Saturday, 23 February 2013

खलिश के माने



भीगे भीगे से हैं आज मन के कोने कोने,
जुल्मी बादलों को पता तुम बतला गए,
शीशे  के दरवाज़ों पर जा ठिठकी निगाहें,
कोरों में उभरी नमी लगी अक्स धुंधलाने ,
रख हाथ दिल पर सराहा जमाने में हमने,
वोह दिल की ही दुहाई देकर लगे पिघलाने।   ~ प्रदीप यादव


  खलिश  के माने   

 बूंदों को  नदीया का  , 

 नदीया को समंदर की 
 और समंदर भी जब  घुमडते बादलों की 
 चादर तान लेता है तो अपनी नमकीन सलाहियत के
 बावजूद ,
दो ' बूँद ' मीठे पानी को तरसता है ।

 जीवन चक्र का परिवर्तन ही तो   K H A L I S H का आधार बनता है              

 
निदान भी वही होता है । किसी कमी के होने का एहसास है खलिश ...

प्रदीप यादव ~

मेरी हालिया ग़ुरबत में तेरी मेहरबानियाँ भी बहुत हैं
तेरी परस्तिश मान भी लेता मगर तू खुदा तो नहीं हैं । ~ प्रदीप यादव ~

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