Tuesday, 5 February 2013

दरियाफ्त 

मंद पड़ रहे चमकीले नयन कैसे दिखलाऊँ ,
दरियाफ्त के इरादे किस तरह समझाऊँ ,
सचमुच ही हालात के द्वार पर
झंझावात से लड़ा हूँ ?
सुबकियां नहीं थी ना ही रुदन,
फैसलों की ठोकरों को सह रहा हूँ ?
ना पर्वों का उल्लास था,
न भटक जाने का अहसास था।
सूखा बादल था ठंडे मेह को तरसा हूँ।
खोलकर डब्बे को यादों को भरता हूँ।
महती आवश्यकता, निर्मूल समझता हूँ।
मंगल कामना करता हूँ ?
मैं जतन पहाड़ तोड़ने के करता हूँ ?
गिर गिर कर उठता रहा हूँ,
तब कंही जाकर पैरों पर खड़ा हूँ ?
अब नहीं छोडूंगा ज़िन्दगी का दामन,
प्रीत का वादा निभाने चला हूँ ?
रंग रीती को रंगरेज़ का पता,
बताने चल पडा हूँ।
जिद को डुबाने चल पडा हूँ।
राहों में फूलों की मुंडेर सजाने लग पडा हूँ ।
अधूरे मनमंदिर की मूरत को फिर गढ़ने लगा हूँ ?
फिर से एक बार निखर कर संवरने लगा हूँ।
 ..... ~ प्रदीप यादव ~





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