Friday, 13 December 2013

जूठन


विष का पान हैं जूठन ,
गिरता इंसान है जूठन , 
लुटता सम्मान है जुठन ,
अतृप्त श्रंगार है जूठन ,
कामयाब बेईमान है जुठन ,
अमर्यादित अभिमान जूठन ,
साहस का अपमान जूठन ,
अपच का काम है जूठन , 
अन्नदेव का अपमान है जूठन | 


प्रदीप यादव ~ 

Thursday, 12 December 2013

निरापद राजा


निरापद राजा 

वाक्य रचूं ,
या करूँ वाकये की
 रचना,
संभव करूँ,
अभिरंजना की संभावना |

सोच रखूं या प्रगटूं शोक ,
रस रखूँ नीचोड़ कर
नीरस कर दूं |
याचक हो प्रवासी मेधाओं से
स्वशिक्षित कहलवाऊँ । 

साहित्य सर्जना का
अपमार्जक बन बैठूँ |
सूट हुआ तोह ठीक;
परसूँ उतारा जाऊं ।
भाट ही बनुँगा ,
अंगीकार करुं दुत्कार,
पर चाटुकार नहीं बन पा रहा।

उत्कर्ष को आधार कहने वाले से
मेरी पटरी कम ही बैठती है ।
अरे ! निर्वासित की खोज में,
शक्ति कम पर युक्ति
तोह लगती हैं ।
राज कर्म करने में
भक्ति का राजभोग
भी चढ़ाना है ।
पुरुस्कार प्रतिनिधि से
नामित होने में
फिर प्रतिष्ठित विष्टा
का आचमन करुं ।
 
प्रदीप यादव ~

___________________________________________


प्रादुर्भाव " प " से का

By ~ प्रदीप यादव ~ 


प ' का अनुकरण पाठ ,

प ' से पाठक की पड़ताल ; 
प ' से प्रस्तोता का मंथन ,
प ' से पार्थ कुरुक्षेत्र का ,
प ' से प्रस्तुति देती ,
प ' प्रतीकात्मक प्रतीति ,
प ' से पद्य पद, पदेन अनेन ,  
प ' का चिंतन एक पारस छूता मर्म |
प ' से  पारितोषिक पा रहे पुरुषार्थी |


प्रदीप यादव ~


________________________________________



Monday, 9 December 2013








________________




यूँ आसान होता हकेलना भीतर, 
जहर को कलमकशी के लिए ; 
हर जवाब अमृत होता आदम के, 
जी लेने की आशिकी के लिए |
 प्रदीप यादव ~

फर्क | Farq


  
 Farq

_______


   फर्क 



दिखाई देता है, देखने 

और दिख जाने की जिद से ,
मिलता है मिलते रहने से
बार-बार किसी एक से ,
मस्तियों के पलों में
टेढ़े रास्तों की पहचानों में भी ,
काली बदलियों से बरसती
फुहार के भीगोने में भी ,
जिंदगी की पटरी की ,
राहों के थमे छुट्टे लम्हों में ,
फर्क तोह दिखता है ... |


इतराते नकाबों से बाहर

आ कर निगाहें मिलाने से ,
कशिश के बढ़ते इरादों से
डरते कांपते उन वादों में ,
बहक कर भूलती कड़ीयों
के यूँ फिर आस जगाने से ,
बिसराईं भूली यादों पर छाई
गुबार को झटकारने से, 
फर्क तोह दिखता है ... | 


टूटती उम्मिदों पर ढूलके

आंसू छुपाने की कोशीशों से ,
रंगों के खुशमिजाज मौसम में 
छाप ए बेनूरी दबाने से,
दिल अज़ीज़ से मुलाक़ात के
दरमयां फासले बढ़ने से, 
चंद क़दमों में बिछुड़ कर
मंजिलें अधूरी अंजाम देने से , 
फर्क तोह दिखता है ... |


नाहक मतलों में बेईमान

जिन्दगी खोज निकालने से,
बेसबर दिलों की उमड़ती
ख्वाहिश के वरफ नए पढने से,
हों मुश्किल फिर ये हालात 
बिगड़ी बात फिर संवारने से , 
गरज लेने से होती है हासिल
गर बरसात तोह बरसने से ,
फर्क तोह दिखता है ... | 



~ प्रदीप यादव ~

Friday, 6 December 2013

" गधे की शादी "


" गधे की शादी " 

मनचला हो गया हूँ मैं भी आजकल ,
वर्ना सीरियस रहो तोह लोग मुझे भी
सुरेन्द चतुर्वेदी (प्रसिद्ध हिंदी हास्य कवि )
समझने लगे थे |
कहने लगे अपना ये "प्रदीप" बड़ा सिरफिरा है
बड़ी बड़ी बातें करता
है और पक कर खुदी सो ले ता है | 

अब मैंने भी ठान लिया है कि एक काम करो 
प्रदीप बाबू अपनी ही मंडली में से एक को चुनो
उसे इतना हंसाओ की बेचारा खुद को
कामेडी नाइट्स का जज  समझने लगे |
इसमें उसका भी भला और मेरा भी ...!
चलो तोह मैंने भी अशोक चक्रधर जी की
फोटो को ध्यान पूर्वक देखा पर मुझे उनसे
कोई ऊर्जा ही नहीं मिली मैंने तुरंत सोच लिया
" बीडू अगर ये महाशय थोबड़े पे चश्मा गड़ाकर
गंभीर हास्य रच सकते हैं तोह हमें तोह लोग वैसे
ही सीरियसली नहीं लेते ...
और तक्षण हमें ज्ञान हुआ 

कि अपनी छुपी हुई प्रतिभाएं तोह हम व्यर्थ गंवा रहे थे ,
और ये फेसबुक मित्र जाने क्या क्या अर्थ लगा रहे थे |

हमने तुरंत अपने पड़ोसी अरोरा जी को जा के पकड़ा ,
और कर दी फरमाइश ,
फ्रेश और ताजी कविता 
सुन लेने की ,

शीर्षक सुनते ही उनका माथा ठनका,

पड़ोसी बोले  यादव जी हद करते हो |
अरे " गधे की शादी " शीर्षक से भी
कोई कविता लिखता है भला |


हमने कहा मान भी जाओ अभी लिखी है;
सुनते तोह जाओ | 
प्राजी, नया नया प्रयास है,
आप भी हो जाओ राजी |

नहीं माने ... मानने को तैयार ही नहीं थे बोले
पेले इस गधे को रिप्लेस कराओ फिर आगे
की सुनाओ |

मन ही मन फिर मैंने भी सोचा प्राजी को कौन
समझाए ,
नए निराले चलन हैं ,नई ये आबादी;
अरे आज कल सिर्फ "गधे ही तोह करते हैं शादी " |

~ प्रदीप यादव ~ 

Monday, 2 December 2013

हरजाई मुस्तकबिल ...



