प्रियम
छलछलाती, बलखाती नदी किनारे बैठ क्यों,
दुनिया के राज ठुकराने को मानस चाहता है।
खिलती धुप हरियाली का सिंगार लुभाता है,
हूँ अकेली पर मेला सा चहूँओर भर जाता है।
बादलों के स्वतंत्र भाव सी अनुभूत भारहीनता ,
देह दरपती कमनीयता का बोध भरमाती है।
बनफूल प्रियम ने अलंकृत कर किया भेंट,
महुआपान पर तरंगित हो मति बहकती हैं।
बसंतोत्सव का पर्व मनाती धरा अनुपम,
विकार बेमेल अवांछनीय को बिसराती हैं।
फूले मोगरे सजे-धजे और कूकती कोकिला,
क्यारी क्यारी फुलवारी की गमकाती हैं ।
वासंती पलाश तले कुलांचते चौपाए के दल,
उपवन ने उन्मुक्त पुहुप पर नियती तय की है।
~ प्रदीप यादव ~
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