Thursday, 27 December 2012

पीने के उसूल


           पीने के उसूल ......

   ' मयखाना कर गया खाली लाखों ज़िन्दगीयाँ,
मेरे दोस्त पीने के उसूल तो बना पर उसूलन ना पी |
   
by ....  ~ प्रदीप यादव ~


                                   
   Maykhana kar gayaa khaali laakhon Zindageeyaan,
 mere dost peene ka usool Toh banaa par Usoolan naa Pee .
                                               
                 By ..... ~ Pradeep  Yadav  ~ 

Wednesday, 26 December 2012

परित्राण


परित्राण .....

नए क़ानून की आवश्यकता पर ...


दा ठहरी हुक्मरानों की
वो थे  हुजुर ए  आला,
क्यूँ बनाए नया फिर से,
जब है इम्पोर्टेड वाला .....  प्रदीप यादव



ऊंची इमारतों के बीच गुम धुप .....


धूप का कतरा है कोई मेरे झोपड़े को रोशन कर रहा,
खुदारा सूरज भी महल़ों के शाने से मेहरबान हो रहा ।     by ..... प्रदीप यादव

कितने  दिनों  के  बाद ठण्ड ने  ये रौनक  है  पाई ,
देख रहा हूँ जहां से मैं सूरज को झुरझुरी सी आई ।  By ..... प्रदीप यादव


Tuesday, 25 December 2012


किसने क्या सीखा  ज़िन्दगी से .....

रब ने तो भेजे थे
गमो ख़ुशी के पास ,
मैं काँटों को चुनने लगा रहा,
उन्हों गुलों करीब आशियाना बना लिए।  .... प्रदीप यादव 



किसी की चाहतों को दिल में बसाकर मंजिलों पर बढ़ जो चले हो,
निगाहों पर निगहबानी रखना चोट खाए इस  कारवां में बहुत हैं। .....BY.... प्रदीप यादव  



 अब मिला हैं रोज़गार जो लबों पर सुर्खियाँ सजाने का,
 सुनते हैं ये 'पान' भी बेकरार हैं लज्ज़तों के खजाने सा । .... BY ....प्रदीप यादव


बोल दो टूक ...



लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।

By ...... प्रदीप यादव  12/12/1


Monday, 24 December 2012


सारी रात सुनी अदब ओ तहज़ीब की लियाकतें ...
कल मुशायरे की रात थी परदेसी था मेहमां मेरा।

हालात थे जंगी पर माहौल पुरसुकूं हुआ,
नदीम जब मुखातिब हुए देवबंद से आए,
वोह पियाले-पियाले पिलाते गए,
रहा आबे ज़मज़म का सा मुरीद उनका,
ये शहर-ए-'राहत' मेरा ....
दिल में उतरती गई लफ्ज़ दर लफ्ज़
सीख ऐ 'मुन्नव्वर' ....
लबों पे तारी था बस ... वाह क्या कहना .....

मुशायरा "शब् ए सुखन " 21दिस.2012  इंदौर के अभय प्रशाल में
रिपोर्ट  By... 
Pradeep Yadav

ये सोचते थे उस रात मुशायरे में दानिशमंद सफीर जनाब डॉ. राहत 'इन्दोरी'
हम अपने शहर में सौ-सौ जन्नतें बनाएंगे,
लेकिन दोस्तों इतने फरिश्ते कहाँ से लाएंगे ...... By राहत "इंदौरी"


इसी गली में वो भूखा किसान रहता है।
ये वो जमीं है जहाँ आसमान रहता है।।
मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े।
कि इस पे चिड़ियों का इक खानदान रहता है।।
सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा।
हमेशा चोट का ताजा निशान रहता है।।
तुम्हारे ख्वाबों से आँखों महकती रहती हैं।
तुम्हारी याद से दिल जाफरान रहता है।।
ग़ज़ल संग्रह 'सब उसके लिए' -पृष्ठ संख्या 88 से ( by ..मुन्नवर राना )


मौला  सुखन ऐ मुन्नवर  को  लम्बी उम्र  दे ,
इस औलिया में सुकून-ओ- ईमान रहता है।

~ प्रदीप यादव ~
***

सलाह माँ की बेटी को 
------------------------------------------------
ढूंढ़ निकालना
मुझे
अपने में
एक दिन

जो कोख में
तुम सी प्यारी
बेटी पाओ,


माँ बन
थपकी दे
सुकुमोल सी
बेटी को,

स्नेह से
पगी रची
लोरी गाकर
सुनाओ ।  


~ प्रदीप यादव ~

Sunday, 23 December 2012

एक चिड़िया का रूदन ...


एक चिड़िया का रूदन ...

 BY .... प्रदीप यादव

चिड़िया ने देखी उड़ान कहाँ,
भरम टूट गया आजादी का,
बेडी पहन जीने में जश्न कहाँ,
फिरती किन आस पर शाखों,
की गिनती कर झुके नरम से,
सहारे को आशियाँ बना फुदक,
रही थी परों की जोर पर,
अनजान,थी शिकारी पंजों की
रूह को अपमानित करती घेर,
बिछुड़ा साथी सपने भी हुए ढेर,
घायल तन मन पड़ी तड़पती,
लूट कर शिकारी गया था फ़ेंक,
लुटी चिड़िया का दुख देख कहिं,
चिड़ियों का झुण्ड एक गुस्साया,
अपनी छोटी कोशिश से निज़ाम,
को भी उसने पुरज़ोर दहलाया,
कोशिश चिड़िया की रंग लाएगी,
आजादी उड़ने की फिर पाऐगी,
मत रुकना तुम ऐ दोस्त चिड़ियों,
मेरी मौत क्या व्यर्थ हो जाएगी,
कालिख मत पोत शोक करो,
मेरी लाश का बस आभार मानो,
फेंकी गई में जिस तरह लाल,
रंग से सज कर तुम शान से,
सूर्य की सी अड़ ठान कर कर,
मेरे तेरे की बात नहीं करना,
इस लड़ाई की ज़रूरत सोचकर,
तब तक तो तुम अवश्य लड़ना,
विध्वंस करो हर अहंकारी का,
मन तो बदलो हाहाकारी का......

मन से देती तुम्हें शुभकामना,
झिंझोड़ कर रखना शिकारी को,
तुम मेरी सी ही फिर स्वतंत्र सदा,
उडती रहना ... उड़ती रहना ... उडती रहना ।
      .. BY ....~ प्रदीप यादव   ~ 24 दिसंबर 2012

लोग समझते रहे कि चिराग हुए हैं रोशन महफ़िल करने,
तू ही समझा या मैं जाना दास्ताँ दिल ये अंगार करने की।  ....By प्रदीप यादव

Wednesday, 19 December 2012

दोस्तों, मेरा दिल्ली के वाकये पर कुछ ना
कह पाना .... इसलिए था ...

मैं अलहदा हूँ .....

गिर चूका हूँ कुछ ज्यादा मजबूर होकर,
आदमी था में गमज़दा आदमियत खोकर ,
कब तक बस में बेबस को चोट पर चोट दूं,
खरीद कर मुझे कोई टांग तो दे सलीब पर,
राक्षस बन कह सकूंगा मैं उस जात का नहीं.......। by ...~ प्रदीप यादव ~

Tuesday, 18 December 2012

बोल दो टूक ...


बोल दो टूक ...



लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।

By ...... प्रदीप यादव  12/12/12

भावनाएं जो कह गया ....

   भावनाएं जो कह गया ....

समृधि की ओर बढने वाले ....
कहते रहते कहने वाले कब रुके हैं चलने वाले,
मेरे घर का रास्ता और मंजिल दोनों तय हैं ,
मिलते रहते मिलने वाले खोए कब हैं रखवाले,
मौसम नरम गरम पर दिनकर का चक्र तय है ...
उम्मीदों के सहारे ना घिसटते रहना जीने वाले,
बड़े ठग होते हैं किबला रंगीन सपने दीखाने वाले।
मंजे हुए होते दिलबर के दिल को धड्काने वाले ,
टूटे अरमानों को अपनी मजबूरी बतलाने वाले।
बढ़े चल काँटों भरे सफर का राहगीर बनकर
इस डगर में मिले थे मुझसे कई दाँव लगाने वाले। .......स्वरचित प्रदीप यादव 03 अक्टूबर 2012

नाज़ ऐ हुस्न
पूजे सभी ने हुस्न के रास रंग,
कोई फ़िदा होकर रिहा हुआ,
कोई गिरफ्त के हवाले हुआ,
परचम फैलाते रहे राजा रंक,
सजा कर बैठे थे वो मस्कारा,
आईने कैसे जाने सलामी का ढंग                             .....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012

दर्दे करीबी ....
खरे सोने सा था,
वो दिल का मरीज़ ,
मर्जे दिल से था परेशां,
या दिल की मर्जी से ,
एक हलकान से दिन।
आ पहुंचा बस,
कहने रात की बात,
थोड़ी देर ही लड़ा था।
हरारत क्या हुई ,
घरवालों ने आसमान
सर कर दिया ।                                               .....स्वरचित प्रदीप यादव  7 सितम्बर 2012

राष्ट्र आराधन ....