हरजाई मुस्तकबिल  ...
 By ~ प्रदीप यादव ~

ये किस्सागोई के दश्त में एक बार तोह पूछ बैठूँगा ;

ऐ बनाने वाले बता खुशनसीबी कैद की इबारतें हैं क्यों ?


कि सोते हुए मजलूमों को ख्वाब दिखाने वाले बता ;

ताबीरों के मुकम्मल होते ही हौसलों को गिराता है क्यों ?


हम ख़ाकनशीं हैं गुबार ओ गर्द भरी राह के कारवां में ;

तू इम्तियाज़ सातों आसमानों का फिर आजमाता है क्यों ?  
प्रदीप यादव ~

Tuesday, 26 November 2013

शोले की तड़प


शोले की तड़प 

अंदाज़ों को परखा है हमने :
हुजुर !थोड़ा कम सही ; पर...
ये ज़माना देखा है हमने ...|

ऐ आग ! 
बढ़ने की हद क्या होती है ....

ज़रा किसी दिन चिंगारी से सुन !!!

~ प्रदीप यादव ~

Monday, 25 November 2013

जीए तू सदा


 जीए 
तू सदा 


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हे पुरुष वामांगी नमन ,


सखी सजनी सरस प्रिया ,


जीवन साकार सफल किया |


पिया पल पल अनुरागी


फूलते बचपन का वरदान ,


संकट मोचक बनी बडभागी | 




सुमुधुर ध्वनित सरगम बोली,

लग्नोपरांत पति संग डोली ;

अधूरी पूर्णता का अभिमान;

नखरेली नार भाँग की गोली;

मधुर मंद मुस्काती पत्नी ,

जीवन धूप तोह गुनगुनी तपती,

वामांगी ये 
जो अंग लगती |



प्रसन्न भगवन घर आँगन,

झूमे बगिया कूके उपवन ,

साथ संगिनी गमके जीवन ,

नये अंदाज़ भरे दर्पण,

बूझती शरारत आँख में ,

अगन भरी सिंगार में ,

जुडा कंगन टीका चंदन,

काल से निकाले कल्याण,

जीवन व्रत बने मधुबन |


   
      ~
प्रदीप यादव ~

Friday, 15 November 2013

सितम का मुकद्दर ....


सितम का मुकद्दर ....

बात इतनी बढ़ी कि ज़िकर छिड़ते ही ,
हरजाई हिचकियां उसे सताने लगती !

जब भी बात ये बनती दिखाई 
ही देती ,
तकदीरें तुनक-मिजाजी दिखाने लगी |  ~ प्रदीप यादव ~






शिकायत, दिल चुराने लिखो दरोगा जी ... :) 



ख़याल किसी डर का भी था डरावना भी ,

दिलों में इकरार था नज़रों से इंकार भी ... | 

~ प्रदीप यादव

Friday, 8 November 2013

ज़िंदगी ने जिसे अपनाया ...



ज़िंदगी ने जिसे अपनाया ...

कैसे करता मैं इंतज़ार भोर का,
मेरा चाँद तोह अभी डूबा नहीं |
बाद हौसला वो मैकदे तो आया ,
उल्टा लौटा जो नजरों से तर था |  

~ प्रदीप यादव ~


_________________________________

आईना दिखा के वोह बोला ...

तुम बोलते हो तोह मान लेते हैं |
वर्ना, सच के टिकने का खतरा भी नहीं है ;
इस झूठी दुनिया में ...|


प्रदीप यादव ~



Sunday, 27 October 2013

मतलबी रिश्ते



मतलबी रिश्ते 

जल रहा था वोह
 लगी बुझाने की ,
... जरूरत क्या थी ?

उसकी मौत पर
सिसकती उम्मीदें जगाने की
... जरूरत क्या थी ?

युवा होते हौसले को ,
अंगुली पकड़ा चलाने की ,
... जरूरत क्या थी ?

तन वो बेचती थी ,
पेट की आग बुझाने को ,
वादे के तिलिस्म दिखाने की,
 ... जरूरत क्या थी ?


दुत्कार से रूठे अभिमान को

अभी से मनाने की 
... जरुरत क्या थी ?

दोस्त्ती थी जिनसे कल तक;

 उन्हें आजमाने की  
...जरुरत क्या थी ?

जानता हूँ नफरतें दूर करती है ;

दुश्मनों को अपनाने की ....
जरुरत क्या थी ?        
~ प्रदीप यादव

Saturday, 26 October 2013

घोटाले का अवज्ञा आन्दोलन


घोटाले का अवज्ञा आन्दोलन 
           
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ये आचार संहिता हड़पने नहीं देती ईमान !
चुनाव आए देश में भूखे वोटरों को लुभाने |

व्यर्थ है अब रथी बन कर चक्रव्यूह भेदन ,

किया करो आरंभ नई कुप्रथाओं का चलन |

कंस वध करो या फिर कर दो रावण-दहन ,

मूक बन सुनो मृतप्राय मर्यादा के क्रन्दन|

शासकों ने करवाए शोषितों के अभिनंदन ,

अवसरवादी क्योँ भूलें चुनावचक्र में उद्यम ?

बनाओ 
परिवारवाद  के अखंड समीकरण ,
पाचक बूटी पीकर पचालो सारे खाद्यान्न |
ह्रदय-परिवर्तन सत्ताधीश के नए अनुसंधान |
राम मिले फिर प्याज से भूखे के हों भगवान !

सांड लड़ाने जैसा यह रोमांचकारी अनुभव ,

गोदामों में 
रहे अनाज रूपया हो रहा गरीब ,

दाने दाने को तरसते चारे से कुबेर किसान ,
भंग करो विकास भाईचारा मिल करें घोटाला |
 
~ प्रदीप यादव

Wednesday, 18 September 2013

माँ के हाथों की रोटी ...

FB              २९\ ९

माँ के हाथों की रोटी ...
दृष्टिकोण मेरा भिन्न है ,
रोटी अभी भी सौम्य है | ...



