भीगे भीगे से हैं आज मन के कोने कोने,
जुल्मी बादलों को पता तुम बतला गए,
शीशे के दरवाज़ों पर जा ठिठकी निगाहें,
कोरों में उभरी नमी लगी अक्स धुंधलाने ,
रख हाथ दिल पर सराहा जमाने में हमने,
वोह दिल की ही दुहाई देकर लगे पिघलाने। ~ प्रदीप यादव ~
खलिश के माने
बूंदों को नदीया का ,
नदीया को समंदर की और समंदर भी जब घुमडते बादलों की
चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के
बावजूद ,दो ' बूँद ' मीठे पानी को तरसता है ।
जीवन चक्र का परिवर्तन ही तो K H A L I S H का आधार बनता है
निदान भी वही होता है । किसी कमी के होने का एहसास है खलिश ...
~ प्रदीप यादव ~
मेरी हालिया ग़ुरबत में तेरी मेहरबानियाँ भी बहुत हैं
तेरी परस्तिश मान भी लेता मगर तू खुदा तो नहीं हैं । ~ प्रदीप यादव ~
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