राष्ट्र आराधन ....

र्म हानि नहीं जानूँ  मैं अभिमानी,
भस्मभूत करता अनीति की मनमानी,
राष्ट्र हानि फड़काती हैं रुधिर वाहिनी।
देश धर्म का पालन कर मैं,
कहलाऊं सिर्फ एक हिन्दुस्तानी।
उद्धार करो भारतवासी,
श्रम के इस मंदिर का,
गर्व मीनारों से अजां लगाओ,
सुमिरन कर गुरुओं की बानी,
राष्ट्र आराधन की लौ जला,
करो याद उनको भी जरा,
जो शान तिरंगे की रख लड़ मरा।

अमोघ श्रँखला विस्तृत ज्ञान की,
कला,विज्ञान की,अभिमान की,
राष्ट्र कुल ही मेरा कुल अब,
माता भारत भारती।
करो रे उपक्रम समृध देश का,
गाओ फिर यशवर्धन की आरती ।
चलो आओ,मिलकर नाचो, गा लो,
ढोल ताशोंऔर नगाड़ों की थाप से,
अकर्मण्यता के असुर भगा दो।  ......  ~ प्रदीप यादव ~



Monday, 17 December 2012

भारत पुत्र रासो


भारत पुत्र रासो

दैदीप्यमान हैं,
परम्परा विश्व के वितान पर,

लक्ष्य सिद्धि फल अनुष्ठान
हो रहे यज्ञ वेदी पर ,

सर्वलौकिक हो दृष्टि
मानवीयता के सर्वनाम पर,

निमित्त तुम बन जाओ
उपादानों का संज्ञान कर,

बलवीर हो प्रणों
शारीरिक सौष्ठव को संपन्न कर,

विवेक का प्रमाण दर्शाओ
काल का कीर्तिमान कर,

कृपण, निष्ठुर, अमानुषक पंथ को,
 निराधार निर्बल कर,

जीवेत हे भारतेय,
युग युगों पर्यंत पथ प्रशस्त कर । 


         By .... प्रदीप यादव  ( स्व-रचित )

Friday, 30 November 2012

दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S ( गीत )

दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S ( गीत )

आंखन बस गयो रे एसो छबीलो,रे पीया S S
प्रेम मूरत  सों है एस्सों गर्विलो, रे पीया S S
गलियंन बूझ्यो रे मोरो सांवरो, रे पीया S S
दिल लाग्यो रे ... मन हारयो रे पीया S S ....।

मन  बसिया की छवि मोरी इन आँखन  बसी,
निहारत रहूँ ठगी-ठगी  रूप  चंचल  सी खड़ी,
साज सिंगार भाए न मोहे नजरिया ऐसी जड़ी,
आहट पर लजाऊं री, मीतमिलन की  है घड़ी,
रोको ना, सखी री गली मैं पीया की चल पड़ी,

थिरकत  कदम नहीं  हैं बस में,
कित जाऊं, मधुर मुरली सुनने,
बुनने लागे ये नैन अधूरे  सपने,
श्याम संग डोलूं रास नए रचने,

कि छम छम नाचो रे रंग रंगीलो रे पीया S S
अब नाही थाक्यो रे डमक डम ढफली बजालो रे पीया S S
दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S
..... ( गीत .....By ... प्रदीप यादव )  1 DEC 2012 ....

मनुहार का मुक्तक


मनुहार का मुक्तक

हवाले से, पहले स्पर्श को महसूस करने का,
मजा हरकतों पर शरारती नजर रखने का,
भीगती रातों को इत्मिनान से संजोने का,
इंतज़ार को हर धड़कन पर भटकाने का,
मिलकर हाल पूछने से पहले नज़रें चुराने का,
वक़्त होता है, मंज़र होता है, शऊर होता है |      

~प्रदीप यादव~

Sunday, 25 November 2012

न्यौछावर ( अर्पण )

 न्यौछावर ( अर्पण ) 

अखबारों की खबरों का आता रहेगा रेला,
चौंसठवें गणतंत्र का सिहांसन ऐसे डोला,
कोई बागड़ ही खाए जा रहा, ताल्लुकात
भेड़ीयों से बताकर 'सिंह' को है, डरा रहा,
जात पांत ने फिर क्यों भर दिया है हाला,
मूर्छा हालत में तेरी थी ये भग्न रंगशाला,
कोई हिन्दी तमिल  का मसला  बता रहा,
ईशनिंदा कर डरने वाले तोड़ रहे शिवाला,
मुहाफ़िज़ ही खाते रहा छीन कर निवाला,
प्रवचन देने वाले अरबपति का भरा थैला,
बातों का हश्र देखा है नींद की लंबी बेला,
अमृत छके को इस देश में कैसा झमेला,
हर बैसाखी अन्न दिया सीमा डाले पहरा,
विश्वास कई डोल चुके आँगन बता मैला,
खेला अनुसंधान कर हथियारों का खेला,
राजा बन रहे, बुराइयों के कोढ़ को फैला,
कद्दावर क्यों भाग रहे बनकर यहाँ लैला,
आवाज़ के साथ चलो बढ़ाओ हाथ मिला,
वक़्त को दिखाओ ज़रा जोशे जूनून की सरगोशियाँ
बढ़े चलो की लुटेरे नकाब ओढ़ कर रहे गुस्ताखियाँ,
इश्क में मादरे- वतन तेरे मिसाल कायम कर चला,
जोश तेरी शहादत का देख आज संदेश परवान चढ़ा |

~.प्रदीप यादव ~

बर्फ का बीज



बर्फ का बीज

BY .........प्रदीप यादव
र्फ का बीज हूँ ,घिर गया गर्म हवाओं की आगोश में ,
जिस पर रेल रहा हूँ वो एक बर्फ की शिला प्रस्तर,
पहाड़ के अंतस पर निर्झर रिस रहा था सोता बनकर ,
लड़ लड़ कर पसरा हूँ निःशब्द अँधेरी गुफाओं के द्वार,
उस सांस से आ रही थी रोशनी की खबर भी छनकर,
दिल मंजूर करता ना था फिर भी ले ही ली टक्कर,
हौसले मंद, रूह को भी आजमा लूं धड़कनें गिनकर,  
तांडव कर भैरवी गाऊँ, खरज लगाऊँ नया राग छेड़कर,
बन गया दरिया बिगडैल दरख़्तों को संग बहाकर,
सख्त चट्टानी केनवास को आसान कूचियों सा रंगकर,
मिली जो नदी एक मोड़ पर घुल गया था उसी में समाकर,
मंद मंद बहूँ , कभी शांत झील सा पाकर विस्तार,
गगन के लाखों अक्स मेरी सतह पर मिटते चमककर,
किनारों सटे हरे भरे जीवन रंग सजे जल-थल और नभचर,
गूंजते घडियाल, खुशियाँ सजती पर्वों का जशन लेकर,
देख ली मौत की चीत्कार भी मुक्त हो इहलोक भोगकर,
समझा हूँ देर सवेर इशारे जीने के इस जिंदगी से मिलकर,
गंदला मैलापन बहाया चट्टानी हसरतों को कर जर्जर,
शिकवा नहीं कोई, जीभर के जिया हूँ अब सो रहूँगा,
किसी खारे समंदर की आगोश मे दफ़न होकर .......।
है इंतज़ार किसी रोज सूरज को आया जो रहम मुझपर,
पुनः भाप बन कर जा मिलूँगा बादलों से कर हवाई सफ़र,
छूट रज किनारों की कैद से मिलूंगा बनकर 'बर्फ का बीज'।
       
        By  ~प्रदीप यादव ~






अनुपमा

अनुपमा 

बस यूं समझो भावनाओं को
कह  लेने को लिख लेते हैं।
अवशेष रजकणों की रेख को ,
मूर्त रूप कर लेते हैं।
तुम बांधना शब्दों में,
जीवन के विस्तारों को।
हम भी अपना एक कोना,
भींच कर सहेज लेते हैं।
उदास आसमानों पर,
बादलों की कल्पना,
भीगी हवा के सोंधेपन से,
गमकती अल्पना,
भावना की स्याही से,
रचे हर्फ़ॊ को तुम जब भी पढ़ना।
स्मृतियों के पटल पर,
उजास छवि बन दमकना,
तुम हे अनुपमा ... ।


हमको, तुमको अपनेपन
से जोडती है लेखनी,
दो विलग वैचारिकता
का मेल बैठाती सी कुंडली।
तीर आलोचना का भेदता,
अंतस में व्याप्त श्रेष्ठता,
समायोजन का सूचक
तौलता,
व्यवस्था की उत्कृष्ठता,
रंगीन कल्पना का,
श्वेत-श्याम, अभिसार,
निस्तब्ध मौन को ,
झिंझोड़ता सा प्रहार।

जीवन की विदीर्णता का,
संभाव्य तलाशते हम,  
समरसता से दो चार हो,
ढांक कर छुपाई गई ,
कण कण परिलक्षित,
खुशियों को पाने का
'हाहाकार' भुलाने को लिख लेते हैं।


~ प्रदीप यादव ~

Friday, 23 November 2012

जिक्र छिड ही जाता था तेरे आने का ...