कालिख घुलती खेती में ,
मलीन मालती उपजती ,
विषैली समृधि ढो लेती ,
कडवा ना पचाने की चाह ,

लार टपकाती जीभ पर .
मरी हुई स्वादेंद्री क्यों ,
रसास्वाद को तरसती |

बिंदु बिंदी चुड़ीयों के हाथ , 
अपनत्व की रोटी पकाती ,
माँ अब भी बेटी को तेरी ,
धूसर धब्बे की पकी रोटी ,
वैसे ही ढांढस बंधाती है ,
माँ आज भी हर भूख को ,
ममता लोरी सुनाती है |

By ~ प्रदीप यादव ~

Tuesday, 17 September 2013

हमारी भी दास्ताँ



हमारी भी दास्ताँ 


इश्को हुस्न की मारा मारी हैं ,
गिन-गिन के बदले हम देते गए ,
दीवाने थे जिसके हम उस पे , 
इल्ज़ाम भूल जाने का धर गए | 

नई बात थी कोई बतलाने की ,
इस बहाने उस से मिलते ही गए,
शान ये होती हमारे चाहने की , 
वोह आए गुले उल्फत खिल गए | ~ प्रदीप यादव ~
  
FB            २८\९ 

जो दिया किसी ने खुशी के लिए सहारा ,
आप खुशी का उसकी भी रखना ख्याल ,
खुदा देता हैं हर बंदे को अदा उल्फत की ,
दिलों से सिर्फ नफरतों को बाहर रखना | ~ प्रदीप यादव ~


FB             २९\९ 


है माले मुफ्त का दौर यहाँ ,
वजीर चुप जनता बेज़ार है ,
युवराजों में खुन्नस का माहौल ,
महारानीयाँ उडाती रहती ,
शिष्टाचार का मखौल,
जित खोजें  तित पाईऐ,
भ्रष्टाचार ओ घोटाले अनमोल ,
बने संस्कृति रक्षक वही,
जिनके रहे आस्थिर खोल ,
हाथ लड़ाई जो लड़ा ,
हुआ उसी का डिब्बा गोल ,
बजा करते कभी जिनके डंके  ,

मंसूबे टूटे ,फट गए थे ढोल |  ~ प्रदीप यादव

Friday, 13 September 2013

हिंदी दिवस




FB       १९\९ 


आपका आभिवादन आदरणीय मित्रों,

हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आपका अभिनन्दन। ….
मेरा दृष्टिकोण हिंदी भाषियों की विशेषज्ञता से अधिक उनमें हिन्दी साहित्य और संस्मरण को पढने की
रुचि से हैं, और हिन्दी जैसी समृध भाषा के साहित्य को सिर्फ इसलिए त्यागना कि भविष्य का साहित्य
तो मेरे आगामी  पीढ़ी  की हिंदी ना जानने की समस्या की  वज़ह से पढ़ा ही नहीं जाएगा मेरी समझ से
अनुचित होगा। हिंदी के प्रयोगकर्ता भाषा, विभाषा, उपभाषा, बोली और अपभ्रंश को समाहित कर अपने व्यवहार प्रदर्शित करते हैं ।
                    बपौती का ,धरोहर का ,तहज़ीब का सम्मान न करें, तो भी गलत होगा ... कुछ आज भी इसी कारण से प्रसिद्ध हैं,  कि ज्ञान की इस  श्रव्य  परम्परा से अनुराग के चलते  वे भारतीय  अध्यात्म के मुख
वर्णित ज्ञान में दक्षता पा गए हैं। परन्तु ज्ञान विनम्र  और  विवेकशील  सिद्धान्तों का अनुसरण द्वारा प्राप्त
होता है ।
आजीविका के लिए ज्ञान अर्जित करना और सफलता के लिए ज्ञान अर्जन दो अलग बातें हैं। एक  अच्छा दुभाषिया कई तरह की  भाषाएँ बोल लिख या व्यवहृत करता हैं इसका अर्थ कदापि नहीं  कि वह सांगोपांग
और सफल हैं। परन्तु  साहित्य कला या साधना  का क्षेत्र उसे ही माना जाता है;जिसमें  पहले से स्थापित  प्रतिमानों  की  टीका, विवेचना, समालोचना अथवा प्रासंगिकता  का  उल्लेख ज्ञानी अपने विवेक से  और संस्कारों की युति  के द्वारा  निर्धारित कर उसके पक्ष में  प्रमाण अथवा सिद्ध प्रयोग रखते हैं .... तभी तोह वे लब्ध- प्रतिष्ठित आविष्कारक, अनुसँधानकर्ता, लेखक, नर्तक,संगठक  अथवा ज्ञान गुरु कहलाते हैं।
बपौती का गर्व  करना भी  मानव  स्वभाव हैं .... या यूँ  कहे कि  मान  लीजिए में मांस भक्षण नहीं करता
कितु मेरे मित्र करते हैं तोह यदि प्रमाण स्वरूप मैं वातावरण और अनेक साम्यताओं के उपरांत भी वही क्षमताएं रखूँ जिसका उपहास मेरे मित्रगण मांसाहार न किये जाने को लेकर करते थे, तोह यह मेरे बपौती
के मूल्यों का सम्मान करना हुआ। किन्तु यदि पर्याप्त ज्ञान के बाद भी बिल्ली द्वारा रास्ता काटने के भय से ग्रसित रहता हूँ  तोह मैं कहूंगा  कि यह मेरा  अंध - विश्वास हैं। अतः नए दृष्टीकोण और अपनी धरोहरों के
संरक्षण के द्वारा ही हम प्रारब्ध प्राप्त कर भाषा को सिरमौर बना कर रहेंगे ।
 ~  प्रदीप यादव ~ 

Wednesday, 11 September 2013

विरहाकुल निशा



FB        १३\९ 


विरहाकुल निशा
… 


अंगवस्त्र सी रात हैं ,

सुकुमार चन्द्र मध्यम ,


रख चांदनी की अभिलाषा ,


मदिर वायु की मादकता ,


व्योम क्षेत्र में नक्षत्रों के ,


मंदिप्त प्रकाश पर ,


चंद्रकलाओं का कर श्रृंगार ,


चन्द्रकान्ता बन संवरती ,


कला-कला कर अस्ताचलगामी ,


शशिपति का योग पाक्षिक है ,

अरुणिमा की टेर तक ,

रजनी के प्रारब्ध की बोधि तक ,

विरहाकुल निशा कृष्णा हो रहती हैं ।  
 

 ~  प्रदीप यादव 

Saturday, 7 September 2013

FB      १०\९

Dil Fareb hain aansu ,
Matlabi ye nigahein .
Hota nahi Duniya mein ,
Wohi jo ham Chahein .
~ Pradeep Yadav ~

दिल फरेब हैं आंसू ,
मतलबी ये निगाहें।
होता नहीं दुनिया में ,
वोही जो हम चाहें॥  
  ~  प्रदीप यादव ~

FB               ११\९ 

शानदार जिक्र हैं ,
बस तेरी ही फिक्र है ,
जुदा कोई हो इश्क ,
मुबारक दोनों से है ।
 ~  प्रदीप यादव ~

Shandaar Ziqr hai ,
Bas Teri hi Fikar hai ,
Juda Koi ho Ishq ,
Mubark dono se hain . ~ Pradeep Yadav ~


Friday, 6 September 2013

कुछ सिहरने , धड़कते रहने का पता देती हैं …
Keep calling your love ।


Ishq ke Fasano ne hamein bhi galiyon mei mumtaz kar diya ,

Doori Maikade se rakhie Saqi ne koi aur daman tham liya .
   
