्चा बच्चा कुदरत का नूर होता है
माँ बाप की आरजू का कसूर ढोता है,
क्या खूब फिर मेरे मुर्शिद ने फरमाया,
बच्चे से खुदा का राफ्ता ज़रूर होता हैं। ~ प्रदीप यादव ~
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व्यस्तताओं के दौर हैं दोस्त भुला कर सलीका जीने का,
सिलसिले ढोते रहना ज़िदगी के इंतजाम की बस हद में हैं ..। ~ प्रदीप यादव ~
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दे भी गया अब तोह ,
खबर कोई हमसफर,
फिर क्यूं होता रहा ,
बेसबर यूँ आज ये,
खबरदार दिल । ~ प्रदीप यादव ~
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कलि कलि के फूलने इंतज़ार न होगा अब जवां हुई रलियाँ,
दरियाफ्त थी दे लेता दाद कि तभी सिक्के ने रुख पलट लिया ..। ~ प्रदीप यादव ~
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