भीगती रातों की तन्हाई
यूँ ही काट लेता हूँ ।
आवाज देकर सहर को
फिर करीब बुलाता हूँ ।
तौबा करके रिवाजों से फिर
उल्फत में पड़ जाता हूँ।
नसीब मेरे कोई नवाबी
ठाठ गढ़ने के रहे होंगे ,
तभी तो तकदीर से ज्यादा
दर्द,सहने की इमदाद पाता हूँ ।
वक्त मुझ पर रहम कर
देर तक परेशान नही करता,
बेचारा किस्मत के हवाले कर मुझे,
बस आगे बढ़ जाता है।
मैं ही गाहे बगाहे उनकी नज़रों
से तकरीरें किया करता हूँ,
मुझे शक है हाज़िर जवाब नजरों
को बहाने अब भी याद कई होंगे।
फूल कल ये भी तो  पुराने  होंगे,
खुशबू-ओ-रंगत से बेगाने होंगे। 
दोस्ती में हासिल अहसास भी
जाने पहचाने होंगे,
मेरे जेहन के बागीचे में खयालों
के नजराने होंगे।         ............ प्रदीप यादव (स्व-रचित) 27/10/2012







Tuesday, 20 November 2012

फांसी आतंक को

फांसी आतंक को

फांसी तो दी गई ,
परंतु फांस रह गयी बाक़ी,
बैखौफ दुश्मन है पड़ोसी,
घ्रणित इरादों का है दोषी,
रहेगी याद क्या अंडा सेल बिरयानी,
शायद युद्ध आखिरी रहा है बाकी,
भारी पड रही शपथ ये मिलावटी,
न्याय में देरी और सुस्त राजनीति ,
संरक्षित होती रही लोकप्रिय अनीति,
आओ हटाएं नेताओं की सस्ती प्रीति ,
अब और शहीदों की चिताओं को
नहीं मिलेगी असमय आग,
ख़त्म करो आतंक को
कर सुपुर्द ए ख़ाक,
विनाश का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले,
तेरे घर पर भी रहते होंगे,
नजरों के तारे, मीठे त्यौहार,
संगीत गूंजता संसार,
फिर काहे की खलिश हैं, बाक़ी,
फांसी तो दी गई,
परन्तु फांस रह गयी बाक़ी .......... प्रदीप स्व-रचित 23 NOV 2012


Badi minnton se sikhi thi adaa salaamati ne,
bahut lahu piya hai in BEJAAN hatiyaaron ne ..... by Pradeep Yadav







Tuesday, 13 November 2012

शुभ - लाभ की समृधि

  शुभ - लाभ  की समृधि
"शुभ" कार्य  करें, तो  जीवन में  शुभ फल  प्राप्त होते हैं।
शुभ-कार्य  का  अशुभ  फल हो  यह संभव नहीं, जीवन में
महत्व इस बात पर हो कि विचारों में शुभता हो। वैचारिक
शुभता से ही संस्कारों का उन्नयन होगा, फिर कर्मफल भी
जीवन  में शुभता का  संचरण  करते  हैं। शुभता न  केवल  
भौतिक होती है, वरन  आध्यात्म,  मन  और तन  की  भी 
होनी  आवश्यक  हैं। जीवन  में शुभ  करने  की यथासंभव
कोशिश करनी चाहिए।
जीवन  आनंददायी  एवं  शांतिपूर्ण  है  तो  यह  जीवन  का 
"लाभ"  है। धन की महत्ता से इनकार नहीं है। लेकिन धनी
व्यक्ति परिपूर्ण रूप से  स्वस्थ न हो तब धन से बेहतर हो,
हम  स्वस्थ  रहें, यह  हमारे जीवन  के  बड़े  लाभ   में से
एक है। लाभ  की प्रार्थना  में  संसाधनों का प्रवाह सदा बना
रहे और इच्छित फल जैसे  कला या ज्ञान से धन और यश
प्राप्त हो रहा है  वह  अक्षुण्य रहे। "लाभ"  लिखने से तात्पर्य
है कि परिवार  में धन की निर्बाध प्राप्ति होती रहे।

Sunday, 4 November 2012

मेले का बांसुरीवाला


मेले का बांसुरीवाला

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                      by -  ~ प्रदीप यादव ~

.......कितना प्यारा वादा है इन मतवाली आँखों का  ....   फिल्मी

धुन बड़ी ही सुंदर ढंग से बांसुरी पर बज रही थी सड़क पर ...
एक बांसुरी वाला मधुर धुन  बजाता हुआ बांसुरियां  बेच रहा था।
प्यास  लगी, तो बजाना रोक वह नजदीकी  मकान के भाईसाहब
से इशारों में पानी देने की  गुजारिश करने लगा। साहब ने तल्खी
मना किया और अपने  मोबाईल पर बात करने में व्यस्त हो गए,
तभी भीतर से  नाजुक हाथों ने बांसुरी  वाले को पानी का गिलास
पकड़ा दिया। बांसुरी वाले ने पानी  पीकर अंग्रेजी में 'थेंक्यु', कहा
आगे बढ़ गया, भीतर से एक जोड़ी आँख उसे ओझल होते देखती
रहीं, पर शायद उन भाईसाहब  को नागवार  गुजरा उन्होंने बच्चे
को हिकारत भरी नज़र से देखा और फोन पर  बतियाने लगे, इस
वाकये से बच्चा भी सहम कर घर के अन्दर हो लिया।
कुछ दिन बाद बांसुरी वाला फिर लौटा पर  शायद  इस बार भाई-
साहब नही थे । बच्चा  दौड़कर  भीतर से  पानी  का  गिलास भर
लाया। बांसुरी वाले भईया .... आवाज दे उसने उसे पानी पीने का
आग्रह किया। बांसुरीवाले ने  इधर-उधर देखा फिर पानी पीते हुए
एक बांसुरी उसकी और बढा दी, बच्चे ने  हिचकते हुए लेने से  ना
कहा ....पर तब तक बाँसुरीवाला आगे बढ चुका था। बच्चा बांसुरी
ले मुस्कुराता हुआ घर के भीतर चला जाता है।
दुसरे दिन बांसुरी वाला  बड़ी ही मधुर  तान बजाता हुआ बच्चे के
घर के पास से गुजरा  पर वहां  उसकी पहले दिन वाली बांसुरी के
के टुकड़े घर के गेट  के बाहर पड़े देख  आसपास नज़र दौड़ाई  तो
उपरी मंजिल पर खड़े बच्चे का  रूंआसा चेहरा देख जैसे उसे कुछ
बोध हुआ। परन्तु उस दिन के बाद से बांसुरी वाला रोज़ आता पर
बिना  बांसुरी बजाऐ ही सामने  से गुजर जाता था। भाईसाहब भी
इस दौरान उसे कई बार घूर कर देखा करते।
कुछ और दिनों बाद बच्चे का परिवार कार्तिक मेले में घूमने आया।
एक बडे झूले के  किनारे बच्चे  खुश दिखाई  दे रहे थे। तभी भाई-
साहब बच्चों को झूले का टिकिट दिलाने लाइन में लग गए। बच्चे
के साथ आई  महिला ने उसे  बांसुरी  वाले से  बाँसुरी दिला दी बस
अब नया दृश्य बडा मनोहारी था। बांसुरी वाला जो भी धुन बजाता
बच्चे को हुबहू उसकी  जुगलबंदी करते देख परिवार  के लोग और
मेला घूम  रहे अन्य लोगों की आँखों  में प्रशंसा का भाव साफ पढ़ा
जा सकता था।
महिला बांसुरी  वाले से बोली, " ये अच्छी बांसुरी बजा लेता है, ना
बांसुरी वाले भइया .... ?
बांसुरी वाले प्रति-उत्तर दिया  ..जी, मेडम जी, बहुत प्यारी बजाता
है,  पर भाईसाहब  के डर से घर के आगे वाले चौराहे पर मंदिर में,
मैंने ही उसे बजाना सिखाई थी ।
इसके पापा ही इसे शौक से दिला दिया करते थे .....। यह कहते ही
उस की आँखे डबडबा गइ।
दीदी, तुम अब उस आदमी के लिए आंसू बहाने बंद करो ..... और
ये लो, झूले के टिकिट .....भाईसाहब की आवाज गूंजी ! .. महिला
की चेतना जैसे यथार्थ में लौटी, फिर संयत होते हुए उसने टिकिट
लिए और  प्रशंसा भरी नजरों से बच्चे को देखा, फिर सर पर हाथ
फेर कर अपने पास भींच लिया।
 .....कहने को  साथ अपने दुनिया चलती है, बस तेरी याद बाकी है,
परोक्ष में फिल्मी गीत बांसुरी वाला बजा रहा था ,  बच्चा  ख़ुशी से
चहकते  झूले का आनंद ले रहा था।  ...बांसुरी  वाले  की  प्यास ने
बच्चे की दुनिया को नया अध्याय जो दे दिया था ।
  --------------------------------------------------
  ~  प्रदीप यादव ~ (स्व-रचित, 06 नवंबर 2012 )