~ Pradeep Yadav ~


इश्क के फसानों ने हमें भी गलियों में मुमताज़ कर दिया ,
दूरी मैक़दे से रखिए साक़ी ने कोई और दामन थाम लिया। ~ प्रदीप यादव ~

Mumtaaz , मुमताज़  =   Famous , प्रसिद्ध , नामचीन


यूँ भी ना हुआ हमसे कि … 

चाँद की तमन्ना भी रख लूँ ;
दागों को देख आदतें भी बदलूं  ॥
 ~ प्रदीप यादव ~

Yun bhi na huaa humse ki …


Chaand ki Tamanna bhi rakh Lun;

Dagon ko dekh Aadatein bhi badalun . Pradeep Yadav ~


Good evening dear  Friends …



Wednesday, 4 September 2013

FB                 ८ \ ९     


उम्मीदों की लाशों को ढोते रहने का कायल 
नहीं मैं अब  ,
इंसाफ के लिए सर पटकने से बेहतर है राहे जुर्म छोड़ दूं ।  ~ प्रदीप यादव ~

Umeedon ki Lashon Ko dhote rahne ka Kayal Nahi Main ab ,
Inasaf Ke liye sar patakne se behtar Rahe Jurm Chhod doon .   

Pradeep Yadav ~

FB          ७\९

दरपन  दरपन बरसी मेह ,
कछू सोखिं कछु रहीं अघाय ,
प्रेमांकुर ताहू उपजो  नाय ,
नार भयी ज्यूँ हिरदै लगाय ।
 ~ प्रदीप यादव ~

Darpan darpan barsi meh ( shower) ,
kachh sokhi kachh rahi aghay ( had Enough ),
Premankur toh upajyo naahee , 
Naar Bhyee jyun hirdaei lagay . ~ Pradeep Yadav ~

A Lovable relation is desired by many can't find some ,

as only some gots the flavour in their heart ...... Pradeep Yadav



Monday, 2 September 2013

रवानगी ( A Path For An Achievement )

 FB           ५ \ ९ 
रवानगी ( A  Path For An Achievement )

हद ए  मंजिल को पाना ,
दीवानगी से कम नहीं ,
तू मंसूब तोह हो सकता है ,
महबूब मिले या नहीं ।

तख्ती लगा दो ,
मेरी रवानगी की प्रदीप ,
अब मंज़िले मिले या के हम !
 ~ प्रदीप यादव ~
 

FB       ४/९ 


काँटों के बीच गुलों का,
गलीचा बिछाकर घूमता है ,
फरामोश है वोहईमान से,
आईने बेचते फिरता है ।
 ~  प्रदीप यादव ~


ऐ गुल…. 
तूने सिर्फ सुन लिया, मैंने तोह सहा था।
किस्सा पंखुरियों ने कहा था।
सहारा तुने दिया बेल सा मन लिपटा था।
सपना उनींदी आँख से टूटा था। 
तरसती निगाह में बेसबर सा इंतजार था।
महक को 
साँसों से प्यार था।  
पीली-पीली धूप ने मुरझाना सिखाया था।     
गुलकंद बन जुबां पे बसा था।   ~  प्रदीप यादव ~


FB           १\९

यूँ रहता है बाक़ी खलिश से इतर भी कुछ ,
दूर अरमान कोई दिल से जिया करता हैं ।   
~
प्रदीप यादव 

Yun Rahata hai baaqi  khalish se itar bhi,
Door armaaan  koi dil se jiaa karta hai .    By ~ Pradeep Yadav ~


Sunday, 1 September 2013

 FB       ३/९

बापू  बनना … 

पथ डिग जाऊं जिस दिन
वचन  तोड़ना अहिंसा वाला ,
मार मुझे टाँगना चौराहे पर,
पथ गुज़रे संदिग्ध हवाला।
खींच निकालना शव मेरा ,
उसे दिखा कर न्यायदण्ड ,
नई खड्ग से यमद्वार दिखाना ,
खाल छीलकर मेरी जुते बना,
खूब दलना खरपतवारों को,
है ये नातेदार नाज़ायज ।

शहीद प्राणों की आहुति देते ,
सर काटने वाला ,
दुश्मन के मन हैं काला,

मेरा चोला निर्लिप्त रहे ,
मुखर रहे बोलों की ज्वाला ,
माँ ,अब ना पीउँगा ये हाला,
तंत्र ( सिस्टम ) के भक्षक को
भेंट करूँ कालपात्र  लहू वाला,
जलता लोकतंत्र स्याह काला ,
मस्त मदांध मतवाला,
तू काहे की जनता है री,
मैं काहे का रखवाला।  BY ... ~ प्रदीप यादव ~

It sayas …. 
" It was My Determination , ….  so they thought me the deserving one ! "

हमराज

 FB         २ \९ 

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें नामों की जुगाड़ से बाहर ,
रह कर अनोखा करते देखा है। ……

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें अंधी दौड़ को पीछे छोड़ ,
बेडौल दुनिया में संतुलित होते देखा है । ….

मेरे Mystery Mitर , जब से तुम्हें नाचते गाते जिंदगी का
हर लम्हें पर इंतज़ार करते देखा है । …….

मेरे Mystery Mitर , बांकपन से संजीदगी और चुनौती से ,
आँखें मिलाने का दुस्साहस देखा है । …

दोस्त हर राज़ को राज़ रखने की कीमत ना चुकाना ,
हर्ज़ ज़िन्दगी के हमराज भूलाने में नहीं ख़ुशी भुल जाने में है ।

                   
          ~ प्रदीप यादव

Saturday, 31 August 2013







FB        ९ \८ 

सर्जना तु, हों लाख कई वर्जना ,

ना बन मत-विभाजन की अनुषंगिनी ,
संवेदना बन ना कर अतिरंजना,
लेखनी तू यज्ञोपवित हैं ज्ञान का,
उपासन हैं कमलासना माँ शारदे का,
रह तटस्थ हैं आधार स्व-प्रतिकृति का । ~ प्रदीप यादव


Sarjanaa tu, hon laakh kai varjana,
Naa ban Mat-vibhajna ki anushagini ,
tu samvedana bakar naa kar atiranjna,
lekhni tu YAGYOPAVIT hai gyan ka , 
Upaasan hai MAAN SHARDE KA ,
Rah Tatasth hi aadhaar Sva-pratikruti ka.

