Monday, 4 March 2013



झट्का
....
रत्ती माशा भी तौलता रहता हूँ
,
दीवानगी भरे हादसों का ख़याल कर,

आजकल संभल कर चलने लगा हूँ ,
रवायती रस्मात को तोड़ कर अब,

एतिहातन 
मुहब्बत करने लगा हूँ । ~ प्रदीप यादव ~

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वो
मतला ए गज़ल नुक्ताचीनी कर समझाते रहे,
खामख्वाह ईमानदारी से ग़ज़ल हबीबी बन बैठे ।
~ प्रदीप यादव ~

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1 comment:

  1. सुन्दर लिखा है आपने .

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