 इंसानी हौसले ...
--By ....प्रदीप यादव-------
जानते हो इन उबड़खाबड़
भूखंडों की संरचना के पीछे से
झांकते समय वोह आदमी जो
रंगीन चश्मों का दायरा छोड़ 
कर मेरे ओज को बेतकल्लुफी
से सारा दिन तकते मुस्कुराता
हुआ अपना काम निपटाता है।
उसे देख मेरा मन भर आता है,
आजकल थोड़ी तपन समेट ली है
जरा देर, सही इस इंसानी हौसले
से मुतासिर तो हो  लिए । .....प्रदीप यादव (स्व- रचित )

Thursday, 1 November 2012

Ardhagini ko Uphar ...


Ardhagini ko Uphar ...

Na reshmi dor bandhee ho,na moti sitaron sazi ho,
mere tohfe main agaadh prem ki shapath gunthi ho.
Koi do rai nahi ,hoga wahi ,jo chaho tumhi ,
Sathi  ho wohi, Sarthee bhi tumhi,

Kuch der se hi sahi,akal aa hi gyee,
mere ego ko bas tuhi bha gyee,
rukh mila zindgee ban gayee,
raza ho jis me teri wo khushi mil gayee,

Kya doge tum sangnee ban gayee,
naseeb se tumse mili,
pallavit tum sang bel ban chadhi,
pushpit ho mansi ban gayee,
sangharshon ke sathee tumse meri hasti ban gyee.....

Chutki bhar sindur ne aangan baabul ka door kiya,
ek gathbandhan se tumhar jeevan Suhas kiya,
dukha nirasha bhay clantta ke bhav ko nirmul kiya,
anupam anmol sath ne soubhagya bhar jivan sarthak kiya

  ~
प्रदीप यादव  ~
....जीवन यात्रा पर निकले सहयात्री ही जीवनसाथी होते हैं । पति-पत्नी सामाजिक संरचना का सम्मान रखने के लिए समझौते की ज़िन्दगी जीते हैं। आपस का प्यार और दोस्ती जरुरी है, भावना अक्सर साथ लेकर चलने की होनी चाहिए।

~ प्रदीप यादव  ~

Tuesday, 30 October 2012

आदरणीय महोदय  जी ,
भाषाई  विद्वता का प्रश्न यह जताने का प्रयास  करता है, की किस तरह अत्याचार के कोड़े
सहकर भी आप एक विदेशी भाषा को सीखने के लिए अनावश्यक रूप से मानसिक ग्लानि
सहन करते हैं ।
विवशता के अधीन आक्रांताओ के प्रशासन और समाज के बीच कडी बनाए जाने के कारण
स्वभावतः भारतीय ही नहीं वरन कोलोनियल  सामयिक  प्रताडित वर्तमान स्वतंत्र  राष्ट्रों के
अंग्रेजीदां  कमोबेश  इसी  तरह  की भाषा ज्ञान रखते है। आप ही  बताएँ  श्रीमान भाषा पर
गहरी पकड  के मामले में   देश पर  750 साल मुगलों  ने  शासन  किया, उस हिसाब  से तो
यह सिद्ध होगा  कि  अब तक श्रीमान के  तो 10 - 12  रिसाले  और  रुबाइयों   की  तो अन-
गिनत उन्वान शाया हो चुके होते । जाहिर  है जितने  भी इंग्लिश  स्पीकिंग  के  मरहले  हैं
उनसे कही जियादे हिन्दी की बहन उर्दू और अन्य भाषाओँ के सिखाने  वाले संस्थान देश में
भरे पड़े हैं । भाषाई  विशेषज्ञता का यह विन्यास  भारत  की  पारिस्थितिक अभूतपूर्वता  के
मद्देनज़र  इस कारण  प्रतिष्ठीत है कि यंहा भाषा की सिर्फ आभिजात्य  परंपरा रही  है  जैसे
यदि आपका आंग्ल भाषा ज्ञान समृद्ध है तो आपको देशज और क्षेत्रीय भाषियों पर एक तरह
का पूर्वाधिकार प्राप्त हो जाता है। महोदय मैं आपका ध्यान इस अतार्किक विषय से हटाकर
भाषा  विकास  की उन  संभावनाओं पर ले  जाना चाहूँगा,  जब नया नया जन्मा बालक जो
भाषा संस्कृति के सांचे में ढलना सीख रहा होता हैं तब वह भाषा विकास के आरभिक ध्वनी,
वर्ण तथा अक्षर ज्ञान  ( सिन्टेक्स, सिलेबल्स तत्पशचात फोंट आदि ) सिखने में 3 से 4 वर्ष
लगाता है । जब ज्ञान  की  प्रक्रिया निर्बाध  रूप  से चलती  रहती हें ,  तभी  उसके  पड़ोस,
शिक्षक, शिक्षा का स्तर और वातावरण  उसकी भाषाइ  विकास की दशा और दिशा निर्धा -
रण करते हैं। इसी क्रमिक विकास में  उसे  हिन्दी  के  साथ  इंग्लिश  के  अतिरिक्त संस्कृत
तथा क्षेत्रीय भाषा भी सिखना होती है ।  शायद  यही कारण था  कि उन दिनों पढ़ा - लिखा
इंग्लिश व्यक्ति वाक्य रचना सीखते समय "क्या मांगटा है ", "मेरे को हाट डोना है "," तुम
किटना डेर मैं आटि है।," जैसे सामान्य बोलचाल के शब्द भी नहीं बोलना सीख सके । जबकि
उसी अफसर का देशी अनपढ़ सिपाही " एस सर " " कमिंग सर ", " बेलकम सर", " केन आई
टेक योर कोट ऑफ सर ।" जैसे विदेशी वाक्य प्रयोग कर रहे थे।
रही समाधान की बात तो यह भी निश्चित हो गया की प्रयास इंग्लिश भाषा ही सीखने की ओर
है, भाषा मूलतः ज्ञान की अभि-रुचि  का द्रश्य और श्रव्य आकल्पन मात्र  होती हैं  परन्तु जब
सूचनाएं संप्रेषित करनी  हों  तो अभिनय (एक्ट ) भी किया जाता है। उदाहरणार्थ, चार अँगु-
लियों को अंगूठे  से  रगड़  कर शब्द  "मुलायम " की या "महीनता " की  सुचना  देना  भाषाइ
संरचना का अभिनव प्रयोग ही तो है । "हम पिट कर आए।"  (अर्थ हम सभी की पिटाई से है )
किन्तु " हम पीट कर आए" से तात्पर्य हमारे द्वारा पिटाई किए जाने से है।यह उदाहरण हमारी
भाषी संरचना के भाव संचरण और उससे उत्पन्न प्रतिसंचारी भावनाओं की निष्पत्ति को दर्शाता
है। जब भाषज्ञ  अपनी पूर्ण संज्ञानता, उन्नत  व्याकरण , तत्सम और तद्भव  शब्दों, सामासिक
अलंकरणों, वाद  और  विवाद  के  तरीकों, प्रहसन, व्यंगात्मकता, कटाक्ष  तथा आलोच्यता ,
गेयता आदी का वर्णन करने मैं सिद्ध हस्त  होता  है  तभी  भाषाकारिता के  संपूर्ण  परिणाम
प्रेषित करने मैं सक्षम इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स डिजाईन होता है, जो की वस्तुतः प्रभावी होगा ।

भवदीय
प्रदीप यादव

Monday, 29 October 2012

बुढा गया हूँ .....(new year )

आने वाले साल का स्वागत और आप सभी की सम्रद्धि की कामना करते हुए ....
साल का अवसान पर नए और तरंगित साल की ही कल्पना है आप ने जाने वाले साल में
जो भी उपलब्धियां प्राप्त कीं उस हेतु बधाई, अब नए साल की बेला पर पुराने बुढाए साल
की ऊर्जा और स्वयं की असमर्थता प्रकट करती रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत है ......