~ Pradeep Yadav ~



Sunday, 25 August 2013

  FB           २२ \८  




मेरी देह क्या थी ? बस इक किराएदारी,
बना कर इस सफ़र में बैठा गया सवारी,
सफ़र में हम थे और तुम थे संगी साथी,
रास आती सवारी तभी जाने की तैय्यारी।
  ~ प्रदीप यादव ~ 




Saturday, 24 August 2013

चुनाव आ रहा ,…


चुनाव आ रहा ,… 



कोई अजान लगाए,
पढ़े गीता कोई मेरे रब्बा,
मालिक को बाँट कर,
मिल्कियात पर करे कब्ज़ा,
मेरे मुल्क की सियासी,
रहनुमियात का रखने दावा,
आने वाला है निजाम नया ,
भिड़ा रहा हैं नाप तौल का काँटा,
भरेपेट को मिला चावल आटा,
घोटाले चूसा करे गरीब इलाका,
बांटे गए को घर कब मिलता हैं,
यहाँ सहारों को तूफ़ान मिला है ,
 कश्तिया मेरी है ,सख्त जाँ ,

मंशा पर समंदर की पानी फेरा,

है सख्त सद्भावना का घेरा, 

बिगुल बगावती है फूंका,
रहे हो तकते,रह ही जाओगे,
उन्मादी अंधड हूँ बिखर जाओगे,
 जो बरसा तो तबाही के सैलाब,
बर्बादियों के सबब पुछुंगा ,
 सिमटेगी शर्म की ईंतेहा ,

सराबोर-ऎ-जुर्म,
हो जाओगे पानी-पानी  ।


By 
~ प्रदीप यादव  ~

Thursday, 22 August 2013

शब्दांजलि


शब्दांजलि 

दिवस विस्तारित किरणों के ,
संकल्पों के सत्याग्रह सा गिरीवर,
अविरल जलधारा अर्ध्य चढाती ,
मैदान खलिहान पोसती जाती ,
बांकपन तराई के उर्वर किसलय का ,
पीत हरिताभ अन्नपूर्णा के वरदान,
शंक्वाकार वृक्ष आकाश चुम्बी,
शल्कों के उम्र भरे इतिहासों ने ,
शब्दांजलि हो पढ़ डाली नई।    
   ~ प्रदीप यादव ~



Wednesday, 21 August 2013



मुलाकाती


अच्छा चलो,
याद तोह आया;
वोह बेखबर,
मिलता नहीं है,
आजकल हमीं से,
शुबहा है ! मुझ से,
कुछ रूठा हुआ है ।
  प्रदीप यादव ~

Achhaa chalo,
yaad toh aaya ;
Woh Bekhabar,

Milata Nahi hai ,
Aajkaal hamin se,
shubhaa hai ! mujh se,
Kuchha rutha hua  hai .By ~Pradeep Yadav ~


FB     १३\८

अँधेरे लाख थे मगर;
ये ख्वाहिश ही थी,
जो दर पे तेरे खींच लाती थी।
किस किस को समझाऊंगा,
ना भूल पाने की "आदत" भी,
तोह एक जियादती थी।
~ प्रदीप यादव ~


Andhere Laakh the Magar;
Yeh Khwahish hi thi ,
Jo tere dar pe khinch laati thi ,
Kis kis ko samjhunga,
Yeh Na bhulane ki "aadat" ,
Bhi toh ek jiyaadati thi . ~ Pradeep Yadav ~

जियादती or jiyaadati  =  दुर्व्यवहार Or  Brutality 

Monday, 19 August 2013


FB    ११ \८

करता तोह मैं भी आया गुस्ताखियाँ बेहद ,
सोचा किये था मुड़ जाऊँगा अगले ही मोड़ पे। …
 ~ प्रदीप यादव ~

Kartaa toh mein bhi aaya gustakhiyan behad ,

Socha kiye tha mud jaoonga Agle hi MOD pe .BY ~ Pradeep Yadav ~

FB     १२\८

सरमाया हुक्काम की ना खरीद पाएगी तुझे,
ताज्जुब नहीं उसके जैसे नज़राने ही दे पाते !
किसी और शहर चल संग मेरे दर्द के जिल्द,
सुना है तिज़ारती ग़मों के हमें ढूंढ ही लेते हैं। 
 ~ प्रदीप यादव ~

FB   १२\८ 
Sarmaya Hukkam Ki Na kharid paaegi tujhe.
Taajub nahi uske jaise nazrane hi de pate ,
kisi or shahar chal sang mere dard ke Zild ,
Suna hai Tijarti gumon ke hamein dhundha hi lete hai .
Pradeep Yadav  ~


FB          १४ \८ 


 'साख'

मैं सिखाने चला था ,
दो के चार करने का गणित,
ना पा रहा सुलझा जिस को ,

गुमसुम किनारे बैठा रहा ,
छोड़ हल होने की आस को ,

जाना अनमोल प्यास को,
यूँ बहते पानी का मोल नहीं,
आदम नहीं! पहचान, 'साख' को ।  
 ~ प्रदीप यादव ~

 
'Saakh '

Main  Sikhaane Chalaa tha,

do ke chaar karne ka ganit,
Naa paa raha Suljha jis ko ,
Gumsum  kinaare Baitha rahaa  ,

chhod hal hone ki aas ko,
yun bahte paani ka mol nahi ,
aadam nahi !Pahchan ,'Saakh ' Ko. 
  ~ Pradeep Yadav

Sunday, 18 August 2013


FB    १० \८


दिल हार दिया जब से तुमसे प्यार किया ,
जीते तू ये जग हार को मेरा नसीब किया। ~ प्रदीप यादव ~


FB     ७\८
मनोनूकूल मित्रगणों में मनोवृत्तियां की टकराहट सर्वदा ,
पाठकों \ मित्रों के मनःपटल को क्लांत करती हैं। भावातिरेक में शब्दों के अर्थ खोते जाते हैंऔर निरं - कुश लेखनी हो अथवा वचन; कठोरता का वाहक सदैव वार्तालाप का शिष्टाचार समेकित रूप में निर्वाहित नहीं करते ।
___प्रदीप यादव

Saturday, 17 August 2013



FB     ८ \८  

लिखा करते थे कभी 'दर्द' हम जिसे,
उनकी खुशियों का सामान निकला,
मसरूफ रहने वाले हमें तोह बुलाते ,
क्या इतना ज़बरदस्त काम निकला?

प्रदीप यादव ~

Likha karte the kabhi 'Dard' hum jise,
Unki khushiyon ka saaman nikla .
Masroof rehne waale hamein toh bulate,
Kyaa itanaa Zabardast kaam nikala? Pradeep Yadav ~

Tuesday, 13 August 2013

पगली बूँद



पगली बूँद
________________

चल पगली बूँद ,
बह निकल,
किसी पहाड़ी नदिया सी,
स्वछंद और उंमुक्त,
दूर तक फैले चारागाहों ,
वन-प्रांत की निसर्ग में ,
वनस्पति को सिंचती सरिता,
बह अमृत औषध बन ,
फसलों की अभयदात्रि ,
वर्षाकाल के आकाश की,
"बूँद" तू और तेरे
कई कई स्वरूप ,
निश्छल नन्ही सी थिरकन,
अल्हड़ किशोरि सी भटकन,
तोह कभी शांत सलिला सी स्थावर ,
निर्झर की गहराई लिए ,
मीठा स्वच्छ पय खारा करने,
स्वयं को सागर में समोने में ,
रूपगर्विता नदिया का ,
सोंदर्य शिखर पर होता है।
_______________
 ~ प्रदीप यादव ~
13 AUG 2013 ;  08 : 37 PM 

नाकाफी



बूंदों की बरसात ,
चश्मे के पर्दे ,
नदी की मौजें ,
समंदर की लहरें …
नाकाफी हैं ,
हौसलों की प्यास के आगे।
 ~ प्रदीप यादव ~

Boondon ki Barsaat ,
Chashme ke Parde,
Nadi ki mouzin ,
Samandar ki lehrein ....
Naqafi Hain ,
hauslon kee Pyaas ke aage. Pradeep Yadav ~


Tuesday, 9 July 2013

शुभ कामनाएं




Yunhi bekhabar saa chlaa jaa rahaa tha.

Tumse mila toh Sazdaa karne ko ji chaha,
doston ne bharam rakh liyaa jine kaa ,
Zindgee tum se bezaar huaa jaa rahaa tha .  ~ Pradeep Yadav ~

दिवस की शुभ कामनाएं मित्रों ...

यूँ ही बेखबर सा चला जा रहा था ,
तुमसे मिलके सजदा करने जी चाहा ,
दोस्तों ने भरम रख लिया जीने का,
वर्ना जिंदगी से बेज़ार हुआ जा रहा था।
   प्रदीप यादव ~ 



यादों का हरापन जिंदगी में बनाए रखना,
नमी ज़स्बातों की खुशनुमा रहने को काफी है।
~
प्रदीप यादव



Yaadon ka Haraapan zindagi mai banaye rakhna ,
Nami jazbaaton ki  khushnuma rahne ko kaafi hai . 

Pradeep Yadav ~ 

>>>>>>                  ...................                    <<<<<<

Kisi Roz Mujh Saa Tikhapan bhi zaroori hai,
Lazzatein badhane ke lie ।
Hamesha darqar achchi nahi mithaas bhi,
Tavaazum E Hazama ke lie । ~
Pradeep Yadav ~
  
Tavaazum E Hazama = test supplement or balance to digestive .

किसी रोज़ मुझ सा तीखापन भी ज़रुरी 
है, लज्ज़तें बढ़ाने के लिए । 
हमेशा दरकार अच्छी नहीं मिठास भी,
तवाजुम ए हाजमा के लिए ।
 ~ प्रदीप यादव
तवाजुम ए हाजमा  = स्वाद संतूलन या सुपाचन


दरख्वास्त 

बहुत बोलते हैं नैन ,
जब इश्क किया करते हैं। 

कुछ ख़याल जिंदगी को,
रंग जाया करते हैं ,
कुछ रंगों से किनारा करते हैं ,
राज ए दिल कह लिया करो,
चुप रह जाने से मौसम,
खफा हो लिया करते हैं ।
 ~ प्रदीप यादव ~

Sahan shakti


सहन - शक्ति 

कैफियत पूछता रहा,
जमाना भी,
हंसकर मुझ से, 
कि ऐ जीने वाले !
बता तुझ में दम,
सहने का है कि नहीं ?

कह दो .. कह दो !! दुनिया से,
जिद लड़ने की जिसने,
ठोकरों से है सीखी। 
"मंजिलों " को औक़ात भर 
याद दिलानी हैं ।                  ~ प्रदीप यादव



Sahan - Shakti 

Kaifiyat puchhata rahaa,

Zamaana bhi,
hanskar Mujh se ,
ki E Jinee waale !
btaa tujh meinDumm sahne ka,
Hai Ki Nahi ?


Keh do.. Keh do !! Duniyaa se ,

Zid ladne ki  jisne,
thokron se hei sikhee ,
"Manzilon" ko auqaat bhar,
yaad dilaani hain.
.                    ~ Pradeep Yadav ~


सपने ज़ीने के लिए भी,
उम्र ऐ ज़वानी कम हैं,
हो सके तोह जगाए रखो,
एहसास ऐ दीवानगी,
गर सो गए सपने तोह समझो,
मंजिलें 'बेदम' हैं ।  
 ~ प्रदीप यादव ~

Sapne jine ke lie ,
Ummr E Zawani kam hain ,
Ho sake toh Jagaae Rakho,
Eahsaas E Deewangi,
Gar so gaye Sapne Toh Samjho,
Manzilein BEDAM hain .
   ~ Pradeep Yadav ~




Friday, 5 July 2013

सौ रू किलो टमाटर


सौ रू. किलो टमाटर ....( कटाक्ष ) 

इक दिन सम्मलेन में,
कविता बेढंगी पढ़ आया था ,
बीवी की फरमाइश थी टमाटर ,
सो अपनी पे उतर आया था।
क्या मालूम श्रोता थे कंजूस,
सन्नाटे को चीरती सनसनी,
बना खुशियों का सबब तभी ,
जो किसी ने एक फेंका गोला,
उस पर लिपटा कागज़ खोला,
अन्दर लिखा मज़मून बोला,
"गुरूजी आप तोह निकल ही लो,
अगला कवितापाठ को मचल रिया
हैं ये तोह घटिया कविता का
कम्पीटीशन ही चल रिया हैं
इनाम किलो भर टमाटर जो रख दिया हैं "। ~ प्रदीप यादव ~    

देहरी के भीतर


देहरी के भीतर 

आस की गोरैया,
को बुला लो,
बुझी रौशनी पर,
दीपक जला लो ,
कुछ तोह घटा हे,
उस देहरी के भीतर
वहीँ मिटा लो,
जुगनु की रौशनी में,
लक्ष्य पहचाने नहीं जाते,
अनजान लक्ष्यों पर ,
मज़िलें नहीं मिलती।
यूँ ही दर्दों की,
पहेली नहीं सुलझती।
मन के हारे,
हार नहीं होती।  
जिसने जीती,
बाजी हार कर ।
दुनिया सलामी उसे,
देते नहीं थकती।
~ प्रदीप यादव

ममता और सूरज


ममता और सूरज 

डूब शाम के मैखाने में,
सूरज ने सियाह आसमान पे,
जाम  के चमकीले छींटे जड़े ,
धोकर आस्मां की सियाही,
दरिया ने दमकते सूरज को ,
फिर सूखने टांग दिया था,
खुले आसमान पे।

यह धधकता सूरज,
क्यों नहीं समझ पा रहा था ?
अपनी ममता को पोसने,
जो ढूंढती अंजुरी भर पानी,पसीने में भिगोती खुद को,
भोली सी जीवट माँ का दर्द ,

ऐ ! नशेड़ी सूरज,क्यों नहीं,
एक टुकडा बादल का बरसा,
उस ममता को,
ढांढ़स, ही बंधा पाया ???    ~ प्रदीप यादव ~ 


Mamta aur Sooraj


Doob shaam ke maikhane mein ,
sooraj ne siyaah aasmaan pe ,
jam ke chamkile chhinte jade,
dhokar aasman ki siyahi,
dariya ne damkte  sooraj ko  ,Fir sukhane tang diya thaa,khule aasman pe .