बुढा गया हूँ .....

हांफ कर थक गया हूँ,
मैं थोडा सा गलने लगा हूँ,
वोह जो धुआं सा छाने लगा है,
आइना धुंधलाने लगा है ,
क्या देखूँगा चेहरा वक्त
'बेवक्त'सताने लगा है।
कितने बेतकल्लुफ होते हैं,
आईने भी जो शफ्फाक
दिखा रहे है काज़ल को भी,
मेरी तो इनसे कोई दुश्मनी,
भी ना थी जाने क्यों चेहरे
पर लकीरें अनगिनत उकेर दीं,
सोचा था अभी तोह जी भर,
की है जो मेहनत
मज़ा उसका तो लूं।
मेरे शाने को ताकीद कर दी,
बस नियत भार ढ़ोने की,
नियामक कई लाद
दिए मेरी खुराक पर,
गुजिश्ता चंद लम्हात मे,
उम्र दीख गयी कमर पर,
मैं आइनों को कोसने लगा हूँ ,
शायद असमय बुढ़ाने लगा हूँ।
वर्ना मेरी ही सीख से आईने
साफगोई का इल्म पा रहे थे,
वो तोह सच ही बयाँ करते,हम ही
सामना करने से कतरा रहे थे । ....    प्रदीप यादव (स्व-रचित ) 30 OCT 2012

Saturday, 27 October 2012

bhookh ka Abhaydaan......
Bahane main aaj bhi achhe
banaa liya kartaa haoon,
Jali ko aag aur
bujhee ko Raakh
keh liyaa kartaa hoon .
jalna jalana RaONE hi jaane,

humen to pet ki aag ko hi 
bujhane ke jatan karne the 
kuch log bharpet khilane ki
bat kar mukarte rahe,
hum to langron ki aas mein 
hi yeh JiONE ko dhote rahe ......by Pradeep Yadav

मित्रों पसंद आई हो या दिल को छू  रही हो तो विचार प्रकट जरूर करें । 
रचना की प्रेरणा लाखों खर्च कर जलाए रावणों के चमक दमक और गरीब जनता की खाई का अवसाद है । ...   प्रदीप

बहाने मैं आज भी अच्छे
बना लिया करता हूँ।
लगी को आग और
बुझी को राख
कह लिया करता हूँ।
जलना, जलाना रावण ही जाने,
हमें तो पेट की आग को ही
बुझाने के जतन करने थे ।
 
कुछ लोग भरपेट खिलाने
की 
बात कर बस मुकरते रहे,
हम तो लंगरों की आस में ही,
इस जीवन को सिर्फ ढ़ोते रहे। ..........By ....प्रदीप यादव




  

Monday, 15 October 2012

विश्वास की मंगल कामना ....


  विश्वास की मंगल कामना ....

मंद पड़ रहे चमकीले नयन कैसे दिखलाऊँ ,
दरियाफ्त के इरादे किस तरह समझाऊँ ,
सचमुच ही हालात के द्वार पर
झंझावात से लड़ा हूँ ?
सुबकियां नहीं थी ना ही रुदन,
फैसलों की ठोकरों को सह रहा हूँ ?
ना पर्वों का उल्लास था,
भटक जाने का अहसास था।
सूखा बादल था ठंडे मेह को तरसा हूँ।
खोलकर डब्बे को यादों को भरता हूँ।
महती आवश्यकता, निर्मूल समझता हूँ।
मंगल कामना करता हूँ ?
मैं जतन पहाड़ तोड़ने के करता हूँ ?
गिर गिर कर उठता रहा हूँ,
तब कंही जाकर पैरों पर खड़ा हूँ ?
अब नहीं छोडूंगा ज़िन्दगी का दामन,
प्रीत का वादा निभाने चला हूँ ?
रंग रीती को रंगरेज़ का पता,
बताने चल पडा हूँ।
जिद को डुबाने चल पडा हूँ।
राहों में फूलों की मुंडेर सजाने लग पडा हूँ ।
अधूरे मनमंदिर की मूरत को फिर गढ़ने लगा हूँ ?
फिर से एक बार निखर कर संवरने लगा हूँ।
 ...........प्रदीप यादव  2 OCT 2012

चलो 'मन' को मना लेते हैं ...

बिखरे मनके 'मन' के सहेज लो,
सजा भूलों की कम करो ना करो,
बूँद बूँद अश्रु पर खारे हुए शब्द को,
फिर निःशब्द पिरो लेते हैं,.....
गुंथकर माला शुरुआत नई करते हैं। 
चलो 'मन' को मना लेते हैं ...

.....प्रदीप यादव स्व-रचित 13 OCT 2013

Sunday, 14 October 2012

 SSHHEE  ...  ( शी ... )

भेड़ीऐ यंहाँ घूम रहे है सभ्यता की खाल में ,
मददगार बनकर करने आबरू की तिज़रातें।
विद्रूपताएं अनंत है अश्लील भी
अन्यमयस्क सी है मान्यताएँ,
अनीति की उपासिका सुनितियाँ,
फिर विख्यात या प्रसिद्ध कलाकार,
प्रकटे नेता भी अपनी सीमा लांघकर,
मैंने भुगती हैं यहाँ वर्जनाओं की लागत,
कभी माँ की ही कोख में मारी गई तो
कभी आग में दाहने की बाध्यताएं ।
उहापोह में बंदिशों की कर अवमाननाएं,
अब ना और खुद पर ही शरमाएं,
अपनी संतति से ही आँख मिलाएं,
चलो मिलकर सब बेटियाँ बचाएँ ।   ....... प्रदीप यादव ( स्व-रचित 13 OCT 21012 )


रचना लिखने की प्रेरणा आदरणीया मंजू शरण की रचना जो खाप पंचायतों तथा उन जैसे ही संगठनों
के संस्कृति रक्षण के  नाम हमारे  समाज की लगभग  आधी जनसंख्या के बारे में,  आजकल लगभग
अप्रचलित हो चुकी मान्यताओं का समर्थन करते आ रहे नीति नियंताओं पर कुठाराघात करती है से
मिली। "वर्जना की वनिता" यह नाम दिया है मंजू शरण जी के कवित्त को .... संम्भावना है आदरणीया
को रुचिकर प्रतीत होगा ।

Monday, 8 October 2012

सरकारी कार .....

सरकारी कार .....

सरकार सी कार है,
या कार सी सरकार है।
स्टेरिंग पर बैठा है जो वोह चलाता ही नहीं,
रिमोट कंट्रोल जाने किसके पास हैं ?
कार के टायर नहीं धुरी की बस पुछो नहीं,
कार नहीं डांवाडोल वाहन का प्रकारहै,
कहते हैं जनता का शासन है,शक का कारण नहीं,
पारदर्शिता इतनी की घोटाला भी कोई बचता नहीं,
स्वार्थों का आविष्कार कद नेताओं क्यों घटता नहीं,
खूब अन्धकार है ,बीच धार में कोई रस्ता नहीं,
तन छुपा लो तो भी पेट कभी ढंकता नहीं,
है गंभीर खराबी पर मेकेनिक कोई सुधारता नहीं।
सिर्फ कलर का सोचा  इन्जन मैं लोचा है,
चल रही कैसे कभी किसी ने ये सोचा नही।
महंगा ज़माना पार्टस हैं पुराना,
फिर भी इमानदार यँहा टिकता नहीं।
आज फिर स्टेरिंग पर नए ड्राइवर की दरकार है,
धोखा मत खाना लोगों लालची यह सरकार है,
स्वार्थसिद्दी में लगे इन प्रपंचियों को
उखाड़ फेंकना अब तुम्हारा अधिकार है।
शांति, भाईचारे और समर्थन से संभावना साकार हैं।
जनता के लिए चुन लो मित्रों जनता की ही सरकार है .....
धुरी वाले पहियों से ही संवरता संसार है ,
आशा अभी जीवित है कि अपनी सी कार है।
  ....... प्रदीप यादव स्व-रचित  9 OCT 2012




संध्या सुन्दरी 

Monday, 1 October 2012

राजीनामा

राजीनामा

शर्तें आधी अधूरी,
न तेरे मन की
ना ही मेरी ही पूरी,
मौन मौन शब्दों ने
घोल डाली कडवाहट,
खोल कर रख डाली
सांझी वाली बात।
रंगों के उड़ने से लेकर
पेशानी के पसीने की धार।
पत्थर वाली सिल पर
फूल खिलाने की रार ।
संभल कर बोलते थे
खामोश इशारे,
माने तो ठीक
वर्ना चुप करो प्यारे ।    ....