Yeh Dhadhkta sooraj,
kyon nahi samajh paa raha tha ?
apni mamtaa ko posane,
jo dhundhti anjuri bhar paani ,
pasine mein bhigoti khud ko,
bholi see Jivat Maan ka dard.


E nashedi Soorj kyon nahi ,
ek tukda baadal 
ka barsa ,
uss mamata ko,
dhandhas , hi bandha Paya ???
 ~ PRADEEP YAADAV ~






Thursday, 4 July 2013

मस्ती के सबक


मस्ती के सबक ....

मैं हूँ नाज़ुक कश्ती कागज़ की,
है भरोसा तोह उस पार जाने का,
गर डूबी तोह मज़ा आजमाने का,
बिन पतवार नसीब मनाने का ,
उलझी ज़िदगी को सुलझाने का,
नई मस्ती के सबक सिखाने का,
आफत से दो चार करने का,
मैंने हवाओं में सीखा टिकना,
किस्मत के थपेड़े से जूझना,
                  मैं हूँ नाज़ुक कश्ती .....
by ~  प्रदीप यादव ~


<<<<<<         ...............           >>>>>>

टूट कर बिखरे हो, तोह तुम ज़हान बन जाना
चाहत भरे दिल में किरचे की तरह बस जाना। 
 ~  प्रदीप यादव ~

Tut kar Bikhare ho toh tum zahaan ban janaa ,
Chahat bhare dil mei Kirche ki taraha bas janaa . ~ PRADEEP YADAV ~  

Tuesday, 2 July 2013

इ शा रे

       
    <<<<<    ISHARE   >>>>

MAIN JAANTA HOON KI TU SAMAJH RAHAA HAI.,
TU BHI JAAN LE KI ; MAIN SAMJH GAYAA HOON.
~ PRADEEP YADAV ~

      _____   इ  शा  रे  ____

मै  जानता हूँ कि; तू समझ रहा है ,
तू भी जान ले कि; मै समझ गया हूँ ।  ~ प्रदीप यादव ~ 


 <<<<<       .....................          >>>>

किस्सा ये लेन-देन का बड़ा पुराना सा लगता है,
तंहाई का हर सिलसिला एक बहाना लगता है।
 ~ प्रदीप यादव ~ 

Kissa ye len-den kaa badaa puraana saa lagataa hai ,
Tanhaai kaa har Silsila Rk bahaanaa lagataa Hai . 
 ~ PRADEEP YADAV ~




Saturday, 29 June 2013

कलाम ए अक्सरियात


कलाम ए अक्सरियात  .....


मिलते हैं जब भी कभी जमाने में,
मेरे महबूब दूरी सी बनाए रहते हैं
निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं ।

आज फिर आग से आग बुझाने के,
अरमान दिल में हिलोरें लेते हैं।
मिलता नहीं दिल को सूकून कहीं ,
मस्त निगाही के पियाले जो पिए बैठे हैं।

ए इश्क ज़रा सबर तोह कर,
सुन दीवाने दिल की ताकीद भी,
यूँ हसरतों में सही चाहत के
सहमे सहमे से तूफ़ान समेटे हैं ।

निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं ।

आज तोह सामने रख भी खुल के ,
फरियाद सीने में जो लपेटे है।
मुरीद ए निगाह यहाँ यादों के,
जशने ज़माना मनाए बैठे हैं ।

सुगबुगाहटें लरजते दिलों की ये,
गुल कौन सा नया अब खिलाएंगी
मचलता ये दिल बल्लियों उछलता,
दीदारे महबूब मुसीबत बनाए बैठे हैं ।

निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं । ~ प्रदीप यादव ~







फितरत ए दीवानगी


है फितरत जिनकी रूठना और मनाना,
मर्ज़ ए  दीवानगी के शिकार हो लिए,
हमने  दर्दों  को अपने पाला  भी तोह,
बहाने उल्फत भूल जाने के कह दिए।  
 ~ प्रदीप यादव ~

Hai fitrat jinki roothnaa aur manaana,
marz e dewaangi ke shiqar ho lie 
hamne dardon ko apne palaa bhi toh,
bahane ulfat bhool jane ke Kah die. By ~ PRADEEP YADAV ~

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तस्वीर धुंधली दिखा आइना भी पर्दा कर लेता है,
रोती आँख महबूब की ज़माने से बचा ले जाता है । 
 ~ प्रदीप यादव  

Tasvir dhundhli dekh aaina bhi parda kar letaa hai .

roti aankh mahboob ki zamane se bacha le jata hai . ~ PRADEEP YADAV ~

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जीने की तौफिक देने वाले से,
उसका अंजाम पूछकर,
क्यों आस की सलाहियतों,
को अंगुठा दिखाएं,
काम चलो ऐसा करें,
कि दिलों में नक्श हो जाए । 
 ~ प्रदीप यादव ~

Jeene ki taufiq dene waale se ,
uskaa anzaam poochh kar,
kyon ? aas ki salaahiyaton ,
ko anguntha dikhaaein,
kaam chlo essa karein,
Ki dilon mein Naqsh ho jaaein .  By 
~ PRADEEP YADAV ~

Saturday, 15 June 2013

शोला दिल


शोला दिल


शोला दिल हूँ ,
राख के एहसास समझता हूँ ।
गमों के कोयले,
धुंआ किया करता हूँ।
जानते हो, कालिख जमा कर,
हर्फों की रोशनाई छापता हूँ ।
काफिर कहते हैं मुझे,खुदा वाले
पंडित अधम समझते हैं।
मैं करता चला दिल की सुन,
वोह दिलजला कहते हैं ।
तमन्नाएं सुर्ख कर,तपिश ये
सहने के इंतजाम करता हूँ ।
मैं बच्चों को आज़ाद कर,
खुद का संस्कार करता हूँ ।
माना बेतरतीब ही सही,
ऐ ज़िंदगी तुझे ,जी लेने
की कोशिश तो करता हूँ ।
  by  ~ प्रदीप यादव ~
 
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ए जिंदगी तुझे तोह काँटों में भी ढूंढ़ लूँगा,
पता खुशी का महकते गुलों से पूछ लूँगा। ~ प्रदीप यादव ~















Tuesday, 28 May 2013



चाहत में मेरी संदेश भेजोगे नोटों  पे,
तो है इश्क गाँधी से कह दो ज़माने से ।
 ~ प्रदीप यादव

Monday, 27 May 2013




इतना हारा हूँ दोस्तों, कि मजबूरी में जीतना सीख गया। 

तकदीर वालों की सोहबतों में नसीब बनाना सीख लिया॥ ~ प्रदीप यादव ~

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यूँ ही कह गया था गम का फसाना,
थम के रुक गया ये बेदिल ज़माना।