बंद कमरे की
अनसुनी सी बात
बुलंद हो गूंजी
तो थर्राई
थी इमारत ....

तुमसे करनी थी
सहमी सी
एक फरियाद
बस रास नहीं आई
थी इबारत ....

कोयला कालिख का
पता दे तो रहा था,
मेरे दहकाने भर की देर थी,
अंगार बना आशियाना स्वर्ग सा।
कुछ बातें बेबाक हुई थी
बस यंही से राहें जुदा थीं।
अब के जो राख उडी थी,
सुर्खियों की जगह नमी थी,
देता रहा भरोसा सलामती का जो,
उड़ चुका भाप की तरह कभी का।
पश्चाताप का मुहाना
और विरोध का राग,
जिसका है ठिकाना
उसे था अपनाना ,
अब नहीं होगी जगह
गैरों की तमाशबीनी की
मिल गया साथी जंहा
कर राजीनामा
भूल कर अब मेरे बसेरे
को कभी नज़र तुम लगाना।

......   प्रदीप यादव  ( 20 सितम्बर 2012 )


झूम कर बरसा था तो कहते थे, कि  बादल को सलीका नहीं बरसने का ।
खिली जो धूप बस कुम्हलाकर लगे कहने,भूल तो गया नहीं बरसने का ।।   ....  प्रदीप स्वरचित

Sunday, 30 September 2012

तकरार के नताईल .....

शिकायत क्या करिए,और किस से करीए,
रात उन से लड़ जो लिया था मैं तक़रीबन,
कायदे से रूठ जाना तो बनता ही था उनका,
बस मुझे निकाल दिल से ही  बाहर  किया।

छटपटाते चूहे पेट के सो चले इन्तजार कर,
लानतें मलानतें भेजते मुझ पे तो भी कम था,
गोया तभी कर दीया उन्होने भी तौबा गजब,
लाकर एक बोतल पानी ठंडा जो फीरिज़ का
बिना लिहाज़ किए हम पर  पूरा उंडेल दीया,
पुचकार के पूछा, गुस्सा ठंडा हुआ हुजुर का |

खुशआमदीद तब किया दरवाजा ऐ दिल खोलकर,
बोले बेहतरीन बिरयानी पकाई हैं दम पर चढाकर,
हम भी भरे बैठा किए बेनूर ओ पसमांदा होकर,
मिन्नतों ने चेहरे पर सुकून की मुस्कुराहटें लाकर,
महक से खाने की,गुस्से पर पर पहरा बैठाकर,
खाना खिला रहे हैं,वो नज़्म रूमानी गुनगुनाकर।

.....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012

Tuesday, 25 September 2012

चिठ्ठी जब आती थी ...

चिठ्ठी जब आती थी ...

लिफ़ाफ़े का पर्दा ओढ़ कर तुम आती थी,
महक से कभी दरबान की फूर्ती से,
चिट्ठी तुम कितनी हसीं हुआ करती थी।
खाकी टोपी पहने डाकिए के अदब से,
लडकियों की दबी हंसी से,
ब्याहता की लरज़ती कनखियों से,
चिढ़ते लड़के की बेखौफ भागदौड से ,
पिता के संतोष भरे चेहरे से,
माँ की अभिमान भरी मुस्कान से,
बस ख़ुशी की 'खबर' के अरमान जगाती थी।  ...चिठ्ठी जब आती थी ...

पर जब पढ़ते-पढ़ते रुक जाना,
या रुक रुक कर पढ़ जाना,
ख्यालों में खो जाना,
बंधे सब्र का टूट जाना,
सपनों का लुटता करारनामा,
सुर्ख रंगों का खो जाना,
किशोर का असमय मर्द हो जाना,
कानूनी मसला हाथ से निकल जाना,
नौकरी न मिलने की हताशा,
दुखी,ये 'खबर' डाकिए की भी,
आँखें नम कर जाती थी।                      
....चिठ्ठी जब आती थी ...

डाकिया बाबू जब मोड़ तक आते
आशा भरी कई जोड़ी नजरों में झांकते,
अपनी साइकल की घंटी घनघनाते,
सपनो का पूरा होना,मंजिल को पा लेना,
ख़ास अवसरों पर,मन का अधूरा होना,
घर की मुश्किलों को एमो(मनीऑर्डर) का इंतजार,
बिटिया के जीवन में आएगी बहार,
नवांकुर के आगमन का समाचार,
सपनो का पूरा होगा आधार,
रूकती जो साइकल,
तकती आँखे जा धंसती,
डाकिए के चेहरे पर,
वो मुस्कुराया समझो पर्व सा आया।
आँख कई डबडबा जाती थी,
......चिठ्ठी जब आती थी
......प्रदीप यादव   26 सितम्बर 2012                        


  

Saturday, 22 September 2012

पैमाइश



   पैमाइश 
हकिकतों की पर्दादारी रखा करो


राज़ स्याह अन्धेरों में भी,


अक्सर नुमाया हो जाते है।


हसरतें नामावरान को 


गाफिल कर देती है।


दिल साफ़ की किस्सागोई 

ने फसाने तमाम बनाए थे।


सच्चाई की न किया करो पैमाइश 

झूठ के हमदर्दों की बस्ती में। 


..... प्रदीप यादव ...22/09/2012


दीवाने भी भला अपनी मंजिलों के रास्ते कब भुला करते हैं,
रफ्ता रफ्ता दिल की गली बखूबी ताड़ कर तलाश लेते हैं ...  by  Pradeep Yadav

'धारा 'नहीं पता तो भी धर लिया , अबे ! कार्टूनिस्ट है वो ,
ख़म नहीं ठोकता तो क्या ' धरा ' को समेटने का दम रखता है ...    By प्रदीप यादव

खामोश रहूँ या फिर कह दूं ,
दुलार की भाषा समझे वही,
जिसे या तो कुदरत 
समझ दे,
या फितरत में तासीर हो।
......( प्रदीप यादव स्वरचित )


एहसान मेरी ज़िंदगी पर तूम्हारा है दोस्तों ,
ये  दिल  तुम्हारे प्यार का  मारा है  दोस्तो ...हिंदीफिल्म गीत की पंक्तियाँ
  


"अधर मैं जनता", भारतीय राजनीती का आधार बन चुकी हैं ।
 अब तो संभल जाओ नहीं तो उखाड़ कर फेंक दिए जाओगे सीरिया,  तुर्की की तरह ....

Wednesday, 19 September 2012

सुबह का पहिया चलता जाए ....
करते हैं चलो हम भी नई खुराफात,
बहाने दोस्तों को कह लें शुभप्रभात,
दौड़े दौड़े दिन का पहिया,
नई आशायें भरता जाए,
रंगीन सपने वादों का ,
बढ़ते और दृढ होते इरादों का,
उड़ान के हौसलों की पाखों का,
नव पल्लवित शाखों का,
भूरी भूरी अभिलाषाओं का,
मोहक चटख श्रंगारों का,
उल्लास यूँ ही बढाता जाए ।   ..... By प्रदीप यादव, 20 सितम्बर 2012



Saturday, 15 September 2012

उपयोगी और विचार शील  लेखन ......

कि खुदा यंहीं है,मैंने सिर्फ लिखा इतना
'प्रदीप' उन्होंने पढ़कर फिर टाल दिया !!!    ......प्रदीप यादव 

Thursday, 6 September 2012

बेवफाई की परख



बेवफाई की परख

परखने में सिर्फ कितने हरज़ाई है हम,
हर्ज़ क्या है बेवफाई के तमगे में सनम ।
न फूलों से आशिकी छूटी
न यादों की मोहताजी हुई कम,
इरादों की मजबूती का तो कायल ज़माना ,
तनहाइयां छुपाने के लिए करते हो जतन ।
......प्रदीप यादव स्वरचित ( 7 सितंबर 2012 )


Friday, 17 August 2012



 65 वीं सालगिरह मेरा भारत महान,
 शुभ स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 2012 ....
By  प्रदीप यादव 

हमें देश के प्रत्येक सैनिक, किसान,
उद्यमी,कर्मचारी, वैज्ञानिक, बुधिग्य
मनीषियों,नेता,कलाकार,खिलाड़ी,
साहित्यकार,अनाम जाँबाजों तथा
सम्पुर्ण पृथ्वी और अब 
अन्तरिक्ष
में भी स्थित भारत और भारतीय 

मूल  के समस्त  स्त्री - पुरुषों  एवं
बच्चों और
उनकी उपलब्धियों पर
अपार गर्व है ।   

एक गर्वित भारतीय  
भारत  : सोना --  चांदी 02 कांस्य 04
दोस्तों यदि हमारे प्रतिभावान खिलाड़ी ब्राज़ील में अपने पदकों का रंग सुनहरा कर पाए तो हम पदक तालिका में 15 वें स्थान पर  होंगे ।

रात का मीठा

  रात का मीठा 

गुजारा दिन रोज की झूठी सच्ची बातों में ,

बातें जिनमें चैन ना था सुकून भरा बेन ना था ।
उडी उडी सी रंगतों और हरकतों से था बेज़ार,
 मुश्किलों का मेरी तो कोई ठिकाना ना था ।

सम्हल कर चलूँ तो डरपोक ,
हंसी ठिठोली ने बनाया लोफर,
कुबुलनामे मेरे नाटकबाज़ी बने ,
रुसवाइयों को तमाम तेवर कहे,
चलता हूँ, शाम भी गहराई है,
सूरज का छूट रहा है साथ,
रात ने दे डाली थी दस्तक ।

भुलाने कडवाहट ज़माने भर
की देर  नहीं करता अज़ीज़ ।

मेरे घर खाने पर मिलने वाला
"रात का मीठा" लगता लज़ीज़।

..... प्रदीप यादव 03 सितम्बर 2012




प्रकृति 


दर्द ऐ बादल


लोगों गर बरस गया मैं जो झूम कर,


मेरे इस लाड़  को बस यंही  भूल कर,


याद से रख लेना हर एक बूँद सहेज कर,


बिखरी धुंध को जैसे तैसे लाया समेट कर,


बारीश बन छलक भी रहा हूँ अनमना,


गरजना कड़कड़ा कर चमकना


भरम है हँसता हूँ खिलखिला कर,


इस रोने को ठहाको का समझो ना जरिया,


उजाड़ कर जंगल तुमने कब्जाए जो दरिया,


मोरों की बस्ती मीठी अमरुद की बगिया,


लौटा दो मेरे दोस्त दरख्त छोटी से चिड़िया ।

 ...... प्रदीप  यादव   
22/07/2012

Tuesday, 24 July 2012

किस तरह मिलूँ ....


किस तरह मिलूँ ....

क्या ! चाहिए ?
क्या, चाहिए ?
अजी क्या चाहिए,हसरतों का देकर भरोसा,
मीठे पलों को खोजने बस निकल जाइए ।
बेमेल दुनिया से नज़र तो मिलाइए ,
मुलायम पड़ रहे तेवर तो दिखाइए,
कुछ मुस्कुरा कर खामोश हो जाइए ,
रूक जाइए पर कंही खो न जाईए ।
रंगीन रातों का कर इंतजार,
उजले दिनों को न भूलाइए ।
अक्षरों की पढ़ी जो वर्णमाला,
गीत उस पर नया रचाइए ।
साजों पर नगमा सुरीला बैठाइए,
मेल स्वरों का नए रागों से कराइए ।
जिस पते से लौटा था ख़त,एक दिन
तबीअत से जरा ख़टखटाइए ।
मिल जाए जो जवाब ए रजामंद ,
फिर इकरार में सर को हिलाइए ,
सरताज अब बहुत हुआ सम पर तो आइए ।
क्या ! चाहिए ?
क्या , चाहिए ?
अजी छोड़िए ,अब चाहिए ही क्या ।    
 प्रदीप यादव  ~     24/07/ 2012


Monday, 23 July 2012

prady ने कहा बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी अशोक चक्रधर

बोल मेरी मछली कितनी हिन्दी
 ( डाक्टर अशोक चक्रधर की विशेषज्ञता संस्मरण )
पर मेरी टिप्पणी   ....प्रदीप यादव 23 जुलाई 2012

हिन्दी लिखते मेरे हाथ कांपते हैं ।

हिन्दीभाषी कहते मेरे नाज नखरे गुम जाते हैं।


किसे पढूं किसे नहीं सोच कर सर धुनता हूँ,


मात्रा, छंद,समास,अलंकार मेरी लेखनी को समृद्ध बनाते हैं


… 
 स्वीकारता हूँ !


आजकल दाढ़ी बना कर निकलो …. 


भद्रपुरुष नहीं ,"चिकना" संबोधन मिलता है ।


सच कहूं तो जिस आशय में वह कहा गया होता है,


मन को बड़ा ही अच्छा लगता है ,किन्तु यदि

असावधानीवश कंही साहित्यिकारों के बीच कह गया

तो समझो पार्टी विहीन हो गया । अब बोलचाल का 

प्रोटोकाल आम हिदीभाषीसमझ नहीं पाता और 

आधिकारिक साहित्यिक बंधू,

इसे पचा नहीं पाते ।

प्रलोभन देकर बुलाये,मानसिक CUM क्षुधापूर्ति हेतु आए

हिंदी साहित्यकारों का आकर्षण इस विडंबना पर जाने कब होगा ?

तभी वे किसी फाइव स्टार होटल के अतिथि कक्ष मैं बैठ

स्व-हस्ताक्षरित प्रति
 आम पाठकों तक वितरित कर पाने की

आकांक्षा जगा सकते हैं ।


पर इसे ही कितने समझ पाते हैं ?


लाइन से चलो या लीक से हटकर बहो,


यह कितने समझ,या समझा पाते हैं ।


अवसाद 'शोक' मुमुक्षता, के इस दौर में कितने


'अशोक'
 ' बन हिंदी लिख और कह पाते हैं ।     


प्रदीप यादव ~ 



Friday, 20 July 2012




दुनिया के पांच सबसे मुश्किल काम

भाई साहब, यह मजाक नहीं है, बल्कि हकीकत है।
पढ़ोगे तो हंसते रह जाओगे...


1. वाइफ के साथ शॉपिंग पर जाना...

2. बच्चों के नॉन वेज सवालों का जवाब देना...

3. प्रेमिका के नखरे सहना ...

4. खुद किताब लिखना ...

5. अरेंज मैरिज करना...!!!


जो व्यक्ति यह सभी कार्य कर,
चुका  हो उसे आप किस श्रेणी मैं आंकेगे ....
 1. शूरवीर या
 2.  वीरगति प्राप्त

नया कंफिगरेशन

नया कंफिगरेशन (मुम्बईया )

सच के रिया हूँ मियां जो चाहे वोइज़ कर लो ,
मरने के बाद भी जीने का इश्टाईल जान लो ,
भर्ती आइटम से मंदिर की आरती भी लिख लो ,
एडिटिंग फार्मूले से रंगीन वाली 'ब्लू' कर लो ,
यादों का भरोसा नई  रे बाबा,
बोले तो एकदम एंटी वाइरस ,
अक्कल का अपग्रेडेशन कर लो,
थोडा डिस्क स्पेस भर लो ,
अच्छी वाली  को RAM ,
और बुरी यादों को ROM  कह लो ,
RAM की कम्पेटिबिलिटी ROM की इन्टग्रिटी चेक कर लो ,
धीरे से  डीलीट मारकर बस दूसरी साईट पर कल्टी कर लो ,
उठापटक के इस माहौल मैं प्रोटोकाल का भी ध्यान रख लो ,
मनमर्जी की साइटों पर जाओ कुछ यंहा वहाँ से भी उठा लो ,
टेडी मेढ़ी सामान पर चाहे आर्ट वाला सोफ्टवेअर पोत लो ,
थोबड़े का मेकअप कर फूल खिले गुलशन के बोलो ,
'दही' का दिमाग करके हटेले सलीम को डाईरेक्टर लेलो ,
फ़िलिम के चलने की गारंटी टीवी चेनल रेडियो प्रिव्यू से लो ,
नया कंफिगरेशन आएला हैं बस एक चांस अपुन को भी दो ।