रूह का सवाल था साफ़दिल होना,
वरना जिस्म तो था पुराना अपना। 
~ प्रदीप यादव ~

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चल झूठा !!!
वफादारी की वकालत ज़रूर कोई राज़ है ,
मुफ्त रुस्वाईयाँ सहना भी शऊर होता है ।
 
~ प्रदीप यादव ~

Friday, 24 May 2013

बातें बतियाने वाली



बातें बतियाने वाली 
राह की हरियाली पैगाम हैं ,
कुदरत रखोगे हरी,तभी
तोह दिल की बनावट भी,
दिखाई देती रहेगी,
करते रहे सिर्फ जो रश्क,
भूलोगे जो कुदरत के सहारे ,
मिट रहेंगे,
जीने के एहसास सारे। प्रदीप यादव ~


पुर्जा ....
पूछना मेरी रूह के हवाले से,
सबब 
मेरी चाहतों के,
वोह खोजते हैं पुर्जा दर पुर्जा,
हालात मेरे इशारों के,
कोई समझाए जाकर उसे,
इस रूह में 'नाम' उसका हैं,
सपना उसी का है, अंदाज़ भी,
अंजाम उसी का है,
सच कहूं तोह मेरे इरादों
पर हर सोच उसी का हैं ....। 
~ प्रदीप यादव ~
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बुलंदिया मेरे मुकाम की,
पा गया जो एक दिन,
मेरे अपनों ने टांग खेंच,
मुझे नीचे गिरा दिया,
मैंने भी कह दिया,
ऎ लोगों कुछ देर ही सही,
मुहॊब्ब्त में नाम अपना,
हमने भी तोह लिख दिया ...। 
प्रदीप यादव ~

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पता पूछते हैं उनका,
जो नजरे मंसूब भी नहीं ....
महबूब कह दिया उसे,
दिल में जिसके ठौर नहीं ... ~ प्रदीप यादव ~

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बदनीयती के इरादे ताड़ ,
मेरे इमां की बोली वो लगा गए .... ।
  ~ प्रदीप यादव ~

पानी हूँ बहता सा रूख मेरे बाँध दो,
बह निकला तो हाथ नहीं आऊँगा .
....~ प्रदीप यादव ~

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इज़ाज़त के मायने हों हरदम नही ,
इल्तिजा जो समझे दिल करीब होते हैं
प्रदीप यादव ~

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जुदाई में इंतज़ार हो, तो दर्द ए सितमगर होता हैं ,
महबूब ना हो पाबन्द,तो ही अस्ल दिलबर होता हैं । ~ प्रदीप यादव


Wednesday, 8 May 2013

पत्थर से टकराने वाले



Zara Yun Bhi Soch 
E "Pathron se takraane wale" ...


Hauslaa mandi hai teri E patharon se takkar lene wale,
naqsh hue Jo surat e nishan, Qasmein leinge zamane wale .
~ Pradeep Yadav ~ 


  ज़रा यूँ भी सोच ए "पत्थरों से टकराने वाले" ....


हौसला मंदी है तेरी ए पत्थरों से टक्कर लेने वाले,
नक्श हुए जो सूरत
ए निशां,कस्में लेंगे ज़माने वाले।।  ~ प्रदीप यादव ~

मेरा मानना है मित्रों हमखयाल मिलता नहीं है
नसीब मिलाते हैं ......~ प्रदीप यादव ~ 

Tuesday, 7 May 2013

कोफ़्त



कोफ़्त 

शहरे गुल में क्यों यूँ रात,
रोकर थी उन्होंने गुजारी,
तौबा हुई 
कोफ़्त बेहद दिल में,
दिन चढ़े खोई जो खुमारी । 


हसरतों को बहलाएँ,
या कि बेजुबान हो जाइये,
इंकारों से डरकर ही सही,
इकरार कुबूल आइये।
    ~ प्रदीप यादव ~


SHAHRE GUL MEIN KYON YUN RAT,
ROKAR THI UNHONE GUJARI ,
TAUBA HUI KOFT BEHAD DIL MEIN,
DIN CHADHE  KHOI JO KHUMAARI .


HASRATON  KO BAHLAAEIN,
YA KI  BEJUBAAN HO JAIYE ,
INKAARO SE DARKAR HI SAHI,
 IQRAAR QUBOOL AAIYE .
  ~ PRADEEP YADAV ~




Monday, 6 May 2013

हत्या

हत्या

हत्या हुई नारी स्वाभिमान की, 
खंड खंड अनबन है मन की  .....
व्यभिचारिता के संकलन की ....
कोख लजाते अभिशप्त जन की ....
कानूनी व्यवस्था के अशक्तपन की ...
निरंकुश नरपिशाचों की उत्श्रंखलपन की।। ~ प्रदीप यादव

updates

हरे ज़ख़्म को हरे पेड़ों की ठंडी,
नम उम्मीदें कम रास आती हैं,
बदलते चेहरों की हकीक़त
घावों के नासूर होने की गवाही हैं...।
 

प्रदीप यादव 
Hare Zakhm ko hare pedon ki thandi,


nam ummidein kam raas aati hain  ....

badalte cheron ki Haqiqat,

ghavon ke,
naasoor hone ki kahaani hai.

~ Pradeep Yadav ~



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आज का स्टेटस कुछ हज़म नहीं हो रहा है,

क्या मेरा दोस्त दुश्वारियों से खफा है ...

दिमाग तोह कह रहा सब ठीक है मगर,

कमबख्त दिल ये गवाही क्यूँ नहीं दे रहा हैं
~ प्रदीप यादव ~


Aaj ka Status kuchh hazam nahi ho rahaa hai,


kya meraa dost dushwariyon se khafaa hain .....


Demaag kehta hain theek hain kambakht 


Yeh dil gwaahi Q nahi de rahaa hain
~ Pradeep Yadav ~

Sunday, 5 May 2013

पके फल सी मुहब्बत


  पके फल सी मुहब्बत  


फलसफा ए मुहब्बत, कुछ ऐसे समझिए।
ये किस्मत का युटर्न है आफत ही कहिए। 

जांबाजी से किनारा कर काफिर हो  रहीए।
भेज दिमाग हड़ताल पे दिल को समझिए।


अजीब दर्द की मिठाई इसे तरसाती ज़रूर।
कहते हैं आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई।

राहतें  फैलाती है मुहब्बत जगा इंसानियत।
दिल्लगी होशवालों में भरती है नेकनियती।  


गिरेगी यूँ पके फल सी मुहब्बत आसमां से।
नसीब नहीं उसके ढुंढ़े जो गलियों चौबारे पे।  प्रदीप यादव  ~

इन दिनों यादों की फेहरिस्त पर, 
चर्चे रहे उन्ही के मुख्तसर,
दिल 
आवारा निकला इस क़दर,
घूमफिर जा बैठा तेरे ही दर।
प्रदीप यादव ~