.......
प्रदीप यादव ( स्वरचित )






Yadon ka bharosa na kar ve anti virus jaisi hoti hain | hume akal ka upgredetion de disk par sirf space carry karti hain |achhi aur buri donon yadein kramshah RAM aur ROM jaisi hain , jab bhi RAM ki compatibility check karni ho to ROM ki integrity ka dhyan jaroor rakhiye|  ... Prady

Wednesday, 11 July 2012

उम्र का उतर्राध



   उम्र का उत्तरार्ध   
   उम्र का उत्तरार्ध    

सिरहाने एक मजबूत लकड़ी रखना।
उठूँ जब मैं पास चश्मा,दवा,
जग पानी का साथ गिलास रखना।
पैरों पहनकर चप्पल,
अखबार की सुर्खियाँ पढ़कर,
लौटूं जब मैं पार्क से टहलकर,
दोस्तों के नंबर डायरी में लिखना,

डॉक्टर से मिलने का समय ले लेना,
दांतों के सेट को वहीं खाने की मेज पर रख,
दही, दलिया साथ ही रखना,
इसे भी कुछ सहेज लेना।

शोर बच्चों का परेशान तो करता हे,
फिर भी तुम उन्हें मनाए रखना।
उजाले, तेज आवाजें मौसमी तेवर,
मुझे सताते पर ये सब उम्र के हैं तकाजे,
दरवाजे मेरे कमरे के खुले ही रखना,
घडी में मेरी चाभी देते रहना,
अरे ज़िंदा हूँ मैं लगना भी तो चाहिए।
अच्छे तो हो तुम सब बस मस्त रहना।

रिश्तेदारों से ज़रा अपनापन बनाए रखना।
सूटकेस से तस्वीरें पुरानी मढ़वा भी देना।
कट चली है अपनी तो राम ही के भरोसे।
राज जीने के तुम भुला ना देना ....
शुभकामनाएं तुमको !! जीते रहना मेरे बच्चों ।।


~ प्रदीप यादव ~   

     




श्री कृष्ण जन्मोत्सव


श्री कृष्ण जन्मोत्सव

पग पखार श्यामल,
हुई कालिंदी सांवरी,
रास रचाकर बृजवासी
संग राधा हुई बावरी,

रच गिरधर के भक्ति पद
भय मीराबाई बावरी,
श्याम सुर लगायो,जसोदा
उर आनंद हरषायो,
किशना माखन मटकी चुरायो,
बाजी बाँसुरी धीमे धीमे
गोपिका मन भरमायो,
भजे द्वारिकेष मिश्री माखन,
तुलसी चन्दन,
निर्मल दीप जलायो,
सखी,रंक,संत,राजा,देवता,अधिनायक
सब मिल शीश झुकायो । 

लीलाधर विष्णु के तुम अवतारी, श्याम लला जनम  की आई बारी।  
नंद नटवर कृष्ण गिरधारी आज भजन जुटे हैं नर नारी,
गोपिकावल्लभ मनोहारी ,पूजन में पधारज्यो बलिहारी  
हरे कृष्ण,गोवर्धन,गोविन्द, घनश्याम,गिरधारी गाओ,
झूम झूम सब जन  हरी मन विठ्ठल विठ्ठल ध्याओ ।  
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~ प्रदीप यादव
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Tuesday, 10 July 2012

गुल-आब-जामुन

                    गुल-आब-जामुन 

ए  गुल - आब- जामुन,तिल तिल तरसाना भी तेरा खूब है,
न रंगत तुझमें जामुन सी, ना ही महक से ही  तू गुलाब है।
मेरे अहसास की तुझे खबर नहीं , बस अंदाज तेरा मिठास है,
छुईमुई सी गोल मखमली गेंद की लज्जत बेहद लाज़वाब है। ....प्रदीप स्वरचित
                                              

Monday, 9 July 2012

जग रचनाकार


     जग  रचनाकार 

हे रचनाकार ,
रचियता तुम्हीं रचना तुम ,
हर रचना की कल्पना तुम,
कूची तुम कैनवास तुम,
दृश्य का दृष्टिकोण तुम,
रूप तुम लावण्य तुम,
मधुर मोहक श्रृंगार तुम,

यक्ष्य तुम प्रत्यक्ष तुम,
साकार भी निराकार तुम,
मद्ध तुम मद्धोंमाद तुम,
संशय के परिष्कार तुम,
राग तुम वैराग्य तुम,
दीन के अवतार तुम,

अनुरोध के निदान तुम,
आश्रितों का तारण तुम,
हे अद्वितीय मेरे मन को,
भरमाने का प्रयास तुम,
मन भ्रमर का अंकूश भी तुम.........,

मैं तुम, ज्ञान तुम,
विवेक तुम, मान तुम,
अगम तुम सर्वसुलभ तुम,
आराध्यों का प्रस्ताव तुम,
षठ हम , असभ्य हम,
शिष्ठता का पर्याय तुम,
"देव तुम",  'याचक हम'
हर तृष्णा की तृप्ति तुम ......( by 
)  ~ प्रदीप यादव ~ 


Saturday, 7 July 2012


काँटों भरे गुलाब की पंखुड़ी पर बूँद ओस की गोया खूब है ,
सलाहियतें तमाम , दर्द सहने की मेरी भी बड़ी मगरूर है । ~ प्रदीप यादव ~
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मैं रौशनी को चिराग दिखाने  की जुगत किया करा ,
मौसमी रद्दोबदल का माज़रा जो समझ आ गया था ।
 प्रदीप यादव ~
                                 2012 जुलाई 11 

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कह जो दिया तो आँखों मैं बसे अक्स नम हो ढलक जाएँगे,
मिलते रहे राहेगुजर भी मुलाकात में वो असर नज़र आएंगे ।
प्रदीप यादव ~
21/07/2012
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main roshni ko diya dikhane ki jugat kiya kara,


mousmee raddobadal ka mazra jo samjh gaya |
प्रदीप यादव ~

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A P N A   K H A Y A L  R A K H N A 



milne ki ummeed khayal rkhna hai,


raste ki khabar khayal rkhna hai,


dhalti rat talk intzar khayal rakhna hai,


lambee hoti duriyon ka andaja khayal rkhna hai,


mukarrar waqut rah e gujar tkna khayal rkhna hai,


Gahe b gahe salamti ki takid karna khayal rkhna hai,


Do bol vida ke kahne ki hasrat khayal rakhna hai,

Bas mere dost bata de ab tu hi ki,


yeh MOHOBBAT karne ka tarika kya hai

  ...... PRADEEP YADAV 18 / 07 / 2012


Friday, 6 July 2012

चाय से चाहत




                 चाय से चाहत     

                                           By.... PRADEEP YADAV



चाय' मेरी तेरी चाहत है,
बिलकुल जैसे रिश्ते,
चाय पतीली की भाप से,
रंगीन ख्वाब दिखाती है,

फिर अपनी महक से
अरमान नए जगाती है,
                          

प्यालियों की खनक से
चुस्कियों की आगोश तलक,

चाय मिलते रहने की
मुहलत दिलाती है,

चाय मर जाती है,
जब प्याली रीती रह जाती है,

पर अफ़सोस नाउम्मिदी का
जताकर फिर से जी जाती है,

सफल हो दिन आज तुम्हारा,
चुपके से कह जाती है ।
... चाय तेरी मेरी चाहत है |


Contd.....
                    
   


कितने दिनों से वो रहे कतराते ,         
गिरह भी क्या खूब रही नजरो की,
         

इंतजार मैं झुकी थीं ,बही यादों मैं,फिर खो रही आँखों ही आँखों मैं,
          प्याली प्याली मौन ने,
          आमंत्रित मुझे बना लिया ,
          अनगिनत भूलों ने मेरी,
          मुरीद उसका बना दिया ।  

थक कर आते हैं जब हम
चाय माशूका सी लगती है,
  
                               
क्या हुआ कैसे गुजरा दिन ?
चुस्की दर चुस्की पूछती है,
                                 
किस बात से है,खफा
किसने दिल ये नासाज़ 
किया,                                  
हाल चाल पर बहलाती सी
चाय फिर ढाँढस दिलाती है,
                                 
मिलते रहा करो  मुझसे कह,चाय चाहत बन जाती है ।  ... by  ~ प्रदीप यादव ~ स्व